हिंदी दिल की भाषा है, दर्शक दिल शब्द के निहितार्थ को ध्यान से नहीं देखता

हिंदी दिल की भाषा है, दर्शक दिल शब्द के निहितार्थ को ध्यान से नहीं देखता

प्रभु जोशी


मित्रों,

भाषा, हमारी जैव -सामाजिक सांस्कृतिक संपदा है।  भाषा वैज्ञनिक डेविड क्रिस्टल कहते है  कि एक शब्द की भी मृत्यु , संसार से किसी एक नागरिक की मृत्यु के ही बराबर मानी जाना चाहिए। जब शब्द की मृत्यु इतनी सांघातिक है, तब एक  भाषा का मरना कितनी बड़ी विभीषिका सिद्ध होगी, इसकी कल्पना, कोई मतिमंद ही नहीं कर सकेगा। भाषा, एक परम्परा, धरोहर और एक जीवित समाज का ही पर्याय है। वह उसके बोलने वाले समाज का आधार होती है।

 भाषा, राजनेता के लिए मात्र  अपने मतदाता से संवाद के उपयोग भर का माध्यम होती है। उसकी भाषा संबंधी समझ, बहुत सतही होती है। वह उसका सम्वाद प्रमुख रूप ही चाहता  है। सम्प्रेषण मात्र ही उसका अभीष्ट होता है। बाजार के आदमी की दृष्टि में भी, भाषा  मात्र  माल बेचने के जरिये से अधिक नही होती। इस से अधिक उसका भाषा से सरोकार नही होता। राजनीति भी इस समय, एक व्यापार ही हो चुकी है। आजकल हर वाचाल राजनेता , धंधई आदमी की तरह बोलता है। जबकि भाषा एक चिंतन प्रक्रिया भी है। उस को बोलने वाले समाज की सांस्कृतिक अस्मिता भी होती है।

वैसे आप सब ने टेलीविजन पर एक विज्ञापन  देखा , होगा, जिसमे कहा जाता है, अंग्रेज़ी सोचने  की भाषा है। ये विज्ञापन अपने बाद के हिस्से में,  एक धूर्त युक्ति से , का इस्तेमाल करता है। हिंदी को सीधे सीधे चिंतन के अयोग्य  भाषा न बताते हुए, अगला वाक्य बोलता , हिंदी दिल की भाषा है। दर्शक दिल शब्द के निहितार्थ को ध्यान से नही देखता।  वह दिल शब्द आते ही, खुश हो जाता है।

जबकि विज्ञपन का  साफ साफ कहना है यही है कि हिंदी दिमाग की भाषा नहीं है। यानी सोचने समझने की भाषा नहीं है। पता नहीं हिंदी वाले ऐसे विज्ञापनों का विरोध क्यों नहीं करते। आज पूरा हिंदी भाषी समाज , विज्ञापन के जरिये ही बदला और बनाया जा रहा है। हमारे, भारत के  माननीय प्रधानमंत्री, भी भाषा को लेकर कोई इतर सोच नहीं रखते। उनके भाषा के प्रति दृष्टिकोण को लेकर मैं एक बार उनके नाम खुला खत भी लिख चुका हूँ। 

दरअसल , प्रधान मंत्री जिस लहजे और जिस भाषा मे बोलते है। उनको सुनकर लगता  ही नहीं कि हमारा कोई राष्ट्रनायक बोल रहा है। बल्कि एक सेल्स मैन बोल रहा है।  जो अधिकतम लोगों तक अपना अधिकतम माल बेचने की उतावली से भरा हुआ है। राष्ट्र से संवाद नहीं कर रहा, बल्कि लगता है विचार को वस्तु की तरह बेच रहा है। हो सकता है, उनको ये वहम हो कि वे संस्कृति पुरुष है । लेकिन संस्कृति की जिसको गहरी समझ हो, वह  भाषा के साथ  ऐसा सलूक नही करता , जैसा  हमारे प् प्रधानमंत्री मंत्री करते है। 

ऐसी हिंदी, वे ही बोलते है, जिन में अंग्रेज़ी को लेकर हीनताबोध हो। उनके बोलने से साफ पता लगता है कि उनको अंग्रेज़ी नहीं आती। इस मे बुरा क्या है। नेहरू के बारे में नीरद सी चौधुरी कहते थे,  Nehru can not write english  as a native speaker.पर मोदी जी अच्छी हिंदी में तो बात कर सकते है, फिर सामान्य से भी हिंदी  शब्दों  के लिए अंग्रेज़ी शब्दों का क्यों इस्तेमाल करते है।  

हमारे रक्षा मंत्री माननीय राजनाथ सिंह तो उस हिंदी प्रदेश  से आते है, जिसने हिंदी को सब से अधिक समृद्ध बनाया। लेकिन आजकल वे भी भृमित हो कर, मोदी जी की तरह बोलने लगे है, जबकि मैंने एक बार उनको दिल्ली में और कई बार दूरदर्शन पर बोलते सुना था, तो उनकी भाषा को सुनकर मेरा सिर सम्मान में झुक गया था। 

भाषा के इस तरह के उपयोग को समझाने के लिए, एक उदाहरण उपयुक्त होगा। गन्ना खाने वाले  को केवल , रस लेने से ही मतलब होता है। बाकी वह छिलके की तरह भाषा को  फेंक देता है।  भाषा किसी  राष्ट्र के लिए , उसकी संस्कृति के लिए क्या महत्व होता , इसकी चिंता  भी नही है। न समझ। आज़ादी के बाद इस देश को पहले ऐसे प्रधान मंत्री  मिले है, जो अंग्रेज़ी के  साम्राज्यवाद के मददगार की भूमिका निभा रहे हैं।

लेखक के बारे में 


प्रभु जोशी वरिष्ठ कहानीकार, पत्रकार और चित्रकार हैं। पत्र-पत्रिकाओं में हिंदी तथा अंग्रेजी में कहानियों, लेखों का प्रकाशन। लिंसिस्टोन तथा हरबर्ट में ऑस्ट्रेलिया के त्रिनाले में चित्र प्रदर्शित। गैलरी फॉर केलिफोर्निया (यूएसए) का जलरंग हेतु थॉमस मोरान अवार्ड। ट्वेंटी फर्स्ट सेन्चरी गैलरी, न्यूयार्क के टॉप सेवैंटी में शामिल। भारत भवन का चित्रकला तथा मप्र साहित्य परिषद का कथा-कहानी के लिए अखिल भारतीय सम्मान। दूरदर्शन इंदौर में प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव पद से रिटायर्ड। इससे पूर्व इंदौर आकाशवाणी में प्रोग्राम एक्जीक्यूटिव पद पर कार्यरत। कई रेडियो प्रोग्रामों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय अवार्ड। वर्तमान में लेखन और चित्रकारी में सक्रिय।