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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -सबके अपने-अपने सचिन वाझे, परमवीर सिंह

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -सबके अपने-अपने सचिन वाझे, परमवीर सिंह

-सुभाष मिश्र

जब देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि ना खाउंगा ना ही खाने दूंगा तो पूरे देश को लगा कि अब देश में सुशासन आ जायेगा। भ्रष्टाचार समाप्त हो जायेगा। किसी भी काम के लिए किसी भी दफ्तर में बाबू से लेकर अफसर तक को नेता से लेकर मीडिलमैन तक को पैसा नहीं खिलाना पड़ेगा। धीरे-धीरे लोगों ने देखा कि दुनिया का सबसे बड़ा दस्तूर नजराना, शुकराना और जबराना बदस्तूर जारी है। जो इस तंत्र को नहीं जानता और फोकट के नारों के बहकावे में आ जाता हैं उसे बाद में बौद्घित्व की प्राप्ति होती है। सरकारी काम कराने के लिए भी कबीरदास को याद रखना जरूरी है।
''-जिन खोजा तिन पाईयां, गहरे पानी पैठ है। हां बौरा डूबन डरा रहा किनारे बैठ।

सरकारी दफ्तरों के भवसागर में उसकी की नैया पार होती है जिसे ईश्वर को चढ़ावा चढ़ाना आता है। जो कांग्रेस सरकार बोफोर्स की दलाली को लेकर कठघरे में थी, वही कांग्रेसी अब राफेल में दलाली के लिए भाजपा को घेर रही हैं। किसी भी रक्षा सौदे में दलालों की उपस्थिति अनिवार्य है। बिना किसी बिचौलिये, मीडिलमैन के जहाज से लेकर हथियार खरीदे गये हैं जब यह कहा जाता है तो बाकी लोग मंद-मंद मुस्कुराते हुए उस समय का इंतजार करते हुए कहते है कि -
''कब तक छुपेगी कैरी पत्तों की आड़ में, एक दिन तो आयेगी बिकने बाजार में हर पार्टी का नेता, सक्रिय कार्यकर्ता जानता है कि चुनाव के समय सभाओं में भीड़ कैसे लाई जाती है। पार्टी फंड के लिए कौन-कौन अफसर, दफ्तरों से चंदा वसूला जाता है। चुनाव के समय आयोग की आंख में धूल झोंककर मतदाताओं को पैसे, सामग्री, शराब कैसे और कहां से पहुंचाई जाती हंै। सरकारी तंत्र यूं तो कहने को निष्पक्ष होता है पर उसकी रेड कालीन के नीचे क्या-क्या दबा है, यह कभी-कभी ही सामने आता है। जैसे इस समय मुंबई पुलिस के कारनामें सामने आ रहे हैं।

अभी सर्वाधिक चर्चा में मुंबई पुलिस के दो अधिकारी परमवीर सिंह और सचिन वाझे हैं। पुलिस कमिश्नर पद से हटाए जाने के बाद परमवीर सिंह ने पत्र लिखकर महाराष्ट्र के पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख पर करोड़ों की वसूली के संगीन आरोप लगाये थे। उन्होंने मुंबई उच्च न्यायालय में याचिका भी दायर की। मुंबई उच्च न्यायालय ने सीबीआई से 15 दिन के भीतर इस मामले में रिपोर्ट मांगी है। शिवसेना के नजदीकी समझे जाने वाले निलंबित पुलिस अधिकारी सचिन वझे ने दावा किया है कि पूर्व गृहमंत्री अनिल देशमुख ने मुंबई पुलिस की उनकी सेवा जारी रखने के लिए दो करोड़ रुपये मांगे थे। शिवसेना कोटे के एक और मंत्री अनिल परब थे। उन्हें ठेकेदारों से वसूली करने को कहा था। महाराष्ट्र के दोनों मंत्रियों ने इन आरोपों से अपना पल्ला झाड़ लिया। वही महाराष्ट्र सरकार ने सीबीआई जांच के आदेश का विरोध करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी, जो खारिज हो गई है।

एंटीलिया और मनसुख हिरेन हत्याकांड में गिरफ्तार मुंबई पुलिस के एपीआई सचिन वाझे ने अदालत को अपने हस्त लिखित बयान में कहा है कि 6 जून 2020 को उसका निलंबन समाप्ति के कुछ दिन पहले ही उसे फिर से निलंबन से बचाने के लिए गृहमंत्री अनिल देशमुख ने दो करोड़ रुपये मांगे थे। जनवरी 2021 में देशमुख ने वाझे से कहा कि मुंबई के 1650 रेस्टोरेंट से हर महीने साढ़े तीन लाख वसूली करके दो। ये कौन सी नई बात है कि हर थाना क्षेत्र के बॉर, रेस्टारेट, हुक्का बार, और जुआ- सट्टा खिलाने वालों से हर महीने वसूली करता है। इस वसूली के आधार पर ही थानों में पदस्थापना की राशि तय होती है। यह किसी एक राज्य और एक सरकार की कहानी नहीं है, ये कहानी बहुत पुरानी है, बस इसमें नये-नये किरदार जुड़ते रहते हैं। सरकारी आदर्श और दिखावे के लिए भले ही लोग इससे इंकार करे, परंतु हर कोई मिर्जा गालिब की तरह ''जन्नत की हकीकत जानता है। जो इस सिस्टम में अनफिट है वो कही लूपलाइन में पड़ा है, यकीन न हो तो लूपलाइन में पड़े व्यक्ति से खुद पूछकर तस्दीक कर लो।

इस पूरे मामले में शिवसेना की पूर्व सहयोगी भाजपा जिनका डीएनए शिवसैना जैसे ही है। जो भाजपा थोड़े समय पहले तक महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज थी, इस तरह की वसूली को लेकर हंगामा खड़ा करके बता रही है, कि मुंबई पुलिस का उपयोग वसूली और गलत कार्यों के लिए हो रहा है। जो लोग की सत्ता की जरा भी समझ रखते हैं वे जानते है कि जिसकी लाठी उसकी भैंस कहावत यूं ही नहीं बनी है। हर विधायक, गृहमंत्री बनने क्यों लालायित रहता है। पुलिस महकमा किसके इशारे पर काम करता है। पुलिस का तबादला, पोस्टिग के नाम पर जितनी राजनीतिकरण हुआ है उतना किसी अन्य सेवा का नहीं।

ब्यूरोक्रेसी को सुधारने की मंशा किसी की नहीं रही, उसे अपने अनुरूप साध कर उससे उल्टे सीधे काम कराना आज हर सत्ताधीश का पहला लक्ष्य है। यही वजह है कि चुनाव जीतने के बाद सत्ता में आते ही हर सत्ताधीश अपना पॉवर दिखाने के लिए ब्यूरोक्रेसी का बड़े पैमाने पर तबादला करते हैं।

शिवसेना का मुखपत्र सामना ने केंद्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग को लेकर चिंता जाहिर की है और लिखा है कि राजनीतिक प्रतिद्वद्विंयों पर निशाना साधने के लिए केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है। महाराष्ट्र की सरकार को कमजोर करने में संवैधानिक प्राधिकारियों को शामिल किया जाना चिंता की बात है। यह वही शिवसेना है जिसने स्थानीयता के नाम पर दूसरे प्रदेशों के लोगों के संवैधानिक अधिकारों की खुलेआम धज्जियां उड़ाई थी। केंद्र सरकार हो या राज्य सरकार सब इन एजेंसियों को अपनी कठपुतली बनाकर अपने इशारों पर चलाना चाहते है। ये अपनी एजेंसियों के माध्यम से लोगों को फंसाते हैं और प्रताडि़त करते थे। जिस तरह सीबीआई, इंकमटैक्स, ईडी जैसे एजेंसी की विश्वसनीयता केंद्र सरकार के हस्तक्षेप की वजह से प्रभावित हुई है। उसी तरह राज्यों की पुलिस और उसकी आर्थिक अपराध एजेंसियों की भी विश्वसनीयता वहां की सरकारों के कारण संदिग्ध हुई है। अपने प्रतिद्वंद्विंयों को फंसाने, कुछ लोगों की गलतियों को पकड़कर उन्हें अपने हित में काम करने के लिए, ऐसी एजेंसियों का भरपूर उपयोग होता है। यूं तो कहने को भारतीय प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा, राजस्व सेवा से चुने अफसरों को राज्य का कॉडर आवंटित होता है, किन्तु वे केंद्र सरकार के कार्मिक प्रशासनिक विभाग के अधीन होते हैं। इस सेवा के कुछ अधिकारी राज्य की सत्ता से नजदीकी बनाकर मनचाही पोस्टिंग लेते हैं और उनके इशारे पर वो परमवीर सिंह या सचिन वाझे की तरह काम करते हैं, और जब उनका काम नहीं सधता तो वे कभी-कभी उनकी जुबानी बोलने लगते हैं। हर सरकार में कुछ लोग परमवीर सिंह, कुछ सचिन वझे बनने के लिए तत्पर रहते हैं। हमारे मंत्रियों, सत्ताधीशों को हमेशा ऐसे लोगों की तलाश रहती हैं जो उनके लिए सारे नियम-कानून को परे रखकर जैसे वे कहें, वैसे करें। ऐसे लोगों की हर सरकारी विभाग में बहुत पूछ-पकड़ होती है, ये सत्ता के गलियारों में अलग से पहचाने जाते हैं।

हमारे देश की ब्यूरोक्रेसी के स्तर में गिरावट को एक वजह उसका राजनीतिकरण भी है। जो अधिकारी सत्तारूढ़ दल की बात नहीं मानते उन्हें लूपलाइन यानी बिना कमाई, बिना ज्यादा पावर की जगह पोस्टिंग दी जाती है। लूपलाइन में भला कौन रहना चाहेगा सो फिर मुख्यधारा में आने के लिए अपने आकाओ की हां-हां मिलाना जरूरी है। ब्यूरोक्रेसी में यह भी सर्वमान्य सत्य है कि जहां बाकी सक्षम लोग अपनी हायर की अपने सीनियर होने को लेकर एक झूठा इगो पाले रहते हैं। वही वे लोग सत्ता के नजदीक रहने वाले छोटे से छोटे अधिकारी के आगे नतमस्तक रहकर उनकी चापलूसी से बाज नहीं आते। राज्य सेवा के बहुत से छोटे कर्मचारी, अधिकारी इस खेल को बखूबी समझकर राजनीतिक आस्था के साथ डटे रहकर बाकी सारे सीनियर को लाइन में लगाए रहते हैं। यह दृश्य किसी एक राज्य का नहीं है, यह हर जगह की सत्ता का चरित्र है, जिनके नाम और चेहरे बदलते रहते है। अच्छी पोस्टिंग पाने, लाभ के पद पर बने रहने के लिए सरकारी महकमे के लोग नेताओं के लिए चंदा-चकारी करने में कभी पीछे नहीं रहते। बहुत बार तो ये नौसिखिए नेताओं को लूट के नये-नये तरीके भी बताते है। अमीर धरती के गरीब लोगों की धरती के नीचे दबी खनिज संपदा का कैसा दोहन किया जाये, जल, जंगल, जमीन कैसे बेचकर निजी कंपनियों को लाभ दिलाते हुए, कैसे मालामाल हुआ जाए। ये सारे गुर हमारे नेताओं को ब्यूरोक्रेट ही सिखाते हैं। हमने यह नजारा खनिज संपदा से भरे अपने नये राज्य छत्तीसगढ़ में पहले खूब देखा है। सरकारी मिलीभगत से होने वाली यह लूट लंबे समय से जारी है।