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करो या मरो

करो या मरो

ध्रुव शुक्ल

भारत के प्राचीन गुरुकुल में आत्मभाव से अन्याय के प्रतिकार की शिक्षा दी जाती रही है। भगवद्गीता में मोहग्रत योध्दा को इसी कर्म-विवेक का स्मरण करवाया गया. अन्याय का प्रतिकार करो, मरना पड़े तो मरो। 

किसी जाति का उदार होकर सबको जगह देना बड़ा मूल्य है। यही मूल्य संसार में सबके जीवन को सुरक्षित रख सकता है। पर जगह पाने वाले लोग इसे उस जाति की भीरुता मानकर उसे दबाते चले जायें तो उसका प्रतिकार जरूरी है।

महात्मा गांधी ने इस प्रतिकार की अहिंसक तालीम से मानव जाति का परिचय करवाया पर इस तालीम का अनुकरण नहीं हुआ। शत्रुता के दो पाटों के बीच पिसते गांधी जी की विकलता उनके अंतिम दिनों में दिए गये प्रार्थना प्रवचनों में दर्ज है।

वैश्विक छेड़खानी अभी भी कम नहीं हुई है। प्रायोजित आतंक की ओट में छिपकर युध्द चल ही रहा है। कोरनी छूत की ओट लेकर अब वैश्विक व्यापार में भय मुनाफे का धंधा है। कपट कौशल से लैस तकनीक की ओट में मानवीय कौशल का तिरस्कार किया जा रहा है। ऐसी हालत में संसार व्यापी जीवन को असहाय रखकर आपसी बैर के बाड़ों में क़ैद करके धर्म, राजनीति और बाज़ार उसे किस जहन्नुम में लिए जा रहे हैं। मीडिया सदियों पुराने शत्रुता के भूतों को क्यों जगा रहा है?