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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - अपने-अपने तालिबान

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - अपने-अपने तालिबान

-सुभाष मिश्र

सबके अपने-अपने तालिबान हैं। कुछ देश और लोग अफगानिस्तान में तालिबानियों के कब्जे को सही बताकर उसे एक राष्ट्र के रूप में मान्यता देने पर आमदा हैं तो वहीं कुछ लोग इसे अमेरिका की शिकस्त मानकर तालिबानियों की आजादी करार दे रहे हैं।
भारत सरकार का तालिबान को लेकर अभी तक स्टेंड क्लियर नहीं है। भारत ने अफगानिस्तान से अपना दूतावास पहले ही दिन बंद कर दिया है। ब्रिटेन ने पाकिस्तान से कहा कि वह जल्दबाजी में तालिबान को मान्यता न दें। विश्व समुदाय भी इस मामले को लेकर चिंतित हैं। आज तालिबानी लड़ाके दो राहे पर खड़े हैें। पूर्व राष्ट्रपति हामिद करजई के माध्यम से तालिबान का शीर्ष नेतृत्व यहां-वहां बातचीत कर रहा है। पूरे देश में अफरा-तफरी का माहौल बना हुआ है। पूरे देश में गृहयुद्ध जैसी स्थिति निर्मित हो गई है। अफगानिस्तान का पढ़ा-लिखा वर्ग तालिबानियों का विरोध कर रहे हैं। वहीं यहां की शत-प्रतिशत महिलाएं भी तालिबान के विरोध में खड़ी हैं। तालिबानी सोच के लोग महिलाओं की आजादी के सख्त खिलाफ हैं। अमेरिका के तालिबान में 1996 के बाद जैसे हालात वियतनाम में हुए थे और उसे 19 साल बाद वियतनाम से उसी तरह निकलना पड़ा, अपमानित होना पड़ा जैसा इन दिनों अफगानिस्तान में हो रहा है। अमेरिका जो अपने आपको महाशक्ति समझता है जिसका सबसे बड़ा शत्रु तालिबान और उनकी तालिबानी विजय को लेकर बाकी दुनिया के देशों की तरह ही हमारे देश में भी काफी उथल-पुथल, गहमागहमी मची हुई है। अफगानिस्तान के जो छात्र भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में पढ़ रहे थे, वे परिवारजनों की सुरक्षा को लेकर अपने वतन लौट रहे हैं। पाकिस्तान, रूस, चीन जैसे देश तालिबानियों का समर्थन कर रहे हैं, वहीं अमेरिका, भारत जैसे देश भ्रम में हैं। कहीं बैठे ठाले पाकिस्तान की ही तरह तालिबान को ही अपना कट्टर दुश्मन न बना ले।

भारत में अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जे को लेकर बयानबाजी शुरु हो गई है। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड प्रवक्ता कह रहे हैं कि निर्दत्यी कौम ने दुनिया की सबसे मजबूत फौजों को शिकस्त दी, हिन्दुस्तानी मुसलमान का सलाम। समाजवादी पार्टी के सांसद शफीक उर रहमान तर्क कहते हैं कि तालिबान एक ताकत है और उसने अफगान में अमेरिका के पांव जमाने नहीं दिये। मशहूर शायर मुन्नवर राणा का कहना है कि तालिबान ने अपने मुल्क को आजाद करा लिया दिक्कत क्या है? अफगानिस्तान से आ रही खबरों और तस्वीरों में वहां पर महिलाओं पर होने वाली ज्यादती को दिखाया जा रहा है। अमेरिका सहित 21 देशों ने महिलाओं के अधिकारों की रक्षा को लेकर चिंता जताते हुए संयुक्त बयान जारी किया है। अमेरिका की वापसी और तालिबानियों को ताजपोशी को पाकिस्तान अपनी सबसे बड़ी विजय के रूप में देख रहा है।

तालिबान को लेकर इस समय अमेरिका और रूस का रूख नरम है। अमेरिका का पढ़ा-लिखा तबका अफगानिस्तान से अमेरिका की वापसी को अच्छा नहीं नहीं मान रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि आने वाले समय में तालिबान के जरिए चीन, रूस उसे आंख दिखायेंगे। तालिबानियों की सत्ता काबिज होने से चीन को फायदा होगा। पाकिस्तान का झुकाव चीन की ओर ज्यादा है। अफगानिस्तान सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण देश है, जहां से पूरे पश्चिम एशिया को कंट्रोल किया जा सकता है। वरिष्ठ पत्रकार वेदप्रकाश वैदिक का कहना है कि काबुल पर तालिबान का कब्जा होने ही वाला था लेकिन हमारा प्रधानमंत्री कार्यालय, विदेश मंत्रालय और हमारा रॉ सोता रहा।

अफगानिस्तान में कोई भी उथल-पुथल होती है तो उसका सबसे ज्यादा असर पाकिस्तान और भारत पर होता है। भारत सुरक्षा परिषद का अध्यक्ष है। भारत को अफगानिस्तान में संयुक्त राष्ट्र की एक शांति-सेना भेजने का प्रस्ताव पास करवाना चाहिए। 1999 में हमारे अपहृत जहाज को कंधार से छुड़वाने में तालिबान नेता मुल्ला उमर ने हमारी मदद की थी। हामिद करजई और डॉ. अब्दुल्ला हमारे मित्र हैं। यदि वे तालिबान से सीधी बात कर रहे हैं तो हमें किसने रोका हुआ है?
अफगानिस्तान के डरे हुए नागरिकों को तालिबानी सुरक्षा का आश्वासन दे रहे हैं वे महिलाओं से पढ़े-लिखे लोगों से बिना डरे काम पर आने की अपील कर रहे हैं। अफगान नागरिक राजधानी काबुल छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की ओर भाग रहे हैं। राष्ट्रपति अब्दुल गनी काबुल की औरतें अपनी आजादी के लिए संघर्षरत हैं। तालिबानी सोच के लोग औरतों को बुर्का में घर चार दीवारी में देखना चाहती है। लंबे समय तक सेना के बूते राज के करने वालो अमेरिका अब अफगानिस्तान से रवाना हो चुकी है। पूरी दुनिया को यह भी संदेश चला गया है कि कोई भी सत्ता सेना के बल पर टिक नहीं सकती यदि वहां की जनता उसका साथ न दे तो।
अमेरिका ने 1987-88 में सोवियत संघ यानी रूस को अफगानिस्तान से खदेडऩे के लिए वहां के कबाइली गुटों को पाकिस्तान के जरिए हथियार देकर संगठित किया और एक लड़ाका फौज तैयार की। ये लड़ाके कट्टरपंथी सोच के थे इन्होंने सबसे पहले वहां से गैर मुस्लिम लोगों को खदेड़ा। अमेरिका ने 1996 के बाद से 25 सालों तक सेना के माध्यम से यहां राज किया, अब अमेरिका सहित सभी लोग नदारद हैं और मासूम जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम कर रही है।  

अफगानिस्तान को लेकर भारत फिलहाल अनिर्णय की स्थिति में है। जिस तरह भारत सरकार अमेरिकी खेमे के साथ खड़ी दिख रही है और अपने पड़ोसी देशों से संबंध बिगाड़ चुकी है। अब वक्त का तकाजा है कि वह अपनी विदेश नीति पर पुनर्विचार करें। भविष्य में विश्व शक्ति बनने का दम भरने वाली सरकार अपने पड़ोसी देश की भयावह स्थिति पर अभी तक चुप्पी साधे हुए हैं, यह आश्चर्यजनक है। दुनिया के तमाम ताकतवर देश भी चुप्पी साधे हैं, अफगानिस्तान की स्थिति विश्व समुदाय को हस्तक्षेप करना चाहिए। 2001 में अमेरिका के नियंत्रण से पहले तालिबानी अफगानिस्तानी को तबाह कर चुके  थे। काबुल में सिटी सेंटर है जहां बाबर को दफनाया गया था।

काबुलीवाला हमारे बच्चों के बीच एक मददगार दोस्त की तरह उपस्थित रहा है। अफगानिस्तान में करीब 30 ट्राइब्स हैं, यह मुख्यत: जनजातियों का देश है जहां से पढ़े-लिखे लोग भी निकले हैं। वे बहुत थोड़े हैं। इस देश में जनजातियों के बीच मतभेद इतने गहरे रहे हैं कि पानी को लेकर अक्सर विवाद होता है। अफगानिस्तान कभी गुलाब के मैदानों और अंगूर के खेतों से भरा था। यह एक सूखा देश है, सूखे मेवे के लिए मशहूर। हेरात को अंगूर की जन्मभूमि माना जाता है, जो अब गोला बारुद से लहूलुहान हो रही। अफगानिस्तान के लोग आत्मबोध की जगह भारत और पाकिस्तान के समर्थन में बंटे रहे हैं। तालिबानों के लिए आजादी का मतलब अपने देश से अमेरिका को हटाना और धार्मिक मतंाधता है तो अमेरिका सहयोगियों की नजर में आजादी का मतलब अफगानिस्तान को पश्चिमी संस्कृति की तरफ खोलना रहा है। अमेरिका के जाने के बाद अब तालिबान वापस आ गया है। हालांकि तालिबान अब दुनिया में महज एक संगठन नहीं है, एक मानसिकता है जो कहीं भी और किसे में हो सकती है। हमारे अपने देश में अलग-अलग खाप पंचायतों और सामाजिक रीति-रिवाज परंपरा संरचना को बनाए रखने के नाम पर बहुत से  तालिबानी सोच के लोग मौजूद हैं जो देश को 18वीं सदी में ही कथित आत्मगौरव की संस्कृति से परिपूर्ण देखना चाहते हैं।

अफगानिस्तान की सत्ता हथियाने के बाद तालिबान ने भारत से सभी तरह के आयात-निर्यात पर रोक लगा दी। तालिबान ने फिलहाल पाकिस्तान के ट्रांजिट रूट्स से होने वाली सभी कार्गो मूवमेंट पर रोक लगा दी है। इस निर्णय के बाद अफगानिस्तान से आयात पूरी तरह से बंद हो चुका है। भारत के अफगानिस्तान के साथ सदियों पुराने संबंध है। भारत ने वहां भारी निवेश किया हुआ है। भारत अफगानिस्तान के सबसे बड़े पार्टनर्स में से एक है। 2021 में अफगानिस्तान को भारत का निर्यात 83.5 करोड़ डॉलर का रहा। इस दौरान भारत ने वहां से 51 करोड़ डॉलर का सामान आयात किया।

भारत ने वहां 3 अरब डॉलर का निवेश किया है। भारत वहां 400 परियोजनाओं पर काम कर रहा है जिनमें से कुछ पर अब भी काम चल रहा है। भारत अफगानिस्तान को अपने कुछ सामान का निर्यात इंटरनेशनल नॉर्थ-साउथ कॉरिडोर से करता है जो ठीक चल रहा है। साथ ही कुछ निर्यात दुबई रूट से भी होता है। वह भी ठीक चल रहा है। भारत, अफगानिस्तान को चीनी, फार्मास्युटिकल्स, चाय, कॉफी, मसाले और ट्रांसमिशन टावर्स का एक्सपोर्ट करता है। अफगानिस्तान में शांति के वादे के बावजूद तालिबान ने गुरुवार को असदाबाद शहर में राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहे प्रदर्शनकारियों पर गोलीबारी की जिससे भगदड़ मच गई और कई लोग मारे गए। विद्रोहियों के विरोध के पहले संकेतों में असदाबाद में प्रदर्शनकारी तालिबान के सफेद झंडे को फाड़कर राष्ट्रीय ध्वज लहरा रहे थे। आने वाले दिनों में देखना होगा कि तालिबान का नेतृत्व भारत के साथ किस तरह के रिश्ते रखता है। कहीं ऐसा न हो कि पाकिस्तान, चीन, तालिबान के कंधे पर बंदूर रखकर हम पर निशाना साधे।