COVID_19 : कुटीर उद्योग में लगे सैकड़ों परिवार संकट में, हस्तशिल्पकार मुफ्त में भोजन लेने से भी करते हैं परहेज

COVID_19 : कुटीर उद्योग में लगे सैकड़ों परिवार संकट में, हस्तशिल्पकार मुफ्त में भोजन लेने से भी करते हैं परहेज

अमरोहा, 13 अप्रैल |  पश्चिमी उत्तर प्रदेश के अमरोहा समेत तमाम जिलों में कोविड-19 महामारी ने ग्रामीण कुटीर उद्योग को झटका दिया है। महामारी से उत्पन्न हालात में ढोलक,बुनकर, सिलाई, दर्जी,लकडी और लोहे के कार्यों से जुडे गाडी लौहार, बागडिय़ा जैसे स्वाभिमानी मेहनतकशों के समक्ष पैसे का संकट खड़ा हो गया है। तमाम हस्तशिल्पकार मुफ्त में भोजन लेने से भी परहेज करते हैं, ऐसे में समस्या गंभीर हो चली है।प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कोरोना वायरस से बचने के उपायों के मद्देनजर भले ही साधारण गमछे का प्रयोग करने की नसीहत दे रहे हों लेकिन गमछा (अंगौछा) बनाने वाले बुनकर और कारीगर भी लॉकडाउन के चलते संकट में हैं।

ग्रामीण भारत में खेतिहर मजदूर और किसान कृषि कार्यों में गमछे का इस्तेमाल चेहरा ढकने के लिए सदियों से करते चले आए हैं।अमरोहा जिला काटन वेस्ट के मामले में दूर दूर तक प्रसिद्ध है। नौगावां सादात ,मंडी धनौरा समेत ग्रामीण इलाकों में बहुतायत में बुनकर अन्य परिधानों के अलावा रोजमर्रा के इस्तेमाल में आने वाले गमछा भी बनाते हैं, लेकिन लॉकडाउन में कच्चे माल की सप्लाई और बिक्री न होने से उनका कामकाज ठप है। जो माल पहले से बनकर तैयार रखा है वो बाजार तक पहुंच नहीं पा रहा है।मंडी धनौरा,चामुंडा मोहल्ले के पुलिस चौकी समीप निवासी मलवा टेलर, रईस अहमद कहते हैं, “ कोरोना वायरस फैलने से रोकने के उपायों में गमछा सबसे कारगर बचाव माना जा रहा है।

पूरे भारत में अचानक मांग बढने से किल्लत भी है, लेकिन जब हम कारीगर लोगों को काम के लिए माल ही नहीं मिलेगा तो कैसे अंगोछा बनाकर लोगों तक उपलब्ध हो पाएगा। जिले में हैंडलूम और कारखाने सिर्फ शोपीस बनकर रह गए हैं। ”उन्होने कहा कि उत्तर प्रदेश की महत्वाकांक्षी योजना वन डिस्ट्रिक वन प्रोडेक्ट में भी ढोलक निर्माण के लिए अमरोहा को जगह दी गई है लेकिन लाकडाउन के असर के चलते अब ढोलक निर्माण और बिक्री पूरी तरह ठप्प है।जिले के बुनकरों के मुताबिक उनके द्वारा तैयार किए गए उत्पादन भारत के कई राज्यों में जाते रहे हैं। हैंडलूम के लिए ज्यादातर कच्चा माल (सूत वाला धागा) कोलकाता और तमिलनाडु से आता है.

लेकिन लॉकडॉउन के चलते आवाजाही ठप है। जबसे लाकडाउन लगा है, सूत, धागा, रंग कुछ नहीं आ पा रहा है। जितना सामान था उतने दिन घर में काम हुआ। अब घर पर हैं कोई काम नहीं लेकिन बुनने के लिए कच्चा माल भी नहीं। दूसरा जो हमारे पास पहले से माल बनकर तैयार है वो बाजारों में नहीं जा पा रहा है। जो पैसे थे वो खर्च हो गए। आगे तो पेट पालना मुश्किल हो जाएगा।दस सदस्यों वाले परिवार का पालन पोषण करने मे जुटी रईस की पत्नी ने कहा “ न पति बाहर से पैसे ला पा रहे हैं और न मैं यहां काम कर पा रहीं हूं। हमारे बच्चे बीमार है घर में एक दाना खाने को नहीं है कुछ समझ में नहीं आता है आगे के दिन कैसे बीतेंगे।

उन्होंने कहा “ सुना है कि सरकार सड़क किनारे ठेला और दूसरी दुकाने लगाने वालों को 1000 रुपए महीना दे रही है लेकिन हम जैसे को पैसे कैसे मिलेंगे ये नहीं पता। ”रईस अहमद ने परिवार के सामने खाने के लाले पडने पर पत्रकार से समस्या के चलते मदद करने की अपील की तो वह नगरपालिका अध्यक्ष से लेकर जिलाधिकारी, उपजिलाधिकारी तक के निशाने पर आ गया। नगरपालिका के जूनियर इंजीनियर समेत दो लोगों ने उसके खिलाफ कार्यवाही करने की धमकी देकर चुप रहने की चेतावनी दे दी । आखिर में पत्रकार को ही उस कारीगर की मदद करने के लिए आगे आना पडा था।उसने कहा कि कस्बों और ग्रामीण इलाकों में लाकडाउन के चलते कारीगरों का परिदृश्य अच्छा नहीं है।यदि लाकडाउन अधिक समय तक जारी रहता है तो मेहनतकशों की हालत अनुमान से कहीं ज्यादा बुरी हो सकती है।