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साधारण जन ही लोकतंत्र को बचाते हैं

साधारण जन ही लोकतंत्र को बचाते हैं

अशोक वाजपेयी

इस महीने की 22 तारीख़ को याने 22 फरवरी 2021 से चित्रकार सैयद हैदर रज़ा का सौंवा वर्ष शुरू हो जायेगा. रज़ा के प्रिय कवि रिल्के ने रज़ा के प्रिय चित्रकार सेज़ां के बारे में लिखा था कि ‘जिस तरह एक सन्त ईश्वर से एकाकार हो जाता है, उसी तरह सेज़ां अपनी कला से एकाकार हो गये थे.’ यह उक्ति रज़ा पर भी पूरी तरह से लागू होती है. पिछले लगभग चार दशकों में उनसे जो मुलाक़ातें हुईं, उनके साथ जो समय बिताया उस दौरान बराबर यह अहसास गहराता गया कि रज़ा सिर्फ़ कला के लिए जीते हैं. इसे बहुत नज़दीक से माह-दर-माह रोज़-ब-रोज़ देखने का अवसर तब और मिला जब वे स्वदेश लौट आये और उन्हें लगभग 5 वर्ष 90 से ऊपर की आयु में बिला नागा कैनवास पर काम करते देखने का सुयोग मिलता रहा. उनके जीवन और उनकी कला के बीच कोई दूरी नहीं बची थी: उनका जीवन कला के लिए था और उनकी कला जीवन के लिए. जीवन-कर्म और कला-कर्म पूरी तरह से एकाकार हो गये थे, इस क़दर कि एक को दूसरे से अलगाना असम्भव था, अनावश्यक भी.

इस बीच अंग्रेज़ी में रज़ा की जीवनी कलाविदुषी यशोधरा डालमिया के अध्यवसाय से सुलिखित हार्पर कालिन्स द्वारा प्रकाशित की गयी है और फ्रेंच राजदूत उसका लोकार्पण करेंगे. इस जीवनी का हिन्दी अनुवाद आलोचक मदन सोनी कर रहे हैं और उसके अगले मार्च में प्रकाशित हो जाने की सम्भावना है. बरसों से डॉ. गीति सेन की रज़ा पर अंग्रेज़ी में लिखी पुस्तक ‘बिन्दु: स्पेस एण्ड टाइम इन रज़ाज़ विज़न’ अप्राप्य थी. इधर मैपिन ने उसका नया परिवर्धित संस्करण प्रकाशित किया है. रज़ा के पत्राचारों के दो संचयन भी जल्दी ही हिन्दी में आ रहे हैं.

रज़ा, अगर मुक्तिबोध के शब्द उधार लेकर कहें, जीवन भर ‘आत्मसम्भवा परम अभिव्यक्ति की खोज’ में लगे रहे. अपने जीवन और कार्य में उन्हें बहुत से लोगों, संस्थाओं आदि का संग-साथ मिला. अपनी जीवनयात्रा के साक्ष्य के रूप में वे निजी सामग्री संभालकर रखते रहे. 2010 के अन्त में जब वे अपने जीवन के आखि़री लगभग साढ़े पांच वर्ष बिताने भारत लौटे तो सौभाग्य से यह विपुल सामग्री अपने साथ ले आये. रज़ा फ़ाउण्डेशन ने इस सारी सामग्री को एकत्र और व्यवस्थित कर रज़ा अभिलेखागार स्थापित किया है. भारत में शायद ही किसी और कलाकार का ऐसा विस्तृत और सुनियोजित अभिलेखागार हो जैसा कि रज़ा का अब है. इस सामग्री से चयन कर चित्रकार अखिलेश ने एक प्रदर्शनी तैयार की है जो ‘अन्तरंग रज़ा’ शीर्षक से त्रिवेणी कला संगम दिल्ली में 6 फ़रवरी को शुरू हो रही है और 22 फरवरी तक चलेगी. यह सामग्री इससे पहले कभी सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं हुई है.

1 फ़रवरी से रज़ा के प्रिण्ट्स की एक प्रदर्शनी जबलपुर में शुरू हुई और बाद में कान्हा, मण्डला, इन्दौर, उज्जैन, भोपाल, बंगलोर, मैसूर, चेन्नई, कोच्चि आदि कई शहरों की परिक्रमा करेगी. शती के दौरान लक्ष्य लगभग पचास शहर कवर करने का है. फ़ाउण्डेशन इस वर्ष विशेष रूप से चुने गये बारह युवा कलाकारों को अपनी पहली एकल प्रदर्शनी लगाने के लिए गैलरी निःशुल्क उपलब्ध करायेगा. देश के कुछ कला-संस्थानों में मेधावी छात्रों के लिए रज़ा-100 छात्रवृत्ति देने की योजना पर काम चल रहा है.

रज़ा के जीवन, कला, दृष्टि आदि पर विशेषज्ञों द्वारा वार्ताओं की एक मासिक ऑनलाइन श्रृंखला मार्च 2021 से शुरू होगी जिसमें यशोधरा डालमिया, गीति सेन, रिबीना करोड़े, रणजीत होस्कोटे, अनी मान्तो, होमी भाभा आदि के वक्तव्य होंगे. पेरिस के विश्वविख्यात पाम्पिदू सेण्टर में जून से अगस्त 2021 तक चलने वाली रज़ा प्रदर्शनी में उनकी सौ सधिक कलाकृतियां शामिल की जा रही हैं. यह रज़ा की कला की सबसे बड़ी और ऐतिहासिक प्रदर्शनी होगी जो उनके विश्व कलाजगत् में स्थान को भी ज़ाहिर करेगी. उसकी तैयारियां चल रही हैं और उसमें 60 से अधिक कलाकृतियां भारत के निजी और सार्वजनिक संग्राहकों के पास से चुनी गयी हैं.

कवि-कलामर्मज्ञ रणजीत होस्कोटे द्वारा संग्रहीत रज़ा के चित्रों की एक प्रदर्शनी ‘तत्वों का नर्तन’ नाम से आकार प्रकार गैलरी नयी दिल्ली में 18 फ़रवरी से शुरू होगी और वढेरा आर्ट गैलरी नयी दिल्ली में रज़ा और उनके मित्रों के चित्रों की एक प्रदर्शनी गीज़र्स 22 फ़रवरी से शुरू होगी. रज़ा पर चित्रकार अखिलेश की संस्मरण-पुस्तक और कवि-कथाकार उदयन वाजपेयी द्वारा बच्चों के लिए रज़ा के कुछ चित्रों पर लिखी पुस्तक भी इस दौरान प्रकाशित हो रही है.

सत्यानाश की तरफ़ जाता लोकतंत्र

समाजविज्ञानी प्रताप भानु मेहता ने किसानों की बड़ी और अधिकांशतः शान्त रैली के दौरान एक छोटे से समूह द्वारा लाल किले पर निशान साहिब झण्डा फहराने की निन्दा करते हुए अपनी एक निर्भीक और तथ्य-पुष्ट टिप्पणी में यह स्पष्ट किया है कि इस अत्यन्त संदिग्ध घटना को लेकर सत्ता और उसकी गोदी में बैठे मीडिया द्वारा व्यवस्था की जिस भाषा का इस्तेमाल किया जा रहा है और राष्ट्रीय ध्वज को लेकर जिस तरह की श्रद्धा-भाषा का व्यवहार हो रहा है वह सिरे से पक्षपात भरी है. यह वह भाषा है जो असहमति को कुचलने के लिए हथियार बन रही है, दमन को शक्ति देती है, उसका उपयोग संवैधानिक मूल्यों की आत्मा को अपवित्र करने में हो रहा है. यह दुर्घटना बहाना बन गयी है हममें से बहुत सारे उदारचरित व्यक्तियों के सत्ता के समर्थन में खड़ा होने के लिए. इससे हमारा अन्तःकरण तुष्ट हो जाता है और हम नागरिक स्वतंत्रताओं के व्यवस्थित दमन, क्रोनी पूंजीवाद की अपार बढ़त, राज्य के भयानक साम्प्रदायिकीकरण, असहमति को अपराध बनाने की वृत्ति, संघवाद की अवहेलना और संस्थाओं के पतन को पूरी तरह से अनदेखा करने लगते हैं.

एकबारगी लगा था कि सत्ता ने किसान आन्दोलन को बदनाम करने में एक क़िस्म की अधम सफलता पा ली है. पर किसान आन्दोलन के नेताओं की सूझ-बूझ ने आन्दोलन को खण्डित होने से बचा लिया है. उन्होंने स्पष्ट रूप से लाल किले की घटना में लिप्त लोगों के विरुद्ध सख़्त कार्रवाई की मांग एक स्वर से की.

लोकतंत्र में हम जिस मुक़ाम पर आ गये हैं उसमें बहुसंख्यावाद और उससे उपजी मनमानी उसके सारे आधार को ही नष्ट करने पर आमादा है. यह समय दूसरों से ज्यादा अपने पर निगरानी का है कि किसी भी प्रलोभन या बहकावे में आकर हम लोकतंत्र की अपनी पक्षधरता और उसके लिए मुखरता में कोई शिथिलता न आने दें: कोई और नहीं, सत्ता और राजनीति नहीं, मीडिया और बाज़ार नहीं, साधारण जन ही लोकतंत्र को बचाते हैं. किसान आन्दोलन इस नामहीन साधारण जन की सशक्त और स्मरणीय अभिव्यक्ति है.