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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- मन चंगा तो कठौती में गंगा

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से- मन चंगा तो कठौती में गंगा


हमारे यहां कहावत है मन चंगा तो कठौती में गंगा। इधर मन की शुद्घता के लिए तो बहुत से साफ सन्यासी ऑनलाईन प्रवचनकार बड़े-बड़े होर्डिंग, इवेंट कंपनी, टीवी चैनल, सोशल मीडिया के जरिए मन को स्वच्छ, साफ, सुंदर रखने का ज्ञान पेल रहे हैं। ज्ञान और सीख हमेशा दूसरों के लिए दी जाती है। ग्लैमराईज जीवन जीने वाले तमाम सादगी के प्रवचनकारों की सीख के बावजूद
दोऊ जन तीरथ चले चीत चंचल मन चोर
एकऊ पाप न उतरया दस मन लादे और।।
जैसी स्थिति है। स्मार्ट सिटी परियोजना के आने के बाद से मन की बातें करने वाले स्वच्छता की बातें करके सबका दिल जीतने में लगे हैं। ये अलग बात है कि उनकी तमाम तपस्या, ईमानदार कोशिशों के बावजूद कुछ सिरफिरे लोग राष्ट्रहित और लोकहित को नहीं समझ पाये और अंतत: उन्हें ही क्षमा मांगनी पड़ी।

शहरी क्षेत्रों में बढ़ती जनसंख्या और अधोसंरचना की कमी के बावजूद देश में स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के चलते बहुत सारे मापदंडों पर कुछ शहरों, राज्यों को स्वच्छता के लिए हर साल पुरस्कृत करने की परंपरा रही है। मध्यप्रदेश के इंदौर नगर निगम ने एक बार फिर स्वच्छ शहर का सम्मान हासिल किया। वहीं एक राज्य के रुप में छत्तीसगढ़ को स्वच्छता अभियान में देश में पहला स्थान मिला है।

भारत के राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने स्वच्छ अमृत कार्यक्रम के अंतर्गत स्वच्छ राज्य की श्रेणी में छत्तीसगढ़ को प्रथम स्थान के लिए पुरस्कृत किया। इस अवसर पर छत्तीसगढ़ की सर्वाधिक 67 नगरीय निकायों विभिन्न श्रेणियों के अंतर्गत पुरस्कृत किया गया। नगरीय संस्थाओं के भीतर व्याप्त राजनीति, भ्रष्टाचार और जनअपेक्षाओं के कारण वहां पर काम करने और जन अपेक्षाओं पर खरा उतरना कठिन होता है। शहरों में प्रतिदिन गांवों से रोजगार के लिए शहरों की ओर कमाने-खाने आने वाली आबादी तथा तेजी से होते अतिक्रमण और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण यहां पर साफ-सफाई और लोगों को सिविलाईज तरीके से जीने के सलीके सीखना कठिन होता है। इंदौर जैसे शहर का पांचवी बार पुरस्कृत होना निश्चित रुप से वहां के नगरीय नेतृत्व की कार्यप्रणाली को दर्शाता है। छत्तीसगढ़ के छोटे-बड़े शहरों में सामान्यत: सफाई पसंद लोग रहते हैं किन्तु बुनियादी सुविधाओं का अभाव बहुत बार उन मापदंडों को पूरा करने में अमसर्थ रहते हैं जो पुरस्कार के लिए जरुरी है।  
स्वच्छ भारत के अंतर्गत सार्वभौमिक स्वच्छता प्राप्त करने के लिए 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत की गई। मिशन के अंतर्गत भारत में सभी गांवों, ग्राम पंचायतों, जिलों, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने ग्रामीण भारत में 100 मिलियन से अधिक शौचालयों का निर्माण करके 2 अक्टूबर 2019, महात्मा गांधी की 150वीं जयंती तक स्वयं को खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) घोषित किया।
मिशन के अंतर्गत स्वच्छ सर्वेक्षण में स्वच्छ राज्यों की श्रेणी में छत्तीसगढ़ को पहला महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश को क्रमश: दूसरा और तीसरा स्थान प्राप्त हुआ है। आवास व शहरी विकास मंत्रालय के अनुसार, स्वच्छ सर्वेक्षण में राष्ट्रीय स्तर पर 28 दिनों में 4,320 शहरों में 4.2 करोड़ लोगों की राय ली गई। एक लाख से कम आबादी वाले शहरों में महाराष्ट्र के विटा शहर को प्रथम पुरस्कार, एक से तीन लाख आबादी वाले छोटे स्वच्छ शहरों में नई दिल्ली नगरपालिका परिषद ने प्रथम स्थान हासिल किया। होशंगाबाद और तिरुपति श्रेष्ठ छोटे शहर के रूप में सम्मानित हुए। तीन से दस लाख आबादी की श्रेणी में नोएडा देश में अपनी पहचान बनाई है।  दूसरी मुम्बई कहा जाने वाला अहिल्या बाई होलकर मध्यप्रदेश का शहर इंदौर स्वच्छ सर्वेक्षण में लगातार पांचवीं बार अव्वल रहा। इंदौर नगर निगम (आईएमसी) कचरे को बायो-सीएनजी जैसे उत्पाद में बदलने वाले प्लांटों से सालाना आठ करोड़ कमा रहा है। इंदौर को पांचवीं दफा सबसे स्वच्छ शहर का तमगा दिलाने के पीछे शहर की निगम आयुक्त प्रतिभा पाल का बड़ा हाथ रहा है।  

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने स्वच्छ सर्वेक्षण-2021 पुरस्कार मिलने पर खुशी जाहिर करते हुए छत्तीसगढ़ के लोगों को बधाई दी। उन्होंने कहा कि पूरा विभाग, जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों ने मिलकर काम किया है। यही कारण है कि तीसरी बार यह पुरस्कार मिला है। आवास एवं शहरी मामलों के मंत्रालय द्वारा घोषित सर्वेक्षण में छत्तीसगढ़ को भारत का सबसे स्वच्छ राज्य घोषित किया गया है। सर्वेक्षण में वाराणसी को ''स्वच्छ गंगा शहरÓÓ की श्रेणी में प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ है।

जिन पैमानों पर स्वच्छ भारत मिशन के लिए नगरीय संस्थाओं को चुना गया उनमें जो विभिन्न मापदंडों के अंतर्गत शहरी स्वच्छता का आंकलन किया जाता है। मुख्य रूप से घर-घर से कचरा एकत्रीकरण, कचरे का वैज्ञानिक रीति से निपटान, खुले में शौचमुक्त शहर, कचरा मुक्त शहर आदि का थर्ड पार्टी के माध्यम से आंकलन करते हुए नागरिकों के फीडबैक को भी इसमें शामिल किया गया है। छत्तीसगढ़ देश का ऐसा एक मात्र प्रदेश है जहां पर नरवा, गरवा, घुरवा एवं बाड़ी के सिद्धांतों के अनुरूप 9000 से अधिक स्वच्छता दीदीयों द्वारा घर-घर से 1600 टन गीला एवं सूखा कचरा एकत्रीकरण करते हुए वैज्ञानिक रीति से कचरे का निपटान किया जाता है। इसके अलावा छत्तीसगढ़ को देश का प्रथम ओडीएफ प्लस प्लस राज्य निरूपित किया गया है।

भारत सरकार द्वारा छत्तीसगढ़ को देश का प्रथम ओडीएफ प्लस राज्य घोषित किया गया है। इससे पहले साल 2019 और 2020 में भी छत्तीसगढ़ को देश का सबसे साफ राज्य चुना गया था। स्वच्छता के क्षेत्र में राष्ट्रपति द्वारा दिए जाने वाले 239 पुरस्कारों में से 67 पुरस्कार छत्तीसगढ़ से संबंधित है। छत्तीसगढ़ के गांवों के 7 हजार 500 से अधिक गौठानों में लगभग 5 हजार स्व सहायता समूहों की 70 हजार महिलाएं विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से पर्यावरण को बेहतर बनाने में जुटी हुई है।
   
भले ही हमें साफ सफाई के लिए पुरुस्कार मिल गया हो लेकिन अभी चुनौती कम नहीं हुई है। राजधानी रायपुर जिस तेजी से महानगर की शक्ल ले रहा है, उतना ही इस शहर को साफ रखना कठिन होते जा रहा हो भले ही सरकारी पैरामीटर में रायपुर देश का छठवां क्लीन सिटी बन गया है, लेकिन अभी भी यहां बड़ी आबादी को नाली, पानी और गारबेज की समस्या का सामना करना पड़ता है। डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन होने के बाद भी शहर के चारो तरफ अवैध रूप से कचरा डंपिंग जोन बने हुए हैं। इसी तरह मवेशियों का कब्जा मुख्य मार्गों पर लगातार बना हुआ है आये दिन इसके चलते हादसे होते हैं लेकिन इस समस्या को लेकर हमारा नगरीय प्रशासन ज्यादा गंभीर कभी भी नजर नहीं आया। जिस तेजी से शहर के आउटस्कर्टस में आवासीय बस्तियों को मंजूरी मिल रही है, लेकिन वहां तक कोई नगरीय सुविधा मसलन स्ट्रीट लाइट ड्रेनेज की व्यवस्था अब तक नहीं हो पाई हैं। जल निकासी नहीं होने के कारण बारिश के दिनों में इसका खामियाजा पूरा शहर उठाता है। इसी तरह अवैध तरीके से लग रहे बाजार बेतरतीब चौपाटियों को व्यवस्थित करना एक चुनौती है, ऐसे में हमें अपनी पीठ थपथपाने से पहले जो सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई है उसे और तेजी से आगे बढ़ाना है। ताकि हमें सरकारी ईनामों के साथ ही जनता की सराहना और खुशहाली मिल सके। कचरा कहीं भी हो किसी भी तरह का हो उसका साफ होना जरुरी है।
मेरे प्रिय कवि गजानन माधव मुक्तिबोध के शब्दों में-
जैसी है दुनिया उससे बेहतर चाहिए
सारा कचरा साफ करने को मेहतर चाहिए।