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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सत्ता की कैद में स्वतंत्र एजेंसियां !

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -  सत्ता की कैद में स्वतंत्र एजेंसियां !

- सुभाष मिश्र

केंद्रीय स्वतंत्र एजेंसियां हो या राज्य सरकारों के अधीन वाला महकमा अधिकांश नौकरशाह और वहां कुर्सी पर बैठे लोगों की निष्ठा हस्तिनापुर के प्रति होती है, उन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि गद्दी पर कौरव बैठे हैं या पांडव।

जांच एजेंसियों के लिए सबसे ज्यादा जरूरी चीज है साख लेकिन वो साख अब सवालों में है। आपको शायद याद होगा साल 2013 में कोयला घोटाले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सीबीआई पिंजरे में बंद वो तोता बन गई है जो अपने मालिक की बोली बोलती है।

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई को पिंजरे में बंद तोता कहा तो बहुत सारे विपक्षी नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाया। बात ईडी की हो या इनकम टैक्स की जिनकी कार्रवाई की टाइमिंग को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के नोएडा में जनसंपर्क करते हैं तो उनके खिलाफ कोरोना नियमों के उल्लंघन को लेकर एफआईआर दर्ज  होती है, वहीं उत्तरप्रदेश के मंत्री , केंद्रीय नेताओं के जनसम्पर्क अभियान में खुलेआम कोरोना प्रोटोकाल की धज्जियां उड़ती है तो पुलिस बल उनके खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय संरक्षक की भूमिका में साथ खड़ा दिखाई देता है।   

छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने उनके खिलाफ दर्ज एफआईआर को लेकर चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा किया है। उनका कहना है कि चुनाव की शुरुआत में ही अब आयोग की भूमिका निष्पक्ष नजर नहीं आ रही है तो आगे क्या होगा ? इस कार्रवाई के खिलाफ प्रदेशभर में एनएसयूआई ने इसको लेकर गुस्से का इजहार किया है। केंद्रीय एजेंसी  इनकमटैक्स ने हाल ही में उत्तरप्रदेश और पंजाब में विपक्षी दलों से जुड़े, नेताओं और उनके रिश्तेदारों के घरों में ताबड़तोड़ कार्रवाई की। यूपी में जहां इत्र कारोबारियों के खिलाफ हुई कार्रवाई को अखिलेश यादव को कमजोर करने की कवायद से जोड़ा जा रहा है। वहीं मंगलवार को पंजाब के मुख्यमंत्री चन्नी के करीबियों के ठिकानों पर ईडी ने छापा मारा है। आपको बता दें कि, ईडी ने 18 जनवरी की सुबह मोहाली समेत कई जगहों पर छापेमारी शुरू की। बताया गया कि अवैध खनन को लेकर ये छापेमारी चल रही है इसके बाद जानकारी सामने आई कि जिन लोगों पर छापेमारी चल रही है, वो सीएम चन्नी के रिश्तेदार हैं। इसमें उनके साले के लड़के का नाम भी शामिल बताया जा रहा है। इस कार्रवाई को लेकर सीएम चन्नी ने बयान दिया है कि ये लोग मुझे निशाना बना रहे हैं और आने वाले विधानसभा चुनावों को लेकर मुझ पर दबाव डालना चाहते हैं। यह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। हम इससे लडऩे के लिए तैयार हैं। पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के समय भी ऐसा ही हुआ था। केन्द्रीय एजेंसियों पर चुनाव के वक्त दुरुपयोग के आरोप लगातार लग रहे हैं। हाल ही में हमने पंश्चिम बंगाल के चुनाव में देखा जब ममता बनर्जी ने इस मुद्दे पर केन्द्र सरकार को सवालों के घेरे में लिया था, इससे पहले अरविंद केजरीवाल, दिग्विजय सिंह लगातार इस तरह के आरोप लगाते रहे हैं। राजनैतिक स्तर पर ही नहीं, कुछ दिनों शाहरुख खान के बेटे आर्यन को ड्रग मामले में जिस तरह गिरफ्तार किया गया और उस पर कई एजेंसियों ने जांच और पूछताछ के नाम पर कार्रवाई की उसको लेकर भी कई नेताओं ने खुलकर कहा कि केन्द्र सरकार अपनी एजेंसियां सीबीआई, ईडी और एनसीबी का इस्तेमाल कर एसआरके को टारगेट कर रही है। शिवसेना ने तो इस मामले में कहा था कि भारतीय जनता पार्टी ऐसा मानकर चल रही है कि केंद्रीय जांच एजेंसियां की आका वही है लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि लोकतंत्र में आका बदलते रहते हैं।

जहां तक निर्वाचन आयोग की भूमिका पर उठ रहे सवाल की बात है तो आपको बता दें कि 1990 के दशक में जब टीएन शेषन भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त हुए, तब उन्होंने ही सबसे पहले आयोग के अधिकारों का न केवल इस्तेमाल करना शुरू किया, बल्कि कानून और नियमों के कल्पनाशील प्रयोग द्वारा उसके अधिकार क्षेत्र के दायरे का भी विस्तार किया। उन्होंने ही चुनाव की घोषणा होते ही आदर्श आचार संहिता का पालन अनिवार्य बना दिया और चुनाव खर्च पर निगरानी रखने और हिंसा, मतदान केन्द्रों पर जबर्दस्ती कब्जा करने की घटनाओं आदि को रोकने के लिए सख्त कदम उठाए। चुनाव की घोषणा होते ही चुनाव संबंधी कार्य के लिए पूरे देश की प्रशासनिक मशीनरी आयोग के निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य होती है. सेषन ने पहली बार अधिकारियों के तबादले करने के आयोग के अधिकार का प्रयोग किया। इसी प्रक्रिया को जे एम लिंगदोह ने और मजबूती के साथ आगे बढ़ाया. इस कारण देशवासियों के मन में और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी आयोग की प्रतिष्ठा और गरिमा बढ़ी लेकिन कुछ सालों के बाद खासतौर पर 2010 के बाद निर्वाचन आयोग को लेकर भी सवाल खड़े होने लग गए।
2019 लोकसभा चुनाव से पहले एक मीडिया हाउस ने एक सर्वे कराया था और अपने पाठकों से जानने की कोशिश की थी कि उन्हें क्या लगता है कि स्वतंत्र एजेंसियों का इस्तेमाल सरकार अपने हित के लिए कर रही है। इस सर्वे में शामिल 70 फीसदी लोगों का मानना था कि सरकार स्वतंत्र एजेंसियों को अपने हिसाब से हांक रही है। भारत सरकार के पूर्व सचिव ईएएस सरमा कहते हैं- कि 1990 के पूर्वार्ध में जब शेषन ने निर्वाचन आयोग में जान डाल दी थी,
तब आयोग कद्दावर हो गया था। आज भी दो दशकों बाद शेषन का नाम समूचे देश में घर-घर लिया जाता है। उनका नाम स्वतंत्र चुनाव निगरानी का पर्याय हो गया है। यद्यपि उनकी स्मृति आज भी प्रत्येक भारतीयों के दिल में बसी हुई है, यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि निर्वाचन आयोग की प्रतिष्ठा में गिरावट आया है।  क्या यह निर्वाचन आयोग के लिए उचित समय नहीं है कि वह स्वयं के बारे में  और अपनी भूमिका  को लेकर गहन चिंतन करे?  ग्रीक दार्शनिक सुकरात ने कहा था, अच्छी ख्याति अर्जित करने का एक रास्ता वह है कि जो तुम बाहर दिखना चाहते हो, उसके लिए निरंतर प्रयास करो लेकिन वर्तमान इस तरह की कोशिश हमारे इन स्वतंत्र एजेंसियों के कर्ताधर्ताओं में शायद नजर नहीं आ रही है।