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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -गंगा पर लाशों की नाकाबंदी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -गंगा पर लाशों की नाकाबंदी

-सुभाष मिश्र
सामान्य अवस्था में संविधान प्रदत्त अधिकार के तहत देश के भीतर आवाजाही का अधिकार प्रत्येक नागरिक को है। देश से बाहर जाने के लिए वीसा, पासपोर्ट की जरूरत होती है। कोरोना संक्रमण की भयावहता और रोकथाम के लिए फिलहाल कुछ राज्यों, जिलों में पास के जरिए लोगों की आवाजाही हो रही है। मोक्षदायिनी पवित्र नदी गंगा में उत्तर प्रदेश से लाशे बहकर बिहार की ओर न जाये इसके लिए बक्सर के पास गंगा नदीं में दो जगह बड़े जाल लगाए गये हैं। अब लाशों से पहचान के लिए उनका आधार, पासपोर्ट सब कुछ मांगा जायेगा। पवित्र नदी मां गंगा जिसमें डूबकी लगाने से सारे पाप दूर हो जाते हैं, जिसके संगम पर हिन्दू मृतकों की अस्थियां इस आस्था और कर्मकांड के साथ विसर्जित की जाती है कि मृतक को मोक्ष मिलेगा और वह स्वर्ग लोक वासी होगा, वहीं गंगा इन दिनों बहती हुई लाशों से उबली जा रही है। उत्तरप्रदेश से बिहार तक का 1140 किलोमीटर का सफर तय करने वाली गंगा नदी स्वयं और इसके तट अच्छे खासे रेत के श्मशान बने हुए हैं। अब अकेला बनारस का मर्णिकर्णिका घाट ही नहीं है जहां लगातार चिताएं जलती हो, देश में जगह-जगह मर्णिकर्णिका घाट दिखाई दे रहे हैं। सम्मान जनक अंतिम संस्कार के लिए तरसते मृतकों के रेत में दफन व नदी में तैरते शव को देखकर मानवता शर्मसार है। मृतकों के परिवार मारे भय या आर्थिक अभाव के लिए अग्नि संस्कार की लकड़ी तक नहीं जुटा पा रहे हैं। सरकार ने कोरोना गाईड लाईन जारी कर अंतिम संस्कार के लिए कोविड प्रोटोकाल तय किए थे, वे शायद लाशों की शिनाख्त के बाद लागू होंगे।

जिस तरह हमारे देश में गाये दूध के कम दंगों के काम ज्यादा आती है, उसी तरह हमारी गंगा नदी भी राजनीति के लिए ज्यादा काम आ रही है। देश के प्रधानमंत्री मां गंगा के आह्वान पर बनारस जाकर चुनाव लड़ते हैं। गंगा सफाई के नाम पर साध्वी उमा भारती की देख रेख में एक नया विभाग बनता है। पूरे देश में जय गंगे के जयघोष के साथ गंगा सफाई अभियान शुरू होता है। गंगा है की साफ ही नहीं होती। कहावत है मन चंगा तो कटौती में गंगा। यहां तो मन की बात करने सुनने के बाद भी मन चंगा नहीं है।

कहते हैं लाश झूठ नहीं बोलती, लाश अपने पीछे कोई न कोई सबूत छोड़ जाती है। हां ये सही है बहती हुई और रेत में दफन हुई लाशों ने पूरे देश को कोरोना संक्रमण से निपटने के कथित झूठ और वादो की कलाई खोल दी। लाशें चीख-चीखकर कह रही है कि तुम्हारे सारे वादे, सारे इंतजाम, बयानबाजी झूठी है तुम हमारे हत्यारे हो। हम मरे नहीं है, मारे गये हैं।

अकेले कन्नौज के महादेवी गंगा घाट के पास करीब 350 से ज्यादा शव दफन है। स्थानीय प्रशासन इन पर मिट्टी डलवा रहा है, ताकि कोई देख न सके। कानपुर के शेरेश्चवर घाट के पास जमीन में दफन एक साथ बहुत सी लाश दिखी। जिन्हें कुत्ते नोंच रहे थे। कुछ लाशों पर चील और कौवे बैठे थे। उन्नाव के शुक्लागंज घाट और बक्सर घाट के पास करीब 900 से ज्यादा लाशें दफन हैं। यहां भी लाशों के साथ यथोचित संस्कार नहीं होने के सबूत के रूप में कहीं लाश का हाथ, किसी लाश का पैर नोचते पशु-पक्षी दिखे। अमूमन यही हाल उन्नाव से लगे फतेहपुर, प्रयागराज, वाराणसी, चंदौली, भदोही, मिर्जापुर में भी देखने को मिल रहे हैं। प्रयागराज से अब तक 13 शवों को गंगा और यमुना नदी से निकाला गया है। उत्तरप्रदेश जैसे हाल बिहार का भी है। बिहार के बक्सर में भी दो दिन पहले 100 से ज्यादा लाशें मिलीं थी। तब से बक्सर पुलिस ने गंगा में जाल लगवा दिया है। इस जाल में अभी तक 15 ज्यादा फंसी लाशों को बाहर निकलवाया गया है। बक्सर प्रशासन का दावा है कि ये लाशें उत्तरप्रदेश से बहकर आई है। हालांकि कई स्थानीय लोग जिनसे बीबीसी ने बातचीत की, उनका कहना है कि स्थानीय लोग ही शव के अंतिम संस्कार के महंगा होने और कोरोना के डर से लाश फेंक कर जा रहे हैं। नदी में मिल रही इतनी सारी लाशों को लेकर भी सुलह-सफाई जारी है। हिन्दू कर्मकांड के पंडित कहते हैं कि बिहार में अधिकांश जगह शव को जलाया जाता है। लेकिन सांप के काटने या विषम बीमारी जैसे कुष्ट रोग से हुई मौत में लाश को बड़े में पानी भरकर या केले के थंम (तना) के साथ नदी के बीचो-बीच प्रवाहित किया जाता है।

बहती हुई और रेत में दफनाई गई लाशों पर राजनीति शुरू हो गई है। कांग्रेस ने न्यायिक जांच की मांग की है। पर्यावरण के जानकारों का मानना है की इससे नदी का जल प्रदूषित होगा, बीमारियां फैलेगी। यदि कोरोना संक्रमित लोगों की लाश नदी के पानी में बही तो इससे नदी दूषित होगी, जिसका उपचार मुश्किल होगा। लोग समझाइश दे रहे हैं की अभी नदी के पानी को किसी भी काम के लिए इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ना तो अपने लिए और ना ही जानवरों के लिए मुंह, नाक, कान से कोविड का वायरस अंदर जाता है। अगर लोग इस पानी का इस्तेमाल करेंगे तो लोगों को बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियों के अलावा कोविड तक हो सकता है। ये जानले वासाबित हो सकता है। गंगा नदी में बहती हुई लाशे नमामि गंगे/ नेशनल मिशन फार क्लीन गंगा अभियान की पोल खोल रही है। नदी में बहती लाशे और रेत में दफन लाशे पूछ रही है कि वर्ष 2014 से प्रारंभ इस अभियान के लिए विश्व बैंक से लिए गए 4535 करोड़ कहां गए। इस परियोजना का पहला चरण इसी साल दिसंबर तक पूरा होना है। जिस बक्सर, मुंगेर, बेगूसराय में 1209 करोड़ रुपए की गंगा परियोजना चल रही है। वहां लाशों का इस तरह मिलना क्या शर्मनाक नहीं है। गंगा किनारे चलाएं जा रहे व्यापक जन जागरूकता अभियान क्या लोगों का यह तक नहीं बता पाया कि नदी में इस तरह लाशों मत बहाओ, रेत में जलाने वाले संस्कार की लाशों को ऐसे मत दफनाओं। गंगा बेसिन पांच राज्यों उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल की गंगा नदी के तट पर स्थित 1674 ग्राम पंचायतों की पहचान करके जो कार्य कराएं गये, जागरूकता अभियान चलाया गया, उनका क्या हुआ।
प्रसंगवश जसिंता केरकेट्टा की कविता
आक्सीजन की कमी से बहुत सी नदियों पर गई
पर किसी ने ध्यान नहीं दिया
कि उनकी लाशें तैर रही है
मरे हुए पानी ने अब भी
नदी की लाश के ऊपर
आदमी की लाश डाल देने से
किसी के अपराध पानी में घुल नहीं जाते
वे सब पानी में तैरते रहते हैं।