प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - लॉकडाउन के समय लोग कैसे कम आवश्यकताओं में जीना सीख रहे हैं

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - लॉकडाउन के समय लोग कैसे कम आवश्यकताओं में जीना सीख रहे हैं

बचपन से ये बात सुनते आ रहा हूं कि मजबूरी का नाम महात्मा गांधी। जब हमें मजबूरीवश कम से कम चीजों में अपना काम चलाना होता था, अभाव होता था तो लोग ये बात कहते थे। महात्मा गांधी गाहे-बहागे हम भारतीयों को और कभी-कभी पूरी दुनिया को याद आ जाते हैं। जो लोग पानी पी-पीकर गांधीजी को कोसते थे, उनकी हत्या जिसे इन्होने वध कहा, उन्हें भी गांधीजी की जरूरत पड़ऩे लगी है। कोरोना काल खंड में गांधीजी की प्रासंगिकता कुछ ज्यादा ही महसूस हो रही है। गांधीजी अपनी आवश्यकताओं को सीमित करने की बात करते थे। ग्राम स्वराज की बात करते थे।

लाकडाउन के कारण आज जब सारे बाजार, मॉल, आनलाईन खरीददारी बंद है, घर में सामान का आना-जाना बंद है, अपना काम खुद करना पड़ रहा है, मजबूरी में ही सही, हमने अपनी आवश्कताओं को सीमित किया है। वह बाजार जो उपभोक्ताओं के कारण अपनी भव्यता पर इतराता था, उसकी इतराहट अभी कम हुई है। कोरोना समय ने हमें मौका दिया है कि हम अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं के साथ जीना सीखें। अपनी जीवन पद्धति में बदलाव लायें। कोरोना वायरस के संक्रमण को रोकने के लिये लागू फिजिकल और सोशल डिस्टेंसिंग के चलते आजकल शादी-ब्याह, सार्वजनिक समारोह, मृत्यु आदि के अवसर पर कम से कम लोगों की उपस्थिति को शासन के आदेश पर ही सही, लोगों ने स्वीकारा है। यदि हम अपनी फिजूलखर्ची और दिखावा संस्कृति पर थोड़ा अंकुश स्वयं से लगायें और आने वाले कुछ सालों तक लाकडाउन में प्रचलित नियमों की ही तरह शादी-ब्याह, सार्वजनिक समारोह, मृत्युभोज आदि के अवसर पर सीमित संख्या में ही लोग बुलायें तो यह हमारी जीवन पद्धति के लिये सार्थक और मितव्ययिता वाला बदलाव होगा।

कोरोना काल के पहले भी बहुत से समाजों ने विवाह के अवसर पर अलग-अलग तरह के व्यंजन, नाच-गाने, दिखावे पर रोक लगायी थी, मृत्युभोज बैन किया था. अब हमें इसे सबके लिये मान्य करना होगा। दिखावा संस्कृति उच्च वर्ग से नीचे की ओर आती है। लोग देखा-देखी शादी-ब्याह, पारिवारिक आयोजनों, तेरहवीं, मृत्युभोज आदि के अवसर पर बहुत पैसों का अपव्यय करते हैं। धार्मिक समारोह के नाम पर भी बड़े पैमाने पर अपव्यय होता है। फिलहाल ये बंद हैं. यदि सरकार चाहे तो कोरोना कालखंड में लागू प्रतिबंधों को, जो दिखावा, अपव्यय और अनावश्यक खर्च से जुड़े हैं, उन्हें यथावत तीन साल तक लागू रखे ताकि ये नागरिक जीवन का व्यवहार हो जाये।

शासन का आदेश और सख्ती की बात इसलिए की 'बिन भय होए ना प्रीत गौंसाई। लोग अभी भी संस्कारित नहीं हुए हैं। उन्हें अपनी नागरिक जिम्मेदारियों का अहसास नहीं है। जरा सी छूट में परंपरा और दिखावा संस्कृति के नाम पर ये सब वो करने लगेंंगे, जो नहीं करना चाहिए। कोरोना के कारण पूरी दुनिया में जो आर्थिक मंदी और अर्थव्यवस्था में भूचाल आने वाला है, ऐसे समय में सभी को सोचना, होगा कि हम फिजूलखर्ची या अनउत्पादक व्यय को कैसे कम करें। जब लोगों के पास पैसे ही नहीं होगे तो उन्हें झक मारकर अपनी अब तक की दिखावा संस्कृति को 'गुडबाय कहना ही होगा। कोरोना कालखंड ने हमें श्रम के प्रति सम्मान के साथ ही एक—दूसरे पर निर्भरता का पाठ नये सिरे से पढ़ाया है।

हम जान गये हैं कि बिना साफ-सफाई, स्वच्छता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं हम स्वस्थ और सुरक्षित नहीं रह सकते। हमे दूसरों के जीवन में ताकझांक से भी मुक्ति का मार्ग कोरोना समय ने दिखाया है। एक ही घर-मोहल्ले में रहते हुए हम दूसरों की निजता (प्रायवेसी) का सम्मान कैसे कर सकते हैं, यह भी इन खराब दिनों में घर में बैठे-बैठे ना चाहते हुए भी हमने सीखा है। घर में बैठे बहुत से लोग इसलिये खुश हैं कि क्या गरीब क्या अमीर सबका भय, जीवन इस समय एक सा है। उन्हें नोटबंदी के समय का दृश्य याद आया है. आज अमीर से अमीर आदमी भी अपने घर में बड़ी-बड़ी गाड़ी घोड़े होने के बाद भी बंद है। उसे अपना काम खुद करना पड़ रहा है। इसके लिये इस समय सारी मौलिक सुविधाएं वैभव और मटरगस्ती बंद हैं।

जिन चीजों की हमें जरूरत नहीं है, वह चीजें भी हम खरीद लेते हैं क्योंकि बाजार ने इच्छा को जरूरत में बदल दिया है। कोरोना के लॉकडाउन ने हमें सीमित जरूरत में रहना सीखा दिया है। इस अवसर का लाभ उठाना होगा। बहुत सारी चीजों के बगैर भी हमारा जीवन आसानी से चल रहा है। कोरोना के खत्म होने के बाद बाजार एक बार फिर से आक्रमण करेगा और यह वित्तीय पूंजी से पोषित होगा तब सांस्कृतिक वातावरण में बदलाव होगा। बाजार फिर वही जीवन मूल्य पैदा करेगा, जहां आदमी एक बार फिर उपभोक्ता में बदल जाएगा, यही बाजार का काम है। लॉकडाउन इन सब चीजों से बचने और बदलने का अवसर दे रहा है, यदि हम खुद को बदल सकें और कम आवश्यकताओं में जीना सीख जाएंगे तो काफी सारी समस्याएं हल हो जाएंगी।

कोरोना समय ने हमें अपने को जानने का, अपने भीतर की रचनात्मकता, सृजनशीलता को तलाशने का अवसर दिया है। आज हमें ऐसे बहुत से वीडियो समाचार देखने मिल रहे हैं जिसमें अतिव्यस्त व्यक्तियों से लेकर साधारण लोगों ने भी अपने शौक को अभिव्यक्त किया है। आसमां की उंचाई की बात करने वाले भी इन दिनों जमीं की मिसाहिल पर चर्चा कर रहे हैं। जिनका अपने घर के बाग बगीचे, छोटी-छोटी चीजों से लगभग रिश्ता टूट सा गया था, वे भी अब उन पर ध्यान दे रहे हैं। वर्क फ्राम होम' के नये वर्क कल्चर ने लोगों को ज्यादा जवाबदार बनाया है। आफिस आने जाने में, ट्राफिक में जाने वाला समय बच रहा है। ऑफिसों का व्यय भी कम हो रहा है। बहुत सी कंपनियां अब ऐसे वर्क प्लान साफ्टवेयर तैयार कर रही हैं जिसमें लोग घर बैठकर ही काम करें। हमें कोरोना काल खंड से सबक लेते हुए अपने वर्क कल्चर को बदलने की जरूरत है। काम के लिए नई तकनीक, नये साफ्टवेयर की जरूरत है। खुद के बारे में नये सिरे से सोचने की जरूरत है।

कोरोना की तमाम भयावहता, नेगेटिविटी के बावजूद हमने पर्यावरण के प्रति बरती जा रही अपनी निर्ममता को महसूस किया है। आज जब कल—कारखाने, मोटरगाड़ी सब बंद है तो लोग नदियों, तालाब तक नहीं जा रहे हैं इससे हमारा पर्यावरण, नदी, तालाब आसमान सब साफ दिखाई दे रहे हैं। आने वाले दिनों में यदि हमने अपने पर्यावरण को अपनी आवश्यकताओं को कम करके दूषित होने से बचाया तो यह हमारे लिये और आने वाली पीढ़ी के लिये बेहतर होगा और यदि हमने इस घटना के बाद भी सबक नहीं लिया और कोरोना संकट समाप्त होते ही हम पहले की तरह ही सब कुछ करने लगे तो आने वाला समय बहुत ही खराब गुजरेगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।
कोरोना कालखंड में उत्पादन ईकाईयों के बंद होने से, खेती-किसानी के कार्य नहीं होने से तथा बाकी सभी कामकाज ठप हो जाने से अभी प्रायवेट सेक्टर में बड़े पैमाने पर नौकरियों से छंटनी चालू हो गई है।

बहुत सी राज्य सरकारों के पास अपने कर्मचारियों को वेतन देने के लिये पैसे नहीं है। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वह तत्काल उन सारे बड़े प्रोजेक्ट जिनसे भविष्य में किसी तरह का उत्पादन नहीं होना है, बंद करे। नया संसद भवन, नया विधानसभा भवन बनाने की जरूरत नहीं है। सांसदों, विधायकों के वेतन में 50 प्रतिशत से अधिक कटौती के साथ उन सारी सुख सुविधाओं, तामझाम, प्रोटोकाल पर होने वाले व्यय को कम करने होगा जिससे देश को किसी प्रकार का फायदा नहीं होता। यह एक प्रकार की दिखावा संस्कृति ही है। जब अर्थव्यवस्था चरमराती है, तो अच्छे से अच्छा आदमी भिखारी हो जाता है। हमने पूर्व में द्वितीय विश्व युद्ध के समय सोवियत रूस में आई आर्थिक तंगी का समय भी देखा है। जब बड़े से बड़ा आदमी ब्रेड खाने को तरस रहा था। हमें एक बार फिर गांधीजी के दर्शन को, अपनी आवश्यकताओं को, हिन्द स्वराज की अवधारणा को समझने की जरूरत है।

यह उपभोक्ता संस्कृति की गिरफ्त से बाहर आने की ज़रूरत पर पुनर्विचार करने का समय है। विपुल उत्पादन और असीमित उपभोग पर आधारित मौजूदा देर की वैश्विक सभ्यता और स्वकेन्द्रित  जीवन-शैली पर नैतिक नियंत्रण की आवश्यकता इस दौर का सबसे बड़ा सबक है। मिल-बाँट कर खाने की भारतीय जीवन-दृष्टि की सीख हमारी सामाजिक सहभागिता में प्रकट हो रही है। शुरुआती तकलीफ के बावजूद कामगार वर्ग के लोगों की मदद सरकार के अलावा समुदाय की ओर से भी की गई। यह हमारी सामाजिक सम्वेदनशीलता के विस्तार को सूचित करता है। अतीत में, उदाहरण के रूप में 1918 के इन्फ्लूएंजा या 1943 के बंगाल दुर्भिक्ष के समय मानवीय मूल्यों और सामाजिक सम्वेदनशीलता का बड़े पैमाने पर पतन देखने में आया था। आज की कोरोना आपदा में समूचा समाज एकजुट है। यह निश्चय ही सन्तोष का विषय है।

हमें अपनी जीवन पद्धति को बदलने की जरूरत है. इसमें सभी की सहभागिता जरूरी है. ताज भोपाली का शेर है-
मै चाहता हूं कि निजाम ए कुहन बदल डालूं
मगर ये बात फकत मेरे बस की बात नहीं
उठो, बढ़ो मेरी दुनिया के आम इंसानों
ये सब की बात है, दो-चार दस की बात नहीं।