breaking news New

संपादक अनिल द्विवेदी का कालम छत्तीस घाट : समुद्रों को नापता शख्स भूपेश बघेल, बदलाव के दू बछर

संपादक अनिल द्विवेदी का कालम छत्तीस घाट : समुद्रों को नापता शख्स भूपेश बघेल, बदलाव के दू बछर
  • अनिल द्विवेदी

दो साल पहले आज ही के दिन का वह लम्हा याद कीजिए. भूपेश बघेल राज्य के तीसरे मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले रहे थे तब भारतीय राजनीति का ऐसा छत्तीसगढ़ी संस्करण अवतरित हो रहा था जिसने अपने दोनों हाथ उठाकर हुंकार भरी थी, 'गढ़बो छत्तीसगढ़' अब जब वह अपनी हुकूमत के तीसरे वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं, तब सवाल उठना लाजिमी है कि वह कितने सफल रहे? गुलाबी आशावाद के साथ करोड़ों दिलों को बघेल में अपनी मिट्टी से जुड़ा एक ऐसा दिलोदानिश नजर आया है जिसने 20 सालों के सांस्कृतिक पतझड़ को समाप्त करते हुए उम्मीदों की बारिश ला दी.

गढ़बो छत्तीसगढ़' का नारा देते समय जब उनके आलोचक हंस रहे थे कि विकास—मॉडल क्या होगा तब भूपेश बघेल ने दिव्य—दृष्टि दिखाते हुए राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ग्राम्य—विकास आधारित स्वदेशी मॉडल को अपनाया और उस पर चल पड़े. राज्य में गोवंश के लिए 2200 गौठान बनाये, गौठान को प्रतिमाह 10,000 (दस हजार रूपये) सहायता राशि देने, गौठान के गोबर से गैस एवं अन्य उत्पादों का निर्माण करने, कुक्कुट पालन की शुरूआत करके उन्होंने किसानों का भविष्य संवारा और रोजगार के व्यवहारिक अवसर भी तलाशे. घरों से निकलने वाले गोबर एवं अन्य जैविक कचरों को खाद में बदलने की योजना तथा एक रूपये किलो गोबर खरीदने के संकल्प ने साबित किया कि वे ग्राम्य आधारित विकास की ओर अग्रसर हैं जिसका सपना पिछली सरकारों ने भी देखा था लेकिन वह पूरा ना हो सका. ये सभी अभियान अभी आधा रास्ता तक तय नहीं कर सके हैं, मगर इनका लोगों की सोच और उनकी छवि पर सकारात्मक असर पड़ा. अब अक्सर दूरस्थ गांवों से खबरें आती हैं कि फलाने किसान ने सिर्फ गोबर बेचकर हजारों कमा लिए.
 
कृषक परिवार से ताल्लुक रखने वाले सीएम भूपेश बघेल को समर्थक ‘पराक्रमी’ मानते हैं जबकि वे ‘आक्रमण ही सुरक्षा’ के सिद्धांत के पक्षधर हैं. चाहे कोरोना काल में केन्द्र सरकार से हक की बात करना हो या पार्टी के सम्मान और सुरक्षा के लिए जम्मू कश्मीर के उमर अब्दुल्ला से जुबानी जंग करना रहा हो, बघेलजी ‘बोल्ड’ सत्तानायक के तौर पर उभरे हैं. राज्य के सूबे की कमान संभालने के बाद उनके सामने दो चुनौतियां थी : पहला पार्टी के उस विकास मॉडल को पोषित और पल्लवित करना, जो राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने दिखाया था यानि कि ग्राम—सुराज आधारित विकास. और दूसरा छत्तीसगढ़ राज्य बनने के 19 साल तक जो छत्तीसगढ़िया गौरव और सम्मान उपेक्षित और वंचित रहा, उसे पुर्नस्थापित करना. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने इन दोनों को न्यायपरक ढंग से आगे बढ़ाया. अपने किसान होने को साबित करते हुए उन्होंने अन्नदेवता की सुध ली और नरवा—गरूआ—घुरूवा—बाड़ी, गौ धन संरक्षण और गोबर खरीदी के प्रोजेक्ट लाकर स्मार्ट—गांव बनाने की शुरूआत की.

सीएम भूपेश बघेल के व्यक्तित्व के कई शेड्स हैं. उन्होंने खुद को विनम्र और निचले तबके से आए व्यक्ति के रूप में पेश करते हुए ऐसे मुख्यमंत्री की पहचान स्थापित की है जिसने अपनी आस्था, विश्चास, ज्ञान और संस्कार से सधे फैसलों के भरोसे, कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी से लेकर देश के प्रत्येक वर्ग के दिलों में अपनी पैठ जमाई है. आश्चर्य कि डॉ. रमनसिंह को यह छबि बनाने में छह साल से ज्यादा का वक्त लग गया था! मुख्यमंत्री बनने के चंद दिनों बाद ही अपने चिर—परिचित प्रतिद्वंद्वी रहे स्व.अजीत जोगी का बढ़ाया हुआ दोस्ती का हाथ दिल खोलकर थाम लिया था. प्रधानमंत्री मोदी को उनके जन्मदिन पर बधाईयां और भाजपा की राज्यसभा सांसद सरोज पाण्डे को बहन मानते हुए राखी का उपहार भिजवाकर उन्होंने साबित किया कि दुश्मनी की कोई राजनीतिक सरहद उन्हें बांध नही सकती. अदभुत. भगवान श्रीकृष्ण ने सही कहा था कि कलियुग में वे राजा के फैसलों में विराजित रहेंगे.

वैसे लोकतंत्र में कोई सत्य सार्वजनीन नहीं होता. मत और मतांतर इस शासन प्रणाली के प्राण हैं इसीलिए जनादेश को नेताओं के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड माना जाता है. लगभग बीस महीने के कार्यकाल में बघेल सरकार ने मेहनत, लगन और ‘चेंज मैनेजमेंट’ की आदत से प्रतिपक्ष के ‘स्पेस’ को सिमटने पर मजबूर कर दिया है. वे सतर्क हैं कि उनकी छबि पर कोई धब्बा न लगे. आप पिछले दो साल की किसी जनसभा पर नजर डाल देखें, बघेलजी हर बार एक कदम आगे की यात्रा तय करते नजर आते हैं. मसलन, मुख्यमंत्री बनने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल जब पहली बार कार्यकर्ताओं से रूबरू होने राजीव भवन पहुंचे तो पार्टी के संघर्ष को याद करते हुए उनकी अश्रुधारा बह निकली थी! क्या आपको नहीं लगता कि वे अपने कार्यकर्ताओं की मेहनत और पार्टी के त्याग और बलिदान के गौरवशाली इतिहास को याद कर रहे होंगे. यही वजह है कि तमाम चुनावी वायदों के अधूरेपन के बावजूद आम आदमी का भरोसा उन पर कायम है. वह समाज के शोषितों और वंचितों को विश्वास दिलाने में कामयाब रहे हैं कि उनके हक-हुकूक के लिए ईमानदार कोशिश कर रहे हैं. यही वजह है कि विपक्ष अगर तथ्यों के साथ आरोप लगाता है कि धान खरीदी या कानून व्यवस्था का असफल होना उनकी नाकामी है, तब भी उन पर खास असर नहीं पड़ता.

लोकतंत्र में संकेतों और व्यक्तित्वों का बहुत महत्व है. विपक्ष के आरोप भोथरे साबित हो रहे हैं क्योंकि बघेलजी यह जताने में कामयाब रहे हैं कि मैं और मेरे साथी पूरी ईमानदारी से काम कर रहे हैं, मगर सरकारी मशीनरी और उनके मंत्री उपस्थितिहीन हैं. नौकरशाही बेलगाम है और कार्यकर्ता उपेक्षित महसूस कर रहे हैं. सीएम यह भी जानते हैं कि उनके बहुत से वायदे अभी तक आकार नहीं ले सके हैं. आज नहीं तो कल वे जरूर पूरे होंगे लेकिन जैसा कि कहावत है, डार के चूके बेंदरा अउ अषाढ़ के चूके किसान. इसलिए सतर्कता जरूरी है. बेलेन्स अ शार्प माइण्ड विथ अ वाइड ओपन हार्ट.

सफल लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष जरूरी है, पर छत्तीसगढ़ इस मामले में सौभाग्यशाली नहीं है. विपक्षी भाजपा संथारा कर रही है कि चुनाव की बेला आते तक सरकार के अधूरे वायदों का अंधियारा उसकी चमक को लीलने लगेगा, नया सूरज उगेगा और कमल खिलेगा, पिछले वर्षों में कुछ उम्मीदें जरूर बंधीं, पर वे बहुत जल्दी बिखर गईं. पूर्व मुख्यमंत्री डॉ.रमनसिंह से तो जनता ने पिण्ड छुड़ा लिया है लेकिन पार्टी के लिए अभी भी एकमात्र विकल्प—पुरूष हैं. कांग्रेस सरकार से लड़ने के लिए भाजपा ने जो सेनापति खड़े किए, वे तो रमनसिंह की छायामात्र हैं. प्रदेश भाजपा अध्यक्ष विष्णुदेव साय, नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक, डॉ.सरोज पाण्डे या विजय बघेल के नाम चर्चा में तो हैं लेकिन क्या उन्हें प्रदेशव्यापी उड़ान भरने दी जा रही है! इस सवाल के दायरे से बाहर निकलने के लिए उन्हें काफी जद्दोजहद करनी होगी और कुछ कर दिखाना होगा. विपक्ष ना भूले कि प्रजातंत्र की किस्मत महज 12 घण्टे में तय हो जाती है!

जनभावना और जनाकांक्षाएं उस हवा की तरह होती हैं, जो अचानक रुख बदल लेती हैं. क्या किसी ने सोचा था कि रायबरेली से इंदिरा गांधी हार सकती हैं! राजनीतिक सफलता स्थाई बनाने के लिए उसका सामाजिक सरोकारों से तालमेल आवश्यक है. इंदिरा गांधी उसमें असफल रही थीं. मुख्यमंत्री को भी हुकूमत के अगले तीन सालों में उन वायदों, दावों और अभियानों को सिरे तक पहुंचाने पर जोर लगाना होगा, जो उन्होंने प्रदेश की जनता से किए हैं. यदि वे सफल रहे तो छत्तीसगढ़ को गढ़ने वाले मुख्यमंत्री के तौर पर इतिहास पे दर्ज हो जाएंगे.


लेखक दैनिक आज की जनधारा व वेब मीडिया हाउस के संपादक हैं