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एम. जी. रोड पर देश

एम. जी. रोड पर देश

ध्रुव शुक्ल

राजधानी दिल्ली की यात्रा करते हुए जब भी किसी टेक्सी वाले से कहो कि महात्मा गांधी मार्ग चलना है तो वह आश्चर्य से पूछता है क्या एम. जी. रोड ? और उससे हाँ कहते हुए मन ही मन लगता है कि कहीं यह टेक्सी वाला एम.जी. रोड को मल्टीनेशनल ग्लोबल रोड तो नहीं कह रहा! राजधानी के किसी भी मार्ग से गुजरते हुए यही लगता है कि हम किसी मल्टीनेशनल ग्लोबल रोड पर ही चल रहे हैं। महात्मा गांधी मार्ग ढूँढे नहीं मिलता।

चमकीली सड़कें मार्ग नहीं हैं। मार्ग तो उन पर चलने वालों से निकलता होगा। किसी जगह आकर सड़कें खत्म हो जाती हैं पर मार्ग समाप्त नहीं होता। गांधी जी के कभी न रुकने वाले पाँवों की तरह आज भी लोगों के पाँव अपनी पगडण्डी रचते रहते हैं। गांधी जी की समाधि के करीब बैठकर यही लगता है कि धरती तो छोटे-छोटे गाँवों और उनसे जुड़ने वाली पगडण्डियों के लिए ही बनी है। राम अहल्या भूमि के उद्धार के लिए राज्य त्यागकर वन-ग्रामवासियों के साथ पैदल ही चले और अपहरित प्रकृति को बहुरूपियों से छुड़ाकर ही अयोध्या लौटे।