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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - मोदी के राजपथ पर भूपेश की गाय

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - मोदी के राजपथ पर भूपेश की गाय

-सुभाष मिश्र

दिल्ली के राजपथ पर हर साल 26 जनवरी गणतंत्र दिवस के अवसर पर अलग-अलग राज्यों के साथ-साथ विभागों की झांकी और सैन्य ताकत और अनुशासन को प्रदर्शित करने वाली परेड निकलती है। इस बार की झांकी में मोदीजी के राजपथ पर भूपेश बघेल की गाय दिखाई देगी। गोधन हमारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी होने के साथ ही साथ पूजनीय भी है। यही वजह है कि हमारे देश में गाय कई बार दूध देने के अलावा दंगा कराने के काम भी आती है। गाय को पूज बताने वाले बहुत से कथित गौरक्षक पिछले सालों में मॉब लिचिंग में संलग्न देखे गये। गाय के नाम पर दंगा करवा देना हमारे यहां आम बात रही है।  बात राजस्थान के अलवर में कथित गौरक्षकों द्वारा एक युवक की पीट-पीटकर हत्या का मामला हो या फिर जम्मू के रामबन जिले के मगरकोट में 60 साल के बुजुर्ग पर तथाकथित गोरक्षकों ने हमला कर दिया। मॉब लिंचिंग, खासतौर पर गोरक्षा के नाम पर देश में हो रही हिंसक घटनाओं को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए केंद्र व राज्य सरकारों को दिशा निर्देश जारी किए थे। साथ ही शीर्ष अदालत की तरफ से केंद्र और राज्य सरकारों को कानून बनाने के भी निर्देश दिए गए थे। गाय के नाम पर होने वाली मॉब लिंचिंग को रोकने के लिए मध्यप्रदेश सरकार ने कानून बनाया है। इस कानून के तहत गौवंश के नाम पर खुद को गौरक्षक बताकर हिंसा करने वाले लोगों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की बात कही गई है।

हमारे देश में गाय आस्था, अर्थव्यवस्था के साथ ही सियासत को हवा देने के लिए बेहद उपयुक्त पात्र है। इस बेजुबान पर समय समय पर कई बयान आते रहते हैं...। कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री मोदी ने कहा गाय के बारे में बात करना कुछ लोगों के लिए अपराध हो सकता है, लेकिन हमारे लिए, गाय माँ है और श्रद्धेय है, अक्सर भाजपा गाय को लेकर जो देश के करोड़ों लोगों की आस्था है उस पर टारगेट कर उन्हें अपना वोट बैंक में तब्दील करने की करती है..। यूपी चुनाव से पहले प्रधानमंत्री के बयान को आप इसी तरह ले सकते हैं...। क्योंकि जिस जीव को देश के प्रधानमंत्री अपनी मां का दर्जा दे रहे हों उसी गाय का मांस का व्यापार और इसके लिए उनकी हत्या करना देश के कई राज्यों में वैध है। तो सवाल उठता ही है कि गाय को लेकर आपकी पॉलटिक्स क्या है पार्टनर। गाय को लेकर कई तरह की बातें होते रही हैं लेकिन सही मायनों में देखा जाए हमारे समाज ने इसे मां घोषित कर सबसे ज्यादा शोषण इस पशु का हुआ है। आज हजारों लोग ऐसे हैं जो गाय पालते हैं लेकिन उसे घर पर पनाह नहीं देते। दिन भर गाय सड़कों पर भटकते रहती है। ये लोग शाम और सुबह दूध जरूर गाय का निकाल लेते हैं और खुद को गौभक्त, गौसेवक कहलाने में इन्हें आनंद आता है खुद को गौरवान्वित महसूस करते हैं। छत्तीसगढ़ में रमन सिंह की सरकार में बड़े पैमाने पर गौशाला खोली गई। सरकारी अनुदान भी दिया गया। किंतु जब इन गौशालाओं की दुर्दशा का खुलासा हुआ तो लोग हैरान रह गए कि कैसे गौसेवक बनकर लोग गाय को जीते जी नरक में धकेल रहे हैं और मरने के बाद उसकी हड्डी तक बेच दे रहे हैं।  छत्तीसगढ़ में गाय की साथर्कता और उसे अर्थ व्यवस्था से जोडऩे का काम प्रारंभ हुआ।

छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की सरकार आने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने जुलाई 20 से गोधन न्याय योजना को लागू कर ग्रामीण पशु पालकों को जहां गोबर की कीमत दिलाई है, वहीं इस गोबर से बनने वाले वर्मी कम्पोस्ट और अन्य सामानों से हजारों की संख्या में महिलाओं को रोजगार मिला है। इसी योजना की एक झांकी 26 जनवरी के मौके पर राजपथ से गुजरेगी।  छत्तीसगढ़ की झांकी के अगले भाग में गाय और गोबर को इक_ा करके उसे बेचने के लिए गोठानों की ओर ले जाती महिलाओं को दर्शाया जाएगा।

यह महिलाएं पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में होंगी। झांकी में एक महिला को गोबर से उत्पाद तैयार करके बेचने के लिए बाजार ले जाते दिखाया जाएगा। महिलाओं के चारों ओर गोठानों में साग-सब्जियों और फूलों की खेती दिखाई जाएगी। नीचे की तरफ गोबर से बने दीयों की सजावट की जाएगी। झांकी के पिछले हिस्से में गौठानों को रूरल इंडस्ट्रीयल पार्क के रूप में विकसित होते दर्शाया गया है।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने सतत विकास के लिए तय किया है उसके 2030 तक के लिए पूरी दुनिया का जो सार्वभौमिक एजेंडा तय किया है उसके अनुसार गरीबी, भूखमरी, स्वास्थ्य और खुशहाली, लैंगिक समानता, जल एवं स्वच्छता, ऊर्जा, आर्थिक वृद्धि,  बुनियादी सुविधाएं, उद्योग एवं नवाचार, असमानताओं में कमी, उपभोग एवं उत्पादन, जलवायु कार्रवाई, पारिस्थितिक प्रणालियां, शांति, न्याय और सामाजिक भागीदारी को शामिल किया है।  

देश का 9वां राज्य छत्तीसगढ़ सार्वभौमिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए पूरी दुनिया के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल रहा है। यही वजह है कि छत्तीसगढ़ ने एक भारतीय राज्य के होने के नाते छत्तीसगढ़ भी अपने देश और दुनिया के लिए अपने हिस्से की जिम्मेदारी भरपूर सफलताओं के साथ निभा रहा है। छत्तीसगढ़ की गोधन योजना एक ऐसी अनूठी योजना है, जिसके माध्यम से एक साथ इन सभी लक्ष्यों को साधा जा सकता है। न सिर्फ साधा जा सकता है, बल्कि बहुत तेजी के साथ साधा जा सकता है। डेढ़ वर्ष से भी कम समय में छत्तीसगढ़ ने यह साबित किया है। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि फायदों की तुलना में इस योजना की शुरुआती लागत नगण्य है। यह योजना आत्मनिर्भरता के साथ आम लोगों को भागीदार बनाती हुई विस्तार लेती जाती है।दरअसल 20 जुलाई 2020 से शुरु हुई गोधन योजना गांवों में पहले से मौजूद परंपराओं को पुनर्जीवित करके उन्हें संरक्षित करती है। उन्हें वैज्ञानिक और आधुनिक बनाती है। ग्रामीणों से इस योजना को बहुत जल्दी और आसानी से स्वीकार्यता मिलने का यही कारण है।गांवों में गौठानों का पुननिर्माण करके  इन्हें रूरल इंडस्ट्रीयल पार्क के रूप में विकसित किया जा रहा है। ग्रामीणों से 2 रुपए किलो में गोबर खरीदकर उससे जैविक खाद बनाने का उद्यम भी इन्हीं पार्कों में संचालित हो रहा है।

राज्य के 07 हजार 500 से ज्यादा गौठानों में स्व सहायता समूहों की हजारों महिलाएं इससे आय कमा रही हैं। वे अपने ही परिवार के किसानों को अपने उत्पाद, यानी जैविक खाद के इस्तेमाल के लिए प्रेरित करती हैं। यही कारण है कि छत्तीसगढ़ में रासायनिक खादों के इस्तेमाल में बहुत तेजी से एक तिहाई खपत कम हुई है। इससे अन्न, जल और वायु को विषाक्तता से बचाने में कामयाबी मिल रही है। गौठानों की संख्या को तेजी से बढ़ाते हुए राज्य में 10 हजार 500 से ज्यादा गौठानों को स्वीकृति दी जा चुकी है। गोधन योजना अनेक नवाचार करते हुए गोबर से दीये, अगरबत्ती, गमले जैसी चीजें बनाकर महिलाओं में उद्यम और बाजार की समझ तो विकसित करती ही है। अब गोबर से बिजली और प्राकृतिक पेंट के उत्पादन के माध्यम से उनके भीतर वैज्ञानिक शिक्षा और कौतुहल का भी निर्माण कर रही है। लैंगिक, आर्थिक और सामाजिक न्याय सुनिश्चित करती हुई यह योजना गोबर और कृषि अपशिष्ट की रिसाइक्लिंग करते हुए ग्रामीण स्वच्छता और स्वास्थ्य भी सुनिश्चित करती है। महिलाओं में स्वयं के और बच्चों के पोषण को लेकर न केवल चेतना का निर्माण करती है, बल्कि पशु-पालन, दुग्ध उत्पादन, विष-रहित अन्न के उत्पादन को बढ़ावा देकर पौष्टिक भोजन और पौष्टिक वातावरण की उपलब्धता भी सुनिश्चित करती है। फसल कटाई के बाद पराली प्रबंधन के लिए उन्हें जला देने के पारंपरिक तरीके से पर्यावरण में होने वाले कार्बन उत्सर्जन को रोकने के लिए भी गोधन न्याय योजना ने एक सुंदर और नैसर्गिक राह सुझाई है। छत्तीसगढ़ के किसान अब पराली जलाने के बजाय उन्हें गोठानों में दान कर देते हैं, जहां यह पशुओं का चारा बनकर, अंतत: धरती को पुन: उपजाऊ बनाती है। इस खरीफ सीजन में अब तक 7 लाख 33 हजार क्विंटल पराली का दान किसान कर चुके हैं, जिसका अनुमानित मूल्य 1465 लाख रुपए है।

छत्तीसगढ़ की गोधन न्याय योजना आज पूरे देश के लिए एक मॉडल के रुप में है। राजपथ पर निकलती झंाकी को देखकर पूरे देेश और दुनिया को नये सिरे से पशुधन को लेकर खासकरके गायों को लेकर एक नया दृष्टिकोण मिलेगा जहां गाय केवल कथित रुप से पूजने तक नहीं बल्कि आर्थिक स्वावलंबन के साथ भी खड़ी दिखाई देगी।