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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कांग्रेस की अंदरुनी कलह क्या रंग लाएगी?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - कांग्रेस की अंदरुनी कलह क्या रंग लाएगी?

-सुभाष मिश्र
देश को कोरोना मुक्त कराने की बजाय भाजपा, देश को कांग्रेस मुक्त भारत बनाना चाहती है। भाजपा का यह सपना कांग्रेस से अलग होकर बनी तुणमूल कांग्रेस जैसी पार्टी नष्ट कर देती है। भाजपा के साथ खेला हो जाता है और चीफ सेक्रेटरी सजा पाने की बजाय मुख्यमंत्री का विशेष सलाहाकार बन जाता है। भाजपा किसी भी तरह से पूरे देश में जनमत पाने के लिए प्रयासरत है, शायद ही वह उसमे सफल हो किन्तु कांग्रेस के बहुत से नेता खुद ही अपनी टीम में गोल मारने के लिए हमेशा आमदा रहते है। कहने को कांग्रेस के लिए यह प्रचारित किया जाता है की यहाँ एक ही परिवार की हुकूमत है किन्तु यहाँ जिस तरह की स्वतंत्रता, अराजकता है वैसी भाजपा में नहीं, कांग्रेस जन इसे आंतरिक लोकतंत्र कहते है। भाजपा एक काडर बेस पार्टी है जहा अनुशासन हीनता और नेतृत्व को चुनौती देना आत्मघाती कदम होता है। यही वजह है की अपने पूर्ववर्ती बागी नेताओ का हश्र देखकर भाजपा के नेता अपनी असहमति भी किसी मंच पर शेयर नहीं करते, वही कांग्रेस के नेता सीधे-सीधे आलाकमान को चुनौती देते दिखते है। भाजपा का डंडा या रिमोट संघ के हाथों में है। संघ समय-समय पर अपने बौध्दिक अभ्यास वर्ग के जरिए अनुशासन का पाठ पढ़ाता रहता है। पूर्ववर्ती जनसंघ यानि (वर्तमान भाजपा) के अध्यक्ष रहे बलराज मधोक हो या रथ यात्रा पर सवार होकर रामजन्म भूमि का आंदोलन खड़े करने वाले लालकृष्ण अडवाणी हो या भाजपा के विचारक गोविंदाचार्य हों, सब के सब आज हाशिये पर चले गए।

कांग्रेस में व्याप्त चाटुकारिता के चलते आपातकाल के समय कांग्रेस अध्यक्ष रहे  देवकांत बरुआ ने कहा था इंदिरा इज इंडिया, इंडिया इज इंदिरा। बाद में यही बरूआ जी कांग्रेस छोड़ कर चले गये, परन्तु भारतीय राजनीति के इतिहास में चाटुकारिता की शुरूआत कर गये, जो आज दूसरी पार्टियों में भी चरम पर है। कांग्रेस नेतृत्व अब पहले जैसा मजबूत नहीं रहा। कांग्रेस सत्ता को क्षेत्रीय दलों और भाजपा ने कुछ राज्यों तक सिमट कर रख दिया है। जिस मध्यप्रदेश में सालभर पहले कांग्रेस की बहुमत वाली कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार थी अब वह विपक्ष में बैठने को मजबूर है। चाल, चरित्र और चेहरे के साथ राजनीतिक सुचिता की बात करने वाली भाजपा ने यह सब कैसे किया ये कहानी आम है। मोटा भाई और छोटा भाई मिलकर जो ना करें वह थोड़ा है। बुरा हो कम्बख्त कोरोना का जो हाथ से फिसल गया राजस्थान, पंजाब और छत्तीसगढ़ तीन राज्यो में कांग्रेस की सत्ता है। राजस्थान में भी सचिन पायलट के ज़रिये बगावत का परचम बुलंद हुआ लेकिन अभी तक उसे सफलता नहीं मिली। किसी दिन राजस्थान कांग्रेस के हाथ से चला जायेगा और अशोक गहलोत जी को याद भी नहीं रहेगा तो कोई आश्चर्य नहीं होगा। उम्रदराज नेता अपनी याददाश्त कब खोने लगते हैं ये पता ही नहीं चलता। अब पंजाब में नवजोत सिद्दू कैप्टेन अमरिंदर सिंह की सरकार को चुनौती देते दिख रहे है। कांग्रेस शासित सभी राज्यों में अकेला छत्तीसगढ़ ऐसा राज्य है जहां पर कांग्रेस प्रचंड बहुमत से जीतकर आई। भूपेश बघेल के नेतृत्व में उसे और मजबूती  मिली। जो लोग भूपेश बघेल की दबंगता, स्पष्टवादिता और जुझारू तेवर से नाराज है या जिन्हे सत्ता में उस तरह की भागीदारी नहीं मिली जैसी उनकी अपेक्षा थी वे ही लोग लगातार इस बात को हवा देते रहते है की यहाँ की सत्ता ढाई -ढाई साल के बॅटवारे के आधार पर भूपेश बघेल को मिली है। अगली सत्ता के दावेदार टी एस सिंहदेव है किन्तु भूपेश बघेल के कामकाज, छत्तीसगढ़ी अस्मिता, सक्रियता और तेवर को देखकर तो लगता है कि वे जल्दी में नही हैं।

17 जून को भूपेश बघेल सरकार अपना ढाई साल का कार्यकाल पूरा कर रही है। गुजरे विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस पार्टी को बहुमत मिला था तो सरकार बनाने और मुख्यमंत्री तय करने की जिम्मेदारी कांग्रेस आलाकमान पर आ पड़ी थी। तबके कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मुख्यमंत्री के सभी दावेदारों से चर्चा की थी लेकिन भूपेश बघेल और टी एस सिंहदेव दोनों मुख्यमंत्री बनने पर अड़े हुए थे। तब संभवत यह रास्ता निकाला गया था कि दोनों ढाई-ढाई साल तक मुख्यमंत्री रहेंगे। हालांकि इसका कोई अधिकृत बयान या लिखित में कोई प्रमाण नहीं है।

कृषि मंत्री रविन्द्र चौबे ने कहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार में मुख्यमंत्री का कार्यकाल, ढाई-ढाई साल करने का ना तो कोई फार्मूला है, ना ऐसी कोई चर्चा है और ना ऐसा कुछ होने वाला है। इस पर स्वास्थ्य मंत्री टी एस सिंहदेव ने कहा कि चौबे कह रहे हैं तो सही ही होगा। रविन्द्र चौबे ने कहा कि कांग्रेस की सरकार मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के नेतृत्व में अपना कार्यकाल पूरा करेगी। वे सरकार का मुख्य चेहरा हैं और उनके नेतृत्व में सरकार 20 साल से ज्यादा राज करेगी।

मुख्यमंत्री भूपेश बघेल इन दिनों प्रदेश भर के कांग्रेस विधायकों को अपने निवास बुलाकर वन टूवन चर्चा कर रहे हैं। विधायकों से उनके क्षेत्र के विकास कार्य और वैक्सीनेशन, कोविड राहत के संबंध में जानकारी जुटा रहे हैं। वहीं इस मुलाकात को विपक्ष सियासी रंग दे रहा है। बीजेपी उपाध्यक्ष और विधायक शिवरतन शर्मा का कहना है कि जैसे-जैसे सरकार के ढाई साल पूरा होने की 17 जून की तारीख पास आ रही है वैसे-वैसे कांग्रेस की आंतरिक कलह उभरकर सामने आ रही है। सीएम की विधायकों से मुलाकात डैमेज कंट्रोल की कवायद है।

कुछ महीने पहले मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने दो टूक कहा था कि उनको आलाकमान ने पांच साल के लिए मुख्यमंत्री बनाया है। जब आलाकमान का निर्देश होगा, वो पद छोड़ देंगे। सीएम ने कहा कि हाईकमान अभी बोलेंगे तो यहां खड़े-खड़े आपसे बात करते-करते इस्तीफा दे दूंगा। मुझे पद का मोह नहीं है। लेकिन मुझे जो जिम्मेदारी दी गई है मैं उसका निर्वाहन कर रहा हूं। इस तरह की गलतफहमी किसी को पैदा नहीं करनी चाहिए। यह प्रदेश हित में नहीं है।

पंजाब में इस समय बड़ी उथल-पुथल मची हुई है क्योंकि अगले साल वहा  चुनाव होने है। नवजोत सिंह सिद्धू बगावती तेवर में है जिनकी वजह से कांग्रेस पार्टी पंजाब में गहरे संकट में है, जो उत्तर भारत में उसका आखिरी स्थायी गढ़ है। इस झगड़े को निपटाने के लिए कांग्रेस ने 3 सदस्यीय पैनल नियुक्त किया है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी द्वारा गठित पैनल में राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खडग़े, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत और पूर्व सांसद जेपी अग्रवाल शामिल हैं। यह विवाद वास्तव में सिंह और सिद्धू के बीच प्रतिद्वंद्विता का एक स्पिल ओवर है, जो 2017 से पहले का है। जब उपमुख्यमंत्री पद के लिए आशान्वित सिद्धू को सिंह की आपत्ति पर एक कम महत्वपूर्ण मंत्रालय सौंपा गया था। वर्तमान प्रकरण की शुरुआत सिद्धू के उस ट्वीट से हुई, जिसमें उन्होंने 2015 में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं और पुलिस फायरिंग में दो लोगों की हत्या को लेकर पंजाब के मुख्यमंत्री को निशाना बनाया था।

राजस्थान में भी बगावती तेवर अभी भी कायम हैं। सचिन पायलेट और उनके समर्थकों को लगता है कि उन्हे जो वेटेज, लाभ का पद मिलना चाहिए था वह नहीं मिला। अगले साल जिन राज्यो में विधानसभा चुनाव होने हैं वहां का सियासी पारा अभी ऐसे ही पंजाब की तरह गरमायेगा फिर योगी हो या मोदी। कोई ना कोई सुब्रमण्यम स्वामी कोरोना फेलियर को लेकर बयान देगा की नेतृत्व बदलो। नितीन गडकरी से मोदी को रिप्लेस करो। सत्ता का चरित्र हमेशा एक सा नहीं रहता। ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा के नारे के बाद भी भले ही खुद ना खायें पर अपने लोगो को खाने के भरपूर अवसर देकर दूसरी पार्टी के जयचंदो को भी रिसार्ट में ले जाकर खूब खिलाते-पिलाते हैं।

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