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ध्रुव शुक्ल की कविताः क्या बोलें, क्या नहीं

ध्रुव शुक्ल की कविताः क्या बोलें, क्या नहीं


कोई पास नहीं आता है बिना बोले

बोलो तो चला जाता है दूर

बकवास बन जाता है बोलना


देखो तो समय का फेर

यही तय नहीं कर पा रहे लोग

क्या बोलें, क्या नहीं


बोलने से रोज़ होती भोर

बोलने लगते हैं सब

बढ़ता जाता शोर

घर की दीवालें फाँदता

देश की सीमाएँ लाँघता 


कनफोड़ शोर मचाने की होड़

ताबड़तोड़ आपस में भिड़ता

शोर मचाने वालों का गठजोड़


जन समर्थन कुतर्क को

भूलते जा रहे हैं लोग

बकवास और बोलने के फर्क़ को


कैसी यह बोलने की आज़ादी

ज़ुबाँ नहीं बच रही 

किसी की सीधी-सादी

बोलें तो हर शब्द विवादी

ढूँढे नहीं मिल रहे गहरे

वादी और संवादी