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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-चिंतन शिविर की परंपरा और राजनीतिक पार्टियां

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-चिंतन शिविर की परंपरा और राजनीतिक पार्टियां


चिंतन शिविर या प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किसी भी राजनीतिक दल के लिए अपनी विचारधारा को आम जनता तक पहुंचाने के उद्देश्य से और कार्यकर्ताओं को बौद्धिक रूप से तैयार करने के लिये ज़रूरी उपक्रम है। लेकिन जब राजनीतिक दल व्यावहारिक राजनीति में कामयाबी और चुनावी सफलता जैसे अल्पकालिक लक्ष्यों को पाने के लिए चिंतन-शिविर का आयोजन करें तो सीमित लक्ष्य के अनुरूप उनकी सार्थकता भी सिमट जाती है। कार्यकर्ता भी अल्पकालिक लक्ष्यों को ही वास्तविक लक्ष्य समझने लगता है। यूँ भी राजनीति को अब चुनाव तक सीमित मान लिया गया है, जबकि इससे आगे राजनीति जनहित और देशहित में संचालित सचेत कार्यकलाप है, और इस रूप में वह समाज में व्यापक परिवर्तन लाने का माध्यम होना चाहिये। ज़ाहिर है, लोकतंत्र में चुनाव परिवर्तन लाने का एक माध्यम हो सकता है, स्वयं वह राजनीति का साध्य या लक्ष्य नहीं हो सकता। इसलिए व्यापक राष्ट्रहित में और देह के भविष्य के निर्माण की दृष्टि से बड़े सवालों पर इन शिविरों में विचार किया जाना चाहिये, जिनसे भावी पीढिय़ों की नियति जुड़ी है और जो मौजूदा समय में उतने ही प्रासंगिक भी हैं। मसलन रोजग़ार का संकट, अर्थव्यवस्था की अधोगति, भूमण्डलीकरण की राजनीति, वित्तीय पूंजी का मायावी रूप, कारपोरेट पूंजी का कुचक्र और उसमें फँसी जनता की नियति और भूमण्डलीकरण के चलते विकसित हो रही एकरूपता की संस्कृति ये एक-दूसरे में उलझे हुए प्रश्न हैं, जिन के संबंध में राजनीतिक कार्यकर्ताओं का दिमाग साफ होना चाहिए। ये सैद्धांतिक मुद्दे हैं लेकिन इनकी पर्याप्त समझ के अभाव में बौद्धिक रूप से पंगु कार्यकर्ता सिद्धांतहीन और नैतिकता विहीन राजनीति का मुकाबला नहीं कर सकता। लेकिन मुश्किल यह है कि कैडर आधारित दलों के नेतृत्व को छोड़ दें, तो मध्यमार्गी राजनीतिक दलों का नेतृत्व भी स्वयं बौद्धिक और वैचारिक रूप से पिछड़ा हुआ है। ऐसे में, इस तरह के चिंतन-शिविर या तो चुनावी प्रशिक्षण कार्यक्रम में या कार्यकर्ताओं को भावात्मक रूप से उत्तेजित और सक्रिय करने के आयोजन में सीमित हो जाते हैं।

छत्तीसगढ़ कांग्रेस कमेटी वर्धा सेवाग्राम में तीन दिवसीय चिंतन शिविर करने जा रही है। इस शिविर में गांधीवादी विचारों के साथ संगठन को मजबूत करने और काडर की गतिविधियों को संचालित करने पर जोर देने की बात कही गई है। शिविर में शहर, जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्षों सहित अन्य अनुषांगिक संगठनों के पदाधिकारी भाग लेंगे। कांग्रेस में चिंतन शिविर की परंपरा को एक व्यवस्थित रुप इंदिरा गांधी ने दिया। 1974 के नवंबर माह में उत्तरप्रदेश नरौरा (बुलंद शहर) में चिंतन शिविर हुआ। कांग्रेस का दूसरा चिंतन शिविर 1998 में पचमढ़ी में हुआ। जहां सोनिया गांधी की अगुवाई में एकला चलो की नीति बनाई गई। इसके बाद जनवरी 2013 में जयपुर में चिंतन शिविर हुआ। अधिकांश कॉडर बैस पार्टियां, संगठन समय-समय पर अपना आत्म आलोचना, मूल्यांकन और अपने समय की जरुरतों और चुनौतियों से निपटने के लिए चिंतन शिविर, कार्यशालाओं का आयोजन करते रहे हैं। अब सवाल यह है कि जब प्रशांत किशोर जैसे प्रोफेशनल रणनीतिकार, बहुत सारी कंपनियों, पार्टियों की रणनीति, नारे, एजेंडा तय करने लगे हों तब इस तरह के चिंंतन शिविरों के क्या मायने हैं? कांग्रेस का सबसे बड़ा संगठन सेवादल इन दिनों वैसा सक्रिय नहीं है, जैसा कभी हुआ करता था। राजनीतिक पार्टियों में व्यक्तियों के बढ़ते महत्व और कार्यकर्ताओं की उपेक्षा के चलते जिस तरह का सामंजस्य जमीनी स्तर पर होना चाहिए, नहीं है। चुनाव के समय सारा सर्कुलर चिंतन एक तरफ धरा रह जाता है। जीत के नाम पर जातिगत, बाहुबली, ताकतवर उम्मीदवार को पार्टी टिकिट देकर खड़ा कर देती है। तमाम पार्टी चिंतन, वैचारिक समझ के बावजूद पार्टी के बड़े-बड़े नेता, सांसद, विधायक अपने निहित स्वार्थो के लिए रातों-रात पार्टी छोड़कर उस पार्टी का दामन थाम लेते हैं, जिसके वे घनघोर विरोधी होते हैं। ऐसे समय चिंतन शिविरों और राजनैतिक समझ पर सवाल उठाना लाजिमी है।

 राहुल गांधी को कांग्रेस का बतौर कांग्रेस अध्यक्ष निर्विरोध चुन लिए जाने के बाद इसका आयोजन हुआ था। राहुल गांधी 2017 के दिसंबर में अध्यक्ष चुने गए थे और उसके तीन महीने बाद अधिवेशन हुआ था, जिसमें उनके चुनाव पर देश भर के प्रतिनिधियों ने मुहर लगाई थी। पिछले आठ साल में पार्टी का चिंतन शिविर नहीं हुआ है और पार्टी का अधिवेशन हुए भी अब तीन साल होने वाले हैं। कांग्रेस पार्टी में अभी शीर्ष स्तर पर ऊहापोह मची हुई है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव की तैयारियों जोर-शोर से चल रही है। कांग्रेस जल्द ही 'शिमलाÓ और 'पंचमढ़ीÓ की तर्ज पर चिंतन शिविर करने की सोच रही है। 2003 में शिमला में हुए कांग्रेस के चिंतन शिविर में कांग्रेस ने केंद्र में गठबंधन की राजनीति को अपनाने का फ़ैसला किया था। इसी से 2004 में कांग्रेस की जीत का रास्ता खुला था। इसके बाद कांग्रेस ने दस साल तक गठबंधन की सरकार चलाई। कांग्रेस के नेता राहुल गांधी ने कहा है कि कांग्रेस जल्द चिंतन शिविर बुलाएगी। सोनिया गांधी ने कहा है कि सभी नेताओं को साथ ंिमलकर चलने और संगठन को मजबूत बनाने की जरुरत है। आने वाले समय में संगठन, विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने और अन्य मुद्दों पर चर्चा के लिए चिंतन शिविर का आयोजन किया जाएगा।

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस ने अपने दो साल सफलतापूर्वक पूरे किये हैं। 2023-24 में इसी तरह के परिणाम रहे, इसके लिए कांग्रेस अभी से चिंतनशील है। यदि हम पूरे देश के परिदृश्य पर नजर डालें तो महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल,  असम, तमिलनाडु में इस साल चुनाव है। कांग्रेस के चिंतन शिविर में निश्चित ही वे मुद्दे शामिल होंगे, जिन वजहों से कांग्रेस हाशिए पर जा रही है।

कांग्रेस के पास स्वतंत्रता आंदोलन की और बलिदानी नेताओं की नेहरु-गांधी की विरासत है। इसके बावजूद आज ऐसे लोग उस पर लगातार हमले कर रहे हैं, जिनके पास अपनी कोई शानदार विरासत नहीं है। सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों के जरिए से आज कांग्रेस और उसके नेताओं को बदनाम करने की कोशिश हो रही है। इसका जवाब कांग्रेस के कार्यकर्ता ठीक से क्यों नहीं दे पा रहे हैं, यह भी चिंतन का विषय होना चाहिए। छत्तीसगढ़ कांग्रेस ने वर्धा को चुना है वहां गांधीजी ने अपनी  जिंदगी के 12 साल चिंतन में बिताए थे। महाराष्ट्र में नागपुर से 70 किलोमीटर दूर स्थित महात्मा गांधी की कर्मभूमि सेवाग्राम आश्रम से गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ  लड़ाई के नेतृत्व किया था।    

भाजपा हो या कांग्रेस सभी राजनीतिक पार्टियों का मानना है कि प्रशिक्षण शिविर से कार्यकर्ताओं की बौद्धिक क्षमता बढ़ती है। संगठन को लेकर पार्टी के दिशा-निर्देशों को वह समझ पाते हैं। शिविर संगठन को सशक्त करने के साथ-साथ कार्यकर्ताओं के मनोबल को भी बढ़ाने वाला होता है।
छत्तीसगढ़ कांग्रेस सेवाग्राम में 12 से 14 जनवरी तक तीन दिवसीय प्रशिक्षण सत्र आयोजित करने जा रही है। राजीव भवन रायपुर से 11 जनवरी को बस से पूरी पीसीसी रवाना होगी। प्रशिक्षण में प्रदेश स्तर से लेकर निचले स्तर तक गांधीवादी विचारधारा के साथ विघटनकारी ताकतों के खिलाफ नए अंदाज में संघर्ष का नारा बुलंद करने की बात कह रही है। यह शिविर कांग्रेस के राष्ट्रीय शिविर के लिए एक नई भूमिका तैयार करके दे सकता है। बशर्त कि शिविर में सभी मुद्दों पर गंभीरता से विचार विमर्श हो।