कोरोना.काल : नेता 'क्वारंटाइन में, जनता अपनी लड़ाई खुद लड़ रही! प्रबंध संपादक सुभाष मिश्र, लेकडाउन में नेताओं की जिम्मेदारी और आम आदमी की तकलीफों पर प्रकाश डाल रहे हैं!

कोरोना.काल : नेता 'क्वारंटाइन में, जनता अपनी लड़ाई खुद लड़ रही! प्रबंध संपादक सुभाष मिश्र, लेकडाउन में नेताओं की जिम्मेदारी और आम आदमी की तकलीफों पर प्रकाश डाल रहे हैं!


सुभाष मिश्र

प्रधानमंत्री द्वारा कोरोना संक्रमण के लिये पूरे देश में घोषित लॉकडाउन का टूटना, मजलूमों की भीड़ के रूप में निकलना और इस चेतावनी के बावजूद कि लॉगडाउन तोड़ना जीवन को खतरे में डालना है, अपने-अपने गांव की ओर पैदल कूच करना दरअसल सत्ता के मुंह पर वह तमाचा है जिसे वह पूरी बेशर्मी से नजरअंदाज कर अब वो सारे उपाय कर रही है, जो उसे इस लागडाउन के पहले से कर लेना चाहिए था. ऐसा लगता है कि इस तरह के निर्णय लेते समय देश की ये जनता जो सड़कों पर उतर आई है, प्रधानमंत्री और नीति निर्धारकों के चिंतन से बाहर थी.

इन्होंने सोचा ही नही कि इस तरह लॉगडाउन की अचानक घोषणा से ऐसे लोग कहां जायेंगे? पूरे देश को खासकर मेहनतकश, बेघरबार लोगों को लेकर निर्णय लेते समय सोचा ही नही गया. गरीब आदमी सरकार के एजेंडे में कभी था ही नही. कोरोना वायरस से एक मीटर दूरी की समझाईश देने वाले नेता सालों साल से जनता से कई—कई किलोमीटर की दूरी बनाये हुए हैं. आज जनता अपने अस्तित्व की लड़ाई खुद लड़ रही है और राजनेता गायब हैं. यदि आज के समय गांधीजी होते तो वे उस रैली, भीड़ और गांव की ओर लौटते हुए लोगों के बीच दिखाई देते. पूरे देश को एक बार फिर 11 दिसंबर 1946 का नोआखाली का वह दृश्य दिखाई देता जिसमें भीड़ के साथ गांधी जी पैदल चलते दिखाई देते थे।

5 दिसंबर 1947 को जब दिल्ली पांच दिन के सांप्रदायिक दंगों के कारण मुर्दों की नगरी में तब्दील हो गई थी। तब गांधी जी सीधे वहां गये, जो जगह दंगों से सबसे ज्यादा लोग प्रभावित थी. अपने कामकाज की जगह को छोड़कर अपने-अपने गांव, घरों की ओर कूच रहे लोगों की इतनी बड़ी संख्या के बावजूद उनके पक्ष में कोई राजनैतिक दल या श्रमिक संगठन खड़ा दिखाई नही देता. आज के हमारे सारे नेता चाहे वे किसी भी पार्टी और कहीं के भी हों, उन्हे केवल अपनी और अपने चंद लोगों की फिक्र है. दिनभर टीवी चैनलों पर, रैलियों में या सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाले नेता, अभिनेता, क्रिकेट खिलाड़ी, समाजसेवी, वाच, डाग, व्हिसिल ब्लोअर सब कहां नदारद हैं, पता ही नही चल रहा है। केवल एक—दूसरे को पत्र लिखकर, बयानबाजी करके क्वारंटीन में चले गये हैं. देश की निहत्थी, निरपराध जनता असमंजस्य में है।

कवि राजेश जोशी की कविता याद आती है :
सबसे बड़ा अपराध है इस समय निहत्थे और निरपराधी होना,
जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएँगे


दरअसल हमारे देश के नेताओं, संपन्न वर्ग और कथित रूप से ख्यातिमान व्यक्तियों की प्राथमिकता में कभी भी गरीब आदमी नहीं रहा. जो लोग बरसों से गांधीजी की दुहाई देते उनका प्रिय भजन वैष्णव जन तो तेने कहिये, जो पीर पराई गा रहे हैं. वे दरअसल गरीबों के खिलाफ हैं. वे इस देश की उस 30 करोड़ जनता के खिलाफ हैं जिनके पास रहने—खाने का ठिकाना नहीं है. रामबहादुर राय साहबों की इस जमात ने गुलाम भारत की ही तरह नये भारत में भी अपने लिये नई जनता चुन ली है. ये ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं,बड़े-बड़े बंगलों के रूप में बने एक ऐसे टापू में रहते हैं जहां बिना पहचान—पत्र, परिचय और बुलावे के, बिना शिनाख्त के आपका प्रवेश वर्जित है.