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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सरकार के सहारे आशियाने की तलाश

 प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सरकार के सहारे आशियाने की तलाश

 
हम उसे घर कहें, मकान कहें, आवास कहें, डेरा कहें, ठिकाना कहें या फिर खोली, झोपड़ी, बिल्ंिडग, बंगला, सदन, आलय, निकेतन, कुटीर, धाम, निलय, आगार या आशियाना कहें या फिर सरकारी योजना के तहत उन्हें इंदिरा आवास कहें या प्रधानमंत्री आवास के नाम से पुकारें किंतु हमारे जीवन की बुनियादी जरूरतों में रोटी, कपड़ा, मकान शामिल है। इस देश की आजादी के अमृत महोत्सव के बावजूद अभी भी 1. 77 मिलियन लोग ऐसे हैं, जिनके पास आवास नहीं है।

बकौल शायर दुष्यंत कुमार-
कहां तो तय था चिराग़ां हर एक घर के लिए
कहां चिरा$ग मयस्सर नहीं शहर के लिए
यहां दर$खतों के साये में धूप लगती है,
चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए।।

 
जो लोग गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे हैं जिनके पास सिर छिपाने के लिए किसी तरह का आशियाना नहीं है, और यदि है भी तो कच्चा, बिना छत का है। सामाजिक एवं आर्थिक जनगणना-2011 की सूची के अनुसार देश में 4,14,55,597 परिवार प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए पंजीबद्घ हैं जिनमें स्थायी प्रतीक्षा सूची में कुल पात्र परिवार 2,08,09,488 हैं। भारत सरकार द्वारा निर्धारित कुल लक्ष्य वर्ष (2016-22)-2,08,86,711 रखा गया है। अभी तक प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत (2016-22)-1.66,61,483 आवास पूर्ण किये गये हैं। प्रधानमंत्री आवास योजना के लिए सामाजिक एवं आर्थिक जनगणना-2011 (एसईसीसी-20211) की सूची के आधार पर हितग्राहियों का चयन किया जाता है। यदि हम छत्तीसगढ़ की बात करें तो यहां पर सामाजिक एवं आर्थिक जनगणना-2011 (एसईसीसी-20211) की सूची में कुल परिवार (भारत सरकार द्वारा पृथक किये गये परिवार) 25.15.030 है जिनमें से स्थायी प्रतीक्षा सूची में कुल पात्र परिवार-18,77.158 है। छत्तीसगढ़ में वर्ष (2016-22)-10,97.150 लोगों को आवास बनाकर देना था अभी तक (2016-22)-8,22,533 बनकर पूरे हुए हैं।

मानव के जीवन निर्वाह के लिए आवास बुनियादी जरूरतों में से एक है। एक साधारण नागरिक के लिए आवास उपलब्ध होने से उसे महत्वपूर्ण आर्थिक सुरक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा मिलती है। मान्यता है कि एक व्यक्ति के पास उसका मकान होने से उसके अस्तित्व में सामाजिक परिवर्तन आता है।

हमारे देश में आजादी के बाद से ही अलग-अलग रूप में आवास के लिए अलग-अलग योजनाएं चलाई जा रही है। विभाजन के बाद शरणार्थियों के पुनर्वास हेतु एक आवास कार्यक्रम बनाया गया था जो 1960 तक चला, जिसके अंतर्गत मुख्यत: उत्तरी भारत में स्थित विभिन्न केन्द्रों में लगभग 5 लाख परिवारों को बसाया गया था।

आजादी के करीब ढाई दशक तक ग्रामीण भारत में आवास की जरूरत की ओर ध्यान नहीं दिया गया। इस दिशा में अहम पहल इंदिरा आवास योजना के रूप में 1980 में होती है लेकिन ये योजना आवास राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कर्यक्रम के तहत यानि लोगों को रोजगार देने के लिए आवास निर्माण कराना इसका प्रमुख उद्देश्य था। हालांकि, राज्यों में ग्रामीण आवास के लिए कोई समरूप नीति नहीं थी। जैसे कुछ राज्यों ने राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम या ग्रामीण भूमिहीन रोजगार गारंटी कार्यक्रम की निधियों में से निर्माण लागत का एक हिस्सा देना ही मंजूर किया और शेष राशि की पूर्ति लाभार्थियों द्वारा अपनी बचत अथवा स्वयं हासिल किए गए ऋणों से की जाती है। इसके विपरीत कुछ राज्यों ने सम्पूर्ण खर्च को पूरा करना मंजूर किया। कुछ राज्यों ने आवासों के मरम्मत की मंजूरी दी।  

2016 में इंदिरा आवास योजना का नाम बदलकर प्रधानमंत्री आवास योजना कर दिया। साथ ही बीपीएल परिवारों को मिलने वाली आर्थिक मदद को 45 हजार से बढ़ाकर 70 हजार कर दिया गया। योजना का वित्त पोषण केंद्र और राज्यों के बीच अनुपातिक तौर पर किया जाता है। सरकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रधानमंत्री आवास योजना ग्रामीण अंतर्गत केन्द्राश 60 प्रतिशत एवं राज्यांश 40 प्रतिशत होता है। वर्ष 2018-19 तक पूर्ण केन्द्रांश व राज्याश प्राप्त हो चुका है। वर्ष 2019-20 हेतु कन्द्राश राशि रुपये 1144 करोड़ के विरुद्ध राशि रुपये 844 करोड़ प्राप्त एवं राज्यांश की राशि रुपये 763 करोड़ अप्राप्त वर्ष 2020-21 हेतु केन्द्राश व राज्याश की राशि अप्राप्त है। वर्ष (2021-22) के लक्ष्य 7,81,999 आवास राशि के अभाव में केन्द्र सरकार द्वारा वापस ले लिया गया है। कुल 1.77 मिलियन भारतीय बेघर हैं।

छत्तीसगढ़ विधानसभा में इस पर जमकर हंगामा हुआ, भाजपा विधायक अजय चंद्राकर ने पीएम आवास का मुद्दा उठाया। टीएस सिंहदेव ने जबाव में बताया कि साल 2020-21 के लिए केंद्र सरकार ने 7 लाख 81 हजार 999 मकान बनाने का लक्ष्य तय किया था। 2 लाख 74 हजार मकान अधूरे हैं। केंद्र को 762 करोड़ की राशि देनी है। इस जवाब के बाद भाजपा विधायकों ने हंगामा कर दिया। अजय चंद्राकर सहित कई बीजेपी विधायकों ने इस जवाब पर आपत्ति जताई। बीजेपी विधायकों ने राज्य सरकार पर गरीबों की छत छीनने का आरोप लगाते हुए नारेबाजी की। वहीं केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए संसदीय कार्यमंत्री रविंद्र चौबे ने कहा कि केंद्र सरकार से 32 करोड़ की राशि लेनी है। बीजेपी केंद्र को पत्र नहीं लिख रही है उन्होंने कहा कि बीजेपी विधायकों को पहल करनी चाहिए। प्रदेश की जनता से बीजेपी भेदभाव कर रही है।

देश की आबादी जिस तेजी से बढ़ती रही है, ऐसे में सबको आवास उपलब्ध कराना बड़ी चुनौती है। आवास निर्माण के साथ ही उसे व्यवस्थित तौर पर बसाहट में तब्दील करना भी एक बड़ी चुनौती है। इसके लिए मास्टर प्लान बनाए जाते हैं। इसके तहत चंडीगढ़ और भिलाई जैसे कुछ शहर भी बसाए गए, लेकिन आज भी ज्यादातर शहर बेतरतीब बसे हुए हैं। देश के कई राज्यों में इन्हें व्यवस्थित करने के लिए प्रयास किए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में हाउसिंग बोर्ड, आरडीए जैसी सरकारी संस्थाएं इस दिशा में लगातार काम कर रही हैं, ईडब्ल्यूएस यानि इकॉनमिक वीक क्लास के लिए छोटे मकान से लेकर उच्च आय वर्ग के लिए भी मकान बनाए जा रहे हैं। वहीं मकान की जरूरतों को देखते हुए रियल स्टेट एक बड़ा व्यापार बनकर उभरा है। रायपुर जैसे शहर में आज विश्व स्तर की सुविधाओं वाली कॉलोनियां डेवलप हो रही है तो बजट होम्स की मांग भी काफी बढ़ी है। किसी निजी बिल्डर से मकान खरीदने में आम आदमी किसी धोखाधड़ी का शिकार न हो जाए, इसके लिए रेरा जैसी रेग्यूलिटी बॉडी भी गठित है। हालांकि, इसके बाद भी कई बार लोग जालसाजों के फेर में फंस जाते हैं।

संयुक्त राष्ट्र संघ की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में दुनिया की आधी आबादी शहरों में रह रही है। वर्ष 2050 तक भारत की आधी आबादी महानगरों व शहरों में निवास करने लगेगी। विश्व बैंक की वर्ष 2015 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत का शहरीकरण '॥द्बस्रस्रद्गठ्ठ ्रठ्ठस्र रूद्गह्यह्य4Ó अर्थात अघोषित एवं अस्त-व्यस्त है। भारत का शहरी विस्तार देश की कुल आबादी का 55.3 प्रतिशत है परंतु आधिकारिक जनगणना के आंकड़े इसका विस्तार केवल 31.2 प्रतिशत ही बताते हैं। वर्ष 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में 53 ऐसे शहर हैं जिनकी आबादी 10 लाख से अधिक है। तेजी से बढ़ते शहरीकरण और वहां हो रहे अवैध निर्माण को रोकने और नियोजित निर्माण के उद्देश्य से भारत सरकार ने वर्ष 2016 में संसद के माध्यम से एक अधिनियम पारित किया जिसका नाम रेरा यानि रियल एस्टेट विनियमन और विकास अधिनियम है। यह अधिनियम घर खरीदारों के हितों की रक्षा और अचल संपत्ति उद्योग में अच्छे निवेश को बढ़ावा देने के लिए बनाया गया है इसमें कुल 92 धाराएं बनाई गई हैं। 1 मई 2016 को 69 अधिसूचित वर्गों के साथ यह अधिनियम अस्तित्व में आया था। रियल एस्टेट अर्थात जमीन अथवा प्रॉपर्टी से सम्बंधित सभी गैर-कानूनी कार्यो को प्रतिबंधित किया जा सके।  इस अधिनियम को बिल्डर्स, प्रमोटर्स और रियल एस्टेट एजेंटों के विरुद्ध शिकायतों में वृद्धि को देखते हुए बनाया गया है। इन शिकायतों में मुख्य रूप से खरीददार के लिए घर कब्जे में देरी, समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भी प्रमोटरों का गैर जिम्मेदारी व्यवहार और अनेक प्रकार की समस्याएं हैं। इस अधिनियम के अंतर्गत पांच हजार वर्गफीट या आठ अपार्टमेंट तक की निर्माण योजनाओं को छोडकऱ सभी निर्माण योजनाओं को रियल एस्टेट नियामक प्राधिकरण में पंजीकरण कराना अनिवार्य है।  

इंसान अपने जीवन में अपनी कमाई का सबसे बड़ा हिस्सा मकान बनाने में खर्च करता है, एक आशियाने की जरूरत और अहमियत को देखते हुए आज कम उम्र में ही लोग बैंकों से लाखों रुपए कर्ज लेकर मकान बनाते हैं। आज देश के तमाम बैंक बेहद आकर्षक दर पर होम लोन उपलब्ध करा रहे हैं। कोरोना महामारी के बाद खुद के मकान की अवधारणा बढ़ी है।

लोग किसी भी तरह से एक ऐसा आशियाना चाहते हैं जहां वे जाकर चैन से रह सके, सो सके, उसे अपना घर कह सके।

बशीर बद्र प्रसंगवश उर्दू का यह शेर-
मिरे ख़ुदा मुझे इतना तो मोतबर कर दे,
मैं जिस मकान में रहता हूँ, उस को घर कर दे।