उर्दू के प्रसिद्ध कथाकार राजिंदर सिंह बेदी की कहानी ‘क्वारनटीन’

उर्दू के प्रसिद्ध कथाकार राजिंदर सिंह बेदी की कहानी ‘क्वारनटीन’

उर्दू के प्रसिद्ध कथाकार राजिंदर सिंह बेदी (1915–1984) की एक कहानी का शीर्षक है ‘क्वारनटीन’ जो अंग्रेजी राज में फैली प्लेग महामारी को केंद्र में रखकर लिखा गयी है। इस कहानी का अनुवाद रज़ीउद्दीन अक़ील ने किया है।

हिमालय के पांव में लेटे हुए मैदानों पर फैल कर हर चीज को धुंधला बना देने वाले कोहरे की तरह प्लेग के खौफ ने चारों तरफ अपना तसल्लुत जमा लिया था. शहर का बच्चा-बच्चा उसका नाम सुनकर कांप जाता था.

प्लेग तो खतरनाक थी ही, मगर क्वारनटीन उससे भी ज्यादा खौफनाक थी. लोग प्लेग से उतने परेशान नहीं थे जितने क्वारनटीन से, और यही वजह थी कि स्वास्थ्य सुरक्षा विभाग ने नागरिकों को चूहों से बचने की हिदायत करने के लिए जो आदम-कद विज्ञापन छपवाकर दरवाजों, सड़कों और मार्गों पर लगाया था, उस पर "न चूहा न प्लेग" के शीर्षक में इजाफा करते हुए "न प्लेग न चूहा, न क्वारनटीन" लिखा था.

क्वारनटीन से संबंधित लोगों का खौफ बजा था. एक डॉक्टर की हैसियत से मेरी राय निहायत मुसतनद है और मैं दावे से कहता हूं कि जितनी मौतें शहर में क्वारनटीन से हुईं, उतनी प्लेग से न हुईं. हालांकि क्वारनटीन कोई बीमारी नहीं, बल्कि वह उस बड़े क्षेत्र का नाम है जिसमें हवा में फैली हुई महामारी के दिनों में बीमार लोगों को तंदुरुस्त इंसानों से कानूनन अलहदा करके ला डालते हैं ताकि बीमारी बढ़ने न पाए. अगरचे क्वारनटीन में डॉक्टरों और नर्सों का काफी इंतजाम था, फिर भी मरीजों की बड़ी संख्या में वहां आ जाने से हर मरीज को अलग-अलग खास तवज्जो न दी जा सकती थी. उनके अपने संबंधियों के आसपास न होने से मैं ने बहुत से मरीजों को बे-हौसला होते देखा. कई तो अपने इर्द-गिर्द लोगों को पे दर पे मरते देखकर मरने से पहले ही मर गए. कई बार तो ऐसा हुआ कि कोई मामूली तौर पर बीमार आदमी वहां के वातावरण में ही फैले जरासीम से हलाक हो गया. और मृतकों की बड़ी तादाद की वजह से उनके आखिरी क्रिया-क्रम भी क्वारनटीन के खास तरीके पर अदा होतीं, यानी सैकड़ों लाशों को मुर्दा कुत्तों की लाशों की तरह घसीट कर एक बड़े ढेर की सूरत में जमा किया जाता और बगैर किसी के धार्मिक रस्मों का आदर किए, पेट्रोल डालकर जला दिया जाता. शाम के वक्त उससे धधकते हुए आग के शोलों को देखकर दूसरे मरीज यही समझते कि तमाम दुनिया जल रही है.

क्वारनटीन इसलिए भी ज्यादा मौतों का कारण बनी कि बीमारी के आसार जाहिर होते ही बीमार के संबंधी उसे छुपाने लगते, ताकि कहीं मरीज को जबरदस्ती क्वारनटीन में न ले जाएं. चूंकि हर एक डॉक्टर को तंबीह की गई थी कि मरीज की खबर पाते ही फौरन सूचित करें, इसलिए लोग डॉक्टरों से इलाज भी न कराते और किसी घर के महामारी के चपेट में होने का सिर्फ उसी वक्त पता चलता, जब दिल को दहला देनी वाली आह और पुकार के बीच एक लाश उस घर से निकलती.

उन दिनों मैं क्वारनटीन में बतौर एक डॉक्टर के काम कर रहा था. प्लेग का खौफ मेरे दिल और दिमाग पर भी मुसल्लत था. शाम को घर आने पर मैं एक अरसा तक कारबोलिक साबुन से हाथ धोता रहता और जरासीम-नाशक घोल से गलाला करता, या पेट को जला देने वाली गर्म कॉफी या बरांडी पी लेता. अगरचे उससे मुझे नींद उड़ने और आंखों के चुंधियाने की शिकायत पैदा हो गई. कई बार बीमारी के खौफ से मैं ने मतली करवाने वाली दवाइयां खाकर अपनी तबियत को साफ किया. जब निहायत गर्म कॉफी या बरांडी पीने से पेट में उबाल पैदा होता और भाप के गोले उठ-उठकर दिमाग को जाते, तो मैं अक्सर किसी होश उड़े हुए शख्स के मानिंद तरह-तरह के वहम का शिकार हो जाता. गले में जरा भी खराश महसूस होती तो मैं समझता कि प्लेग के निशानात जाहिर होने वाले हैं....उफ! मैं भी इस जानलेवा बीमारी का शिकार हो जाऊंगा....प्लेग! और फिर....क्वारनटीन!


उन्हीं दिनों में नव-ईसाई विलियम भागव झाड़ू वाला, जो मेरी गली में सफाई किया करता था, मेरे पास आया और बोला: "बाबू जी, गजब हो गया, आज एम्बू इसी मोहल्ले के करीब से बीस और एक बीमार ले गई है."

"इक्कीस? एम्बुलेंस में....?" मैं ने ताज्जुब के साथ पूछा.

"जी, हां...पूरे बीस और एक...कोनटीन (क्वारनटीन) ले जाएंगे...आह! वह बेचारे कभी वापस न आएंगे?"

पूछने पर मुझे पता चला कि भागव रात के तीन बजे उठता है. आध पाव शराब चढ़ा लेता है. और हिदायत के मुताबिक कमेटी की गलियों में और नालियों में चूना बिखेरना शुरु कर देता है, ताकि जरासीम फैलने न पाएं. भागव ने मुझे बताया कि उसके तीन बजे उठने का यह भी मतलब है कि बाजार में पड़ी हुई लाशों को इकठ्ठा करे और उस मोहल्ले में जहां वह काम करता है, उन लोगों के छोटे-मोटे काम-काज करे जो बीमारी के खौफ से  बाहर नहीं निकलते. भागव तो बीमारी से जरा भी नहीं डरता था. उसका ख्याल था अगर मौत आई हो तो चाहे वह कहीं भी चला जाए बच नहीं सकता.

उन दिनों जब कोई किसी के पास नहीं फटकता था, भागव सिर और मुंह पर मुंडासा बांधे बड़ी लगन से लोगों की खिदमत में जुटा हुआ था. हालांकि उस का ज्ञान अत्यंत सीमित था, अपने तजुरबे की बिना पर वह एक मंझे हुए वक्ता की तरह लोगों को बीमारी से बचने की तरकीबें बताता. आम सफाई, चूना बिखेरने और घर से बाहर न निकलने की सलाह देता. एक दिन मैं ने उसे लोगों को जमकर शराब पीने का सुझाव देते हुए भी देखा. उस दिन जब वह मेरे पास आया तो मैं ने पूछा: "भागव तुम्हें प्लेग से डर भी नहीं लगता?"

"नहीं बाबू जी...बिन आई, बाल भी बीका नहीं होगा. आप इत्ते बड़े हकीम ठहरे, हजारों आपके हाथ से ठीक हुए हैं. मगर जब मेरी आई होगी तो आपकी दवा-दारु भी कुछ असर न करेगी....हां बाबू जी....आप बुरा न मानें. मैं ठीक और साफ-साफ कह रहा हूं." और बात का रुख बदलते हुए बोला: "कुछ कोनटीन की कहिए बाबू जी....कोनटीन की."

भागव ने गर्दन झुका दी और मुंडासे के एक पल्लू को मुंह पर से हटाकर शराब के असर से लाल चेहरे को दिखाते हुए बोला: "बाबू जी, मैं किस लायक हूं. मुझसे किसी का भला हो जाए, मेरा यह निकम्मा तन किसी के काम आ जाए, इससे ज्यादा खुश किस्मती और क्या हो सकती है. बाबू जी, बड़े पादरी लाबे (रेवरेंड मोंत ल, आबे) जो हमारे मोहल्लों में अक्सर प्रचार के लिए आया करते हैं, कहते हैं, ईश्वर येसु-मसीह यही सिखाता है कि बीमार की मदद में अपनी जान तक लड़ा दो....मैं समझता हूं...."

मैं ने भागव की हिम्मत को सराहना चाहा, मगर भावनाओं से बोझिल होकर रुक गया. उसकी नेक आस्था और सार्थक जीवन को देखकर मेरे दिल में एक तरह की ईर्ष्या पैदा हुई. मैं ने फैसला किया कि आज क्वारनटीन में पूरी जतन से काम करके बहुत से मरीजों को जिन्दा रखने की कोशिश करुंगा. उनको आराम पहुंचाने में अपनी जान तक लड़ा दूंगा. मगर कहने और करने में बहुत फर्क होता है. क्वारनटीन में पहुंचकर जब मैं ने मरीजों की खौफनाक हालत देखी और उनके मुंह से निकलने वाली सड़ी हुई गंध मेरी नाक में पहुंची, तो मेरी रुह लरज गई और भागव की तरह काम करने की हिम्मत न कर सका.

फिर भी उस दिन भागव को साथ लेकर मैं ने क्वारनटीन में बहुत काम किया. जो काम मरीज के ज्यादा करीब रह कर हो सकता था, वह मैं ने भागव से कराया और उसने बिना झिझक किया....खुद मैं मरीजों से दूर-दूर ही रहता, इसलिए कि मैं मौत से बहुत डरता था और उससे भी ज्यादा क्वारनटीन से.

मगर क्या भागव मौत और क्वारनटीन, दोनों से ऊपर था?

उस दिन क्वारनटीन में चार सौ के करीब मरीज दाखिल हुए और ढाई सौ के लगभग मौत के शिकार हो गए.

यह भागव की जांबाजी का ही नतीजा था कि मैं ने बहुत से मरीजों को सेहतमंद किया. वह ग्राफ जो मरीजों की सेहत में सुधार की ताजा जानकारी के लिए चीफ मेडिकल ऑफिसर के कमरे में टंगा हुआ था, उस में मेरी निगरानी में रखे मरीजों की औसत सेहत की लकीर सबसे ऊंची चढ़ी हुई दिखाई देती थी. मैं हर दिन किसी न किसी