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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - घर-घर राशन पहुंच जाये तो क्या बुराई है?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - घर-घर राशन पहुंच जाये तो क्या बुराई है?

-सुभाष मिश्र

शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बेहतर कार्य करके दूसरी बार दिल्ली पर अपना परचम फहराने वाली आम आदमी पार्टी की केजरीवाल सरकार जब घर-घर राशन पहुंचाने की योजना के जरिये तीसरी बार भी जीत का मार्ग प्रशास्त करने की कोशिश करने लगी तो केंद्र की भाजपा शासित मोदी सरकार को ये नागवार गुजरा। राज्यपालों के जरिये विपक्षी राज्यों की सरकारों को घेरने में महारथ हासिल कर चुकी मोदी सरकार डिजीटल इंडिया की कितनी ही बातें करें और होम डिलेवरी, आन लाईन बिजनेस को कितना ही प्रमोट करे पर उसे दिल्ली सरकार की घर-घर राशन पहुंचाने की योजना रास नहीं आई। सरकारों के लिए गरीबों का राशन वोट की गारंटी है। कल्याणकारी सरकारों को गरीबों के लिए लागू योजनाएं के क्रियान्वयन से ज्यादा चिंता इस बात से रहती है कि योजना का श्रेय कोई दूसरा न ले जाए।

केंद्र सरकार का फूड कंट्रोल एक्ट खाद्यान्न की कीमत और पात्र हितग्राहियों के मापदंड को तय करता है और राज्यों पर उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी होती है। केंद्र की खाद्यान्न योजना से पूरे देश के पात्रता में आने वाले 80 करोड़ लोग लाभांन्वित होते हैं। सस्ता अनाज प्रदाय करने के लिए केंद्र राज्यों को सब्सिडी भी देता है। दिल्ली सरकार ना तो इस योजना में खाद्यान्न के रेट बढ़ा रही थी, ना ही हितग्राहियों की पात्रता बदल रही है, केवल वितरण प्रणाली जो अभी राशन दुकानों के जिम्मे है उसे बदलकर सीधे लोगों के घर में राशन की डिलेवरी करना चाहती है। दिल्ली सरकार की यह पहल बहुत ही चुनौतीपूर्ण है। लोगों के घर डोर टू डोर राशन पहुंचाना कोई आसान काम नहीं है किन्तु वह ऐसा करना चाहती थी। क्रेडिट लेने के चक्कर में भाजपा और उसकी केंद्र शासित सरकार उससे ऐसा करने से रोक रही है। केन्द्र सरकार को ऐसा प्रयोग करने देना चाहिए ताकि गरीबों को लाभ मिले। यदि योजना के क्रियान्वयन में कमी रहेगी, फेलियर होगा तो बाद में भाजपा इसका राजनीतिक लाभ उठा सकती थी किन्तु उसने पहले ही इस पर विवाद खड़ा कर दिया। यह गरीबों को घर-घर राशन पहुंचाने से ज्यादा राजनीतिक लाभ लेने का मामला है, जिसमें केंद्र की भाजपा सरकार पीछे नहीं रहना चाहती है। अगले साल जिन पांच राज्यों में चुनाव है उनमें से पंजाब में आप पार्टी की अच्छी खासी दखल है। उत्तर प्रदेश पंचायत चुनाव में भी आप पार्टी ने अपनी आमद दर्ज की है। पश्चिम बंगाल में बुरी तरह मुॅह की खा चुकी मोदी सरकार अपनी विजय के अश्वमेघ रथ को यूं छोटे-मोटे राज्यों के द्वारा रोके जाने से बौखलाई सी है। ऐसे में घर-घर राशन वो भी आप पार्टी के कार्यकर्ताओं के हाथों ना बाबा ना।
हमारी संवैधानिक व्यवस्था के तहत देश राज्यों का एक संघ है। दोनों को आपस में मिलकर लोककल्याण के लिए काम करना चाहिए। इधर के कुछ सालों में केंद्र और राज्यों के बीच उत्पन्न प्रतिस्पर्धा और अधिकारों की वजह से उनके आपसी संबंधों का क्षरण हुआ है। राजनीतिक दुराग्रह के कारण दोनों एक-दूसरे को प्रतिस्पर्धी समझते हैं। अभी हाल ही में कोरोना महामारी के दौरान यह लड़ाई साफ-साफ अदालतों तक गई। पश्चिम बंगाल के बाद दिल्ली ही लगातार केंद्र की आंखों की किरकिरी बनी हुई है।

शिक्षा, स्वास्थ्य और खाद्यान्न सुरक्षा के मामले में सभी को आपस में मिलकर काम करना चाहिए, क्योंकि यह हमारे मूलभूत अधिकारों से जुड़ी बात है। किसान आंदोलन के दौरान हमने केंद्र और राज्यों की लड़ाई साफ-साफ देखी। लोगों की मौत भूख से ना हो, कोरोना से न हो, किसानों को आत्महत्या न करना पड़े यह देखना सरकारों का काम है। जब कहीं भी कोई व्यक्ति भूख से, इलाज के अभाव में या गरीबी और ऋणग्रस्ता की वजह से मरता है तो यह राष्ट्रीय शर्म का विषय बनता है।

जिस सार्वजनिक प्रणाली और राशन वितरण व्यवस्था को लेकर दिल्ली में जंग जारी है, वही ंछत्तीसगढ़ की पीडीएस व्यवस्था पूरे देश के लिए माडल है। राष्ट्रीय स्तर पर पहली बार पुरस्कृत इस व्यवस्था ने अब योजना से आगे बढ़कर नागरिक अधिकार का स्वरूप ले लिया है। छत्तीसगढ़ देश का पहला ऐसा राज्य है जिसने 2012 में कानून लाकर खाद्य सुरक्षा को पात्रता तक सीमित नहीं रहकर भोजन के अधिकार से जोड़ा और मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार दिया। केंद्रीय योजना में जहां तय मापदंड के अनुसार पात्र व्यक्तियों को ही गेंहू-चावल और मोटा अनाज सस्ती दर पर लेने की पात्रता है, वहीं छत्तीसगढ़ ने इसे यूनिवर्सल बनाकर सभी के लिए राशन की उपलब्धता के साथ खाद्यान के साथ पोषण आहार को शामिल कर चना, दाल, नमक, गेहूं आदि को भी इसमें जोड़ा। यहां का यूनिवर्सल पीडीएस सिस्टम खेत में उपजी फसल के संग्रहण से लेकर गोदाम, राशन दुकान, मुख्यालय के वितरण संग्रहण और मॉनिटरिंग सिस्टम के साथ जुड़ा हुआ है। छत्तीसगढ़ का पीडीएस सिस्टम का कम्प्यूटराईजेशन सभी स्तर पर मानिटरिंग और वितरण संग्रहण व्यवस्था सुनिश्चित करता है।

केंद्र सरकार जिसने यहां के पीडीएस सिस्टम की मुक्त कंठ से सराहना की, पुरस्कृत किया वह चाहती तो इसे पूरे देश में लागू कर सकती थी। केंद्र सरकार ऐसा नहीं करके मौजूदा कानून के दायरे में दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार जो इस योजना में नया करना चाह रही है, उसे रोक रही है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने इस संबंध में कहा है कि हमने केंद्र सरकार से इस योजना के लिए पांच बार अप्रूवल लिया था। अगले हफ्ते घर-घर राशन योजना शुरू होनी थी जिसे दो दिन पहले क्यों रोक दिया गया। राज्य सरकार इस योजना को चलाने सक्षम है। उन्होंने सवाल किया है कि जब पिज्जा की, स्मार्टफोन की होम डिलेवरी हो सकती है तो राशन की क्यों नहीं? उनका कहना है कि केंद्र ने कोर्ट में भी हमारी योजना के खिलाफ आपत्ति नहीं ली। कोरोना के कारण बहुत से लोग घर से बाहर नहीं जाना चाहते, कोरोना संक्रमण का खतरा है, इसलिए हम घर-घर राशन पहुंचाना चाहते हैं। भाजपा का कहना है कि दिल्ली सरकार कानून से उपर नहीं है, उसे एनएफएसए एक्ट के सेक्शन 12(2) के अनुसार कोई नई स्कीम शुरू करने से पहले केंद्र से अप्रूवल जरूरी है। उनका कहना है कि इसमें कोर्ट का स्टे है।
यहां फिर वहीं सवाल है कि क्या गरीबों को आसानी से उनके घर तक राशन नहीं मिलना चाहिए। जिस केंद्रीय कानून की बात योजना को लेकर कही जा रही है उसी कानून से बाकी राज्य भी तो अपना पीडीएस सिस्टम संचालित कर रहे हैं। यह सही है कि घर-घर राशन पहुंचाना बड़े राज्यों के लिए संभव नहीं है, इसलिए वे अपनी वितरण प्रणाली को गांव-गांव तक पहुंचा पा रहे हैं। यदि दिल्ली सरकार नया प्रयोग करके लोगों को घर-घर राशन देना चाहती है तो इसमें कानूनी दांवपेच, बताने के बजाए उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। राशन दुकानें कैसे संचालित होती है, कौन लोग उन्हें किस तरह संचालित करते हैं, उनमें कितने बोगस राशन कार्ड रहते हैं, वे कब-कब कैसे खुलती है, वहां का सस्ता अनाज कैसे महंगे में बिकता है, ये लंबी कहानी है जिसे सभी राजनीतिक दल जानते हैं। जिसकी सत्ता होती है वह अपनी पार्टी या प्रभावी लोगों को राशन दुकाने देकर उपकृत करता है। आम जनता के हित में समझकर यदि योजना में कोई नवाचार हो रहा है तो उसे चुनावी राजनीतिक से जोड़कर देखना गरीबों का हक छिनने जैसा ही है। इस योजना को चुनावी चश्मे से नहीं व्यापक लोकहित में देखे जाने की जरूरत है।