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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः किसने ख़रीदा पूरा घोड़ा?

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः  किसने ख़रीदा पूरा घोड़ा?


घोड़े खड़े रहते हैं तैयार

भागने के लिए

वे नहीं बैठते कभी

घोड़े वाला बैठता है उन पर

कस के पकड़े रहता है लगाम


कोई नहीं खरीद पाया

आज तक पूरा घोड़ा

खरीदते हैं सब उसकी पीठ

रखते हैं उसे बाँध कर

कौन जाने कब

भाग खड़ा हो दुलत्ती मार कर

घोड़े के पाँवों पर

किसी को भरोसा नहीं


जो गाँठ ले उस की सवारी

उसी का होता है घोड़ा

घोड़े वाले रहते हैं भयभीत

कोई पकड़ न ले उन का घोड़ा

घोड़ा पकड़े जाने से

कट जाती है नाक


सब घोड़े की पीठ ठोकते

खूब खरहरा करते

अपने दल की झूल डाल कर

अपने रस्ते पर दौड़ाते

पूरी प्रजा भाड़ में जाये

घोड़े मन भर चना चबाते


छूट रही हाथों से लगाम

भाग रहे हैं घोड़़े

कुचल रहे हैं प्रजातंत्र को

नये अस्तबल खोज रहे हैं