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खुशी तो तब होगी जब अपराधी को सजा मिले

खुशी तो तब होगी जब अपराधी को सजा मिले

 माशा

प्रिया रमानी की जीत पर एक मशहूर इलेस्ट्रेटर ने सोशल मीडिया पर एक स्टोरी पोस्ट की और बैकग्राउंड में वंडरवुमेन का म्यूजिक चला दिया. क्या प्रिया सचमुच वंडरवुमेन हैं? बेशक, सेक्सुअल हैरेसमेंट पर बोलने और उसके लिए कानून का सहारा लेने वाली हर औरत वंडरवुमेन ही तो है. चूंकि हममें से ज्यादातर औरतें चुप ही रहती हैं. चाहे मामला काम करने की जगह का हो, गली-मोहल्ले-सड़क का, या फिर घर की चारदीवारी के अंदर का. कभी डर और कभी संकोच- कभी सामाजिक लांछन की दीवार. प्रिया ने पत्रकार और राजनीतिज्ञ एम जे अकबर पर कई साल पहले जब यौन शोषण का आरोप लगाया था, तब आलोचनाएं भी सही थीं. लोगों ने पूछा था, इतने साल चुप क्यों रहीं. उस समय अकबर भाजपा सरकार में मंत्री थे. बदले में उन्होंने प्रिया पर मानहानि का मामला दायर किया. अब दिल्ली की अदालत ने प्रिया को इस मामले में बरी किया है और कहा है कि शोषण के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करने वाली औरतों को सजा नहीं दी जा सकती. प्रिया और उनकी तरह की सभी औरतें वंडरवुमेन हैं.

ऐसी वंडरवुमेन वे घरेलू कामगार भी हैं जिन्होंने पिछले ही महीने हजारों की संख्या में महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी को पोस्टकार्ड भेजे हैं. उन्होंने पोस्टकार्ड में लिखा है कि हम महिला घरेलू कामगार अपने काम करने की जगहों पर सुरक्षा की मांग करती हैं. उनके लिए काम करने की जगहें, लोगों के घर हैं जहां अक्सर उन्हें शारीरिक-मानसिक के साथ-साथ यौन उत्पीड़न भी झेलना पड़ता है. प्रिया रमानी की जीत की खबर के साथ इन महिलाओं के मुखर होने का भी जश्न मनाया जाना चाहिए.

प्रिया के मामले में यह जश्न इसलिए भी मनाया जा रहा है क्योंकि उन्होंने और उनके जैसी दूसरी कई महिलाओं ने एक ताकवतर से लोहा लिया, और जीती भी. इस मामले में अदालत के फैसला दिया, उसके एक एक शब्द के बहुत मायने हैं. अदालत ने साफ कहा है, ‘समय आ गया है कि हमारा समाज यह समझे कि कभी-कभी पीड़ित व्यक्ति मानसिक आघात के कारण वर्षों तक नहीं बोल पाता है. लेकिव वह दसियों साल बाद भी अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है.' अदालत का यह फैसला इसलिए भी खास है क्योंकि इससे यौन शोषण से जुड़ा सामाजिक लांछन का भय चूर चूर होता है.

इसी लांछन के डर से औरतें चुप रह जाती हैं. 2017 में इंडियन बार एसोसिएशन के एक सर्वे मे 70% औरतों ने कहा था कि वे अपने सुपीरियर्स के सेक्सुल हैरेसमेंट की शिकायत दर्ज नहीं करातीं. इसकी वजह यह है कि उन्हें इसका नुकसान होने का डर होता है. अक्सर महिलाओं को ऐसी शिकायत करने पर अपमान भी सहना पड़ता है. जैसा कि मजलिस लीगल सेंटर की कोफाउंडर और महिला अधिकारों की अधिवक्ता फ्लाविया एगनेस ने एक बार कहा था, यौन शोषण के मामलों में अक्सर पीड़ित औरतें अपने अनुभवों को साझा नही कर पातीं. लीगल लड़ाई लड़ना उनके लिए मुश्किल होता है. कोर्टरूम्स में उन्हें कई बार बहुत बुरी बातें सुनने को मिलती हैं. इसे झेलना आसान नहीं होता.

कई बार आरोपी खुद के निर्दोष होने और पीड़ित के दोषी होने की दलील देते हैं. जैसे कि अकब ने किया. उन्होंने प्रिया को ही दोषी बताया और कहा कि वह झूठे आरोप लगा रही हैं. मानहानि का मामला भी यही कह दायर किया गया. कई बार अदालतें खुद भी यौन शोषण की पीड़िताओं को कटघरे में खड़ा करती हैं. पिछले साल कर्नाटक उच्च न्यायालय ने बलात्कार के एक आरोपी को अग्रिम जमानत देकर शिकायतकर्ता महिला से ही सवाल किए थे. जैसे वह रात 11 बजे दफ्तर में क्या कर रही थी. उसने आरोपी के साथ शराब क्यों पी. जब उसके साथ शोषण हुआ तो वह थककर सो क्यों गई. वह आरोपी के साथ सुबह तक क्यों रही. इसी तरह 2017 में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय ने बलात्कार के तीन अपराधियों को यह कहते हुए जमानत दे दी थी कि लड़की का खुद का व्यवहार संदिग्ध है. वह सिगरेट पीती है और उसके हॉस्टल रूम से कंडोम मिले हैं. इसी तरह पीपली लाइव के डायरेक्टर महमूद फारुखी बलात्कार के आरोप से बरी कर दिए गए थे, क्योंकि उन पर आरोप लगाने वाली अमेरिकी रिसर्चर के चरित्र पर सवाल उठाए गए थे.

इस सिलसिले में ‘डिस्क्रिशन एंड द रूल ऑफ लॉ: रिफॉर्मिंग रेप सेनटेंसिंग इन इंडिया’ नाम की एक किताब काफी सिलसिलेवार उदाहरण पेश करती है. इसमें बलात्कार के करीब 800 मामलों के हवाले से बताया गया है कि कैसे पीड़िताओं की सामाजिक और वैवाहिक स्थिति अदालत में जजों के फैसलों को प्रभावित करती है. अगर पीड़िता शादीशुदा और सेक्सुअली एक्टिव होती है, तो अपराधियों को कम सजा मिलती है. किताब बताती है कि भारत में बलात्कार और यौन शोषण के मामलों पर फैसले बलात्कार से जुड़े पूर्वाग्रहों से तय होते हैं. कई बार जजों को लगता है कि अगर कोई परिचित आरोपी होता है तो यौन शोषण कम दर्दनाक होता है.

इन पूर्वाग्रहों के बावजूद औरतें आवाज उठा रही हैं. एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि वर्कप्लेस पर सेक्सुअल हैरेसमेंट के दर्ज होने वाले मामलों की संख्या बढ़ रही है. 2016 में ऐसे 539 मामले दर्ज किए गए, 2017 में 570 और 2018 में 965 मामले. फिर भी देश की कुल श्रमशक्ति में जब 93% लोग अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम कर रहे हों और वहां भी जातियां मुख्य सामाजिक संरचनाओं की बुनियाद हों तो यौन शोषण के कितने मामले दबे ढंके रह जाते हैं. हां, फिर भी प्रिया रमानी की जीत बताती है कि रास्ता कुछ खुल रहा है. हालांकि आरोपी के लिए अभी सजा तय नहीं हुई है. हम सिर्फ इस पर खुश हो रहे हैं कि पीड़िता को सजा नहीं मिलेगी. सजा जिसे मिलनी चाहिए- अभी तो चैन की बंसी बजा रहा है.