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भाषा पर फिर बचकानी सियासत - एस श्रीनिवासन

भाषा पर फिर बचकानी सियासत - एस श्रीनिवासन


कासरगोड जिला केरल के सबसे उत्तर में है। यह पश्चिम में अरब सागर और उत्तर में कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के हरे-भरे पश्चिमी घाट से घिरा है। इसका शेष हिस्सा केरल के कन्नूर जिले से लगता है।

यह एक ऐसी जगह है, जहां मानव बस्तियां ‘महान पाषाण युग’ से हैं। आदि मानव यहां रहते थे और कृषि व प्रकृति की पूजा करते थे। ऐसी कई जनजातियां हैं, जिनके पूर्वज सदियों पहले के हैं। ऐसे प्रमाण भी हैं कि यहां आदि जनजाति के लोग बौद्ध और जैन धर्मस्थलों पर प्रार्थना किया करते थे। यहां शंकराचार्य के समय में वैदिक धर्म मजबूत था। इसके अनंतपुरम मंदिर को प्रसिद्ध श्री पद्मनाभ स्वामी मंदिर का ‘मूलस्थान’ माना जाता है। यहां अरब यात्री भी आ चुके हैं, क्योंकि यह एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था। जिले में अब भी कुछ उद्योग हैं और खेती के नाम पर नारियल, रबड़, केला और सुपारी के बागान हैं। यहां साक्षरता दर काफी ज्यादा है और पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या अधिक। यहां कई भाषाएं बोली जाती हैं, जबकि यह सिर्फ 2,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है और अतीत में इसने कई आक्रमण एवं बगावत झेले हैं।

इन तमाम विविधताओं के बीच यह जिला संस्कृति और भाषाओं की साझेदारी में विश्वास रखता है। यहां मुख्यत: मलयालम, कन्नड़, मराठी और कोंकणी भाषा बोली जाती है। द्रविड़ समूह की तुलु भाषा का भी यहां खूब प्रयोग होता है। मगर स्वर्ग जैसी इस मनोरम धरती पर पिछले दिनों एक ‘फर्जी खबर’ के कारण अप्रत्याशित विवाद छिड़ गया। तत्काल नाराजगी जताने वाले प्रमुख नेताओं में कर्नाटक जनता दल (एस) के नेता एचडी कुमारस्वामी भी शामिल थे, जिन्होंने केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन को पत्र लिखकर शिकायत की कि उन्हें मीडिया के माध्यम से पता चला है कि उनकी सरकार मंजेश्वर में कुछ गांवों के नाम, जो ‘कन्नड़ की खुशबू बिखेरते’ हैं, मलयालम में रखने जा रही है। कुमारस्वामी ने लिखा, ‘अगर यह वास्तव में सही है, तो क्या मैं भाषायी सद्भाव और सांस्कृतिक सह-अस्तित्व को देखते हुए इसे रोकने की दिली गुजारिश कर सकता हूं’। जल्द ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा के नेतृत्व में बड़ी संख्या में सांसद व राजनेता इस कोरस में शामिल हो गए। येदियुरप्पा का कहना था कि कासरगोड और मंजेश्वर में मलयाली और कन्नड़ भाषी एक साथ रहते हैं, इसलिए जगहों के नाम कन्नड़ से मलयालम में बदलना सही नहीं है।

यह नूरा-कुश्ती थी या कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ इलाके में भाषायी कट्टरपंथियों की कोई शरारत? बहरहाल, एक प्रमुख समाचार पत्र ने पूरे मामले की जांच की और बताया कि यह ‘गफलत’ कर्नाटक सीमा क्षेत्र विकास प्राधिकरण (केबीएडीए) के कारण हुई। अखबार ने कासरगोड जिले के एक अधिकारी के हवाले से कहा कि यह एक फर्जी खबर थी, क्योंकि नाम बदलने का कोई प्रस्ताव नहीं है। दरअसल, प्राधिकरण ने एक विस्तृत प्रेस विज्ञप्ति जारी की थी, जिसमें उन स्थानों का नाम दिया गया था, जिनके नाम कथित तौर पर बदले जा रहे थे। इसमें मधुर को मधुरम, माला को मल्लम, कराडका को कडगम, बेदडका को बेदगम, पिलिकुंज को पिलिकुन्नू आदि करने का प्रस्ताव था। 

इसके बाद केबीएडीए के अध्यक्ष सी सोमशेखर ने आनन-फानन में केरल के पीडब्ल्यूडी और राजस्व विभागों को एक पत्र लिखकर इन गांवों के कन्नड़ नाम न बदलने का आग्रह किया। केरल के मुख्यमंत्री कार्यालय और प्रशासन ने भी इस तरह के किसी कदम का खंडन किया। दिलचस्प बात यह है कि जिले की दो पंचायतों ने भी, जहां दशकों से भाजपा का शासन है, इस तरह के किसी भी प्रयास से अनभिज्ञता जताई।

भारत के तमाम राज्यों में ऐसे कई सीमावर्ती क्षेत्र हैं, जहां कई भाषाएं बोली जाती हैं। हालांकि, आजादी के तुरंत बाद राज्यों को भाषायी आधार पर बांटा गया और उनका पुनर्गठन हुआ था, लेकिन इसके परोक्ष प्रभाव आज भी कायम हैं। ऐसा ही एक विवादित मसला 1985 के राजीव-लोंगोवाल समझौता में सुलझाया गया था, जो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और अकाली नेता एच एस लोंगोवाल के बीच हुआ था। इसका एक प्रमुख प्रावधान पंजाबी भाषा बहुल विवादित क्षेत्रों की पहचान करना और उनको हरियाणा से पंजाब को सौंपना भी था।

ऐसे अधिकांश विवादित मुद्दे राजनीतिक पहल द्वारा अतीत में सुलझाए गए हैं। लिहाजा यह अजीब बात है कि ये फिर से उभरने लगे, जबकि इनका कोई मतलब नहीं है, विशेषकर जब पूरी दुनिया एक घातक महामारी से लड़ रही हो। राज्यों के सीमावर्ती क्षेत्रों में रहने वाले लोग कई भाषाएं बोलते हैं और स्थानों के लिए भी उनके अपने नाम हैं। जैसे, मलयाली ‘मंजेश्वरम’ या ‘नीलेश्वरम’ कह सकते हैं, लेकिन आधिकारिक रूप से उनको मंजेश्वर और नीलेश्वर ही कहा जाता है। दिलचस्प है कि भाजपा व जद (एस) जैसी पार्टियां ‘स्थान, संस्कृति और परंपराओं के संरक्षण के नाम पर’ यहां एक ही धरातल पर दिख रही हैं, लेकिन यह याद रखना चाहिए कि यह भाजपा और उसके नेतागण ही हैं, जिन पर विभिन्न सूबों में स्थानीय भाषा संबंधी मसलों में यहां से उलट रुख अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। मसलन, तमिलनाडु में ऐसे विरोध-प्रदर्शन अक्सर दिख जाते हैं, जिसमें स्थानीय भाषा के साइन बोर्ड को हटाकर ‘हिंदी पर जोर देने’ संबंधी प्रयास करने का आरोप केंद्र पर लगाया जाता है। इसी तरह, केंद्र द्वारा प्रस्तावित त्रिभाषा फॉर्मूले का भी राज्य विरोध करता रहा है। 

वैसे, कासरगोड जिले में नाम बदलने वाला मसला पहले भी सिर उठा चुका है। 2017 में यह मुद्दा तब उठा था, जब केरल ने स्कूलों में मलयालम को अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव रखा था। कासरगोड के कन्नड़ माध्यम के स्कूल इसके विरोध में थे। 2018 में कन्नड़ भाषियों की दुर्दशा को उजागर करती एक फिल्म सरकारी हिरिया प्राथमिक शाले-कासरगोडु भी बनाई गई थी। पिछले साल एक मलयालम भाषी शिक्षिका को कन्नड़ माध्यम के एक स्कूल में तैनात किया गया, तो पुलिस सुरक्षा में वह स्कूल परिसर में दाखिल हुई, क्योंकि अन्य शिक्षक और छात्र उसकी नियुक्ति का विरोध कर रहे थे।

जाहिर है, भाषा और नामकरण इस देश में इतने संवेदनशील मसले हैं कि राजनीतिक वर्ग को इनके बारे में अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत है। ऐसे किसी विवाद में फौरन कूद जाने के बजाय शरारत करने वालों को उसे पकड़ना चाहिए और एकता व सद्भाव बनाए रखने वाले साझा बयान जारी करने चाहिए।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)