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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सेना अकेले क्या कर लेगी?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - सेना अकेले क्या कर लेगी?

- सुभाष मिश्र

जब भी देश में विपदा की स्थिति आती है तो अक्सर यह मांग उठती है कि समस्या के समाधान के लिए सेना के हवाले कर दो। बिगड़ती कानून व्यवस्था की बात हो या कोरोना से उपजी महामारी, लोगों को सेना या राष्ट्रपति शासन विकल्प दिखाई देता है। बिहार हाईकोर्ट ने कोविड-19 के कारण उपजी स्थिति को लेकर नीतीश कुमार सरकार से कहा है बार-बार आदेश के बाद भी स्थिति में सुधार नहीं होना शर्म की बात है। जमीन पर जो हालात दिख रहे हैं उसे यदि आप नहीं संभाल सकते तो क्या हम कोविड प्रबंधन की जिम्मेदारी सेना के हवाले कर दें। दिल्ली में आप पार्टी के वरिष्ठ विधायक शोएब इकबाल ने कोर्ट में कहते है कि दिल्ली में जल्दी ही राष्ट्रपति शासन लगाया जाये, दिल्ली हमसे नहीं संभल रही है। सेना के रिटार्यड मेजर जनरल जीडी बक्शी ने ट्विट करके कहा है कि लोकतंत्र बचाने के लिए ममता बनर्जी को मुख्यमंत्री की शपथ न दिलाई जाए, बंगाल केंद्रीय सुरक्षा बलों के हाथों में सौंपा जाएं। दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के जरिए दिल्ली के बिगड़ते हालात के लिए भारतीय सेना से मदद मांगी है।
शोएब इकबाल पता नहीं घबराकर या नासमझी में ऐसा कह रहे हैं, वरना राट्रपति शासन तो राज्यपालों के भरोसे ही लगता है और अब तो भारत सरकार ने दिल्ली के उपराज्यपाल को ही दिल्ली की असली सरकार घोषित कर दिया है। उन्हे ही संभालने दो दिल्ली, अलग से राष्ट्रपति शासन की क्या जरूरत?
सेना की जब भी बात आती है तो हमारे मन में एक आदरभाव जागृत होता है। हमें सीमा की सरहद में चौबीसो घंटे तैनात सैनिक तथा बीच-बीच में होने वाली झड़पों में शहीद होने वाले सैनिकों के चेहरे याद आते हैं। दरअसल हमारी तीनों सेना का सेटअप बहुत बड़ा है। जिस तरह हमारी प्रशासनिक व्यवस्था में बहुत सी कमियों, शिकायते, भ्रष्टाचार है, वैसा ही सेना के अंदरूनी सिस्टम में भी। वहां पर भी एक तरह की ब्यूरोक्रेसी व्याप्त है। सेना में होने वाली खरीदी, भर्ती और पदोन्नति आदि के बहुत सारे स्कैंडल जब कभी बाहर आते हैं तो हमें, पता चला है कि वहां का सिस्टम भी बहुत पाक साफ नहीं है।
नजीर अकबराबादी का लिखा आदमीनामा है -
दुनियां में बादशाह है सो है वह भी आदमी।
और मुफ़्लिसो गदा है सो है वह भी आदमी॥
पढ़ते हैं आदमी ही कुऱान और नमाज़ यां।
और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियां॥
जो उनको ताड़ता है सो है वह भी आदमी
यां आदमी पे जान को वारे हैं आदमी।
और आदमी पे तेग़ को मारे है आदमी॥
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी।
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी॥
और सुन के दौड़ता है सो है वह भी आदमी।।
कोरोना संक्रमण को लेकर हमारे माननीय न्यायालय जो आदेश दे रहे हैं, या जो बातें हो रही है, वह सिस्टम के फेलियर की और संसाधनों की कमी की बात है। यदि हम रातों-रात सेना के हवाले कोरोना संक्रमण से निपटने की बागडोर सौंप भी दें तो क्या सेना आक्सीजन प्लांट बना देगी या वैक्सीन के डोज उपलब्ध करा देगी या रेमडेसिविर का इजेक्शन बना देगी या फिर अस्पतालों की कमी-डाक्टरों की कमी, नर्सिंग अस्पताल की कमी को दूर कर देगी। सेना भी उसी अधोसंरचना और कमियो के बीच ही अपना काम शुरू करेगी, जो आज व्याप्त है। दरअसल हमारे नीति निर्धारक हमारा नेतृत्व और हारी प्लानिंग की कमी के कारण आज हम इस दशा को पहुंचे हैं। जब एक साल पहले कोरोना ने हमारे देश में वायु मार्ग दस्तक दी थी तब हम अपने कम

आंकड़ों पर इतराते, ताली-थाली बजाते, दीपावली मनाकर जश्न मना रहे थे। हमारे नेताओं ने इस बीच कोरोना के संभावित खतरों से जो दूसरे देशों में साफ दिख रहा था कोई सबक नहीं लिया, कोई तैयारी नहीं की। उल्टे देश से आक्सजीन, वैक्सीन, जीवन रक्षक दवाएं भी बाहर जाने दी। देश को उत्सव धर्मी बनाकर खुद चुनावी वैतरणी पार करने कुंभ स्नान करवाने लगे। अब जब कोरोना का कहर सर चढ़कर बोल रहा है, न्यायालय लताड़ लगा रहा है और गोदी मीडिया चाहकर भी अपने आकाओं को नहीं बचा पा रहा है, तब लोगों को सेना की, राष्ट्रपति शासन की याद आ रही है। सेना और राष्ट्रपति शासन का मतलब होता है प्रजातंत्रिक मूल्यों का ह्वास होना। कुछ ही लोगों का सब कुछ तय करना। धीरे-धीरे यह कदम सैन्य तानाशाही की ओर ही ले जाता है।
कोरोना महामारी की रोकथाम के लिए किए जा रहे प्रयास चिकित्सा संसाधनों की कमी के चलते नाकाफ़ी साबित हुए हैं। हालात इतने बेकाबू हैं कि कहीं-कहीं उसे सम्हालने के लिए सेना की मदद मांगी जा रही है और कहीं-कहीं स्वास्थ्य प्रबंध को सेना के हवाले करने की मांग की जा रही है। बिहार में कोरोना संक्रमण के चलते बिगड़ते हालात पर सोमवार को पटना हाईकोर्ट ने कड़ा एतराज कर सेना को प्रबंधन सौंपने की बात कही थी।
इसमें संदेह नहीं कि संक्रमण की रोकथाम के लिए भारतीय सेना की मदद ली जा सकती है। सेना इस काम के लिए सक्षम भी है। वह मोर्चे पर आने के लिए तैयार भी है। कोविड से मुकाबले के लिए तीनों सेनाओं की तैयारियों से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को अवगत करा दिया गया है। सेना का मेडिकल कोर भी एक अत्यंत ही सक्षम मेडिकल सेवा है। वर्तमान में हमारे देश की वायु सेना क्रायोजेनिक आक्सीजन टैंकरों की भारी कमी को दूर करने के लिए दिन-रात अपने अभियान में जुटी हुई है। देश-विदेश से टैंकरों को जुटाने और उन्हें अलग-अलग जगहों पर पहुंचाने की गति को रुकने नहीं दे रहे हैं। भारतीय वायु सेना के सी-17 ग्लोबमास्टर विमान निरंतर इस कार्य को अंजाम दे रहे हैं।
अब बीते दो साल के दौरान रिटायर हुए या स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति लेने वाले सेना के सभी चिकित्सा कर्मियों को वापस बुलाया जा रहा है। इन सभी को उनके निवास के निकटस्थ कोविड सुविधा केंद्रों पर ड्यूटी के लिए तैनात किया जा रहा है। इसके अलावा सेना के अन्य रिटायर डॉक्टरों से भी आपात चिकित्सा हेल्पलाइन के जरिये अपनी सेवाएं और सहायता देने के लिए कहा गया है। महत्वपूर्ण है कि कोरोना जैसी महामारी के हालात में आपातकालीन आन्तरिक अनुशासन और नागरिक सहभागिता अपरिहार्य है। सेना के सभी कर्मी इसमें प्रशिक्षित हैं।
देश के सभी प्रमुख शहरों में सेना के अत्याधुनिक अस्पताल हैं। वहां पर कोरोना वायरस की चपेटमें आए रोगियों का सही इलाज किया जा सकता है। लेकिन सेना की मदद लेना एक बात है और स्वास्थ्य सेवाओं को सेना के हवाले कर दिया जाना दूसरी बात है। निस्संदेह आपात स्थिति में सेना की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। अनेक अवसरों पर सेना ने इसे प्रमाणित भी किया है। खास तौर पर बाढ़ या भूकंप आने पर सेना ने बचाव और राहत के काम को कुशलता से और पेशेवर तरीके से अंजाम दिया है।
लेकिन सेना के हवाले किसी राज्य की स्वास्थ्य सेवाओं को सौंप देने से संक्रमण को रोक पाने में पूरी कामयाबी की गारंटी हो जाएगी, इसमें संदेह है। संक्रमण को रोकना सामुदायिक प्रयास से संभव है। अकेले सेना के बूते कोरोना से नहीं लड़ा जा सकता। बेशक सेना राज्य के उपलब्ध स्वास्थ्य संसाधनों का अपेक्षाकृत अधिक कुशलता से इस्तेमाल कर सकती है। लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं है। सेना कम समय में अस्पताल बना सकती है और युद्ध स्तर पर महामारी प्रबंधन की दिशा में तैयारी भी कर सकती है। लेकिन क्या वह राज्य के संसाधनों का इस्तेमाल किये बिना बड़े पैमाने पर फैले इस महामारी की इस लहर का मुकाबला करने में अपने दम पर सफल होगी?
दूसरी बात इससे कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण है। सेना पर समाज का विश्वास है, इसमें संदेह नहीं। लेकिन नागरिक जीवन में सेना का हस्तक्षेप कहीं एक प्रवृत्ति का रूप न ले ले, इस पर भी विचार किया जाना चाहिए। यह विश्वास एक मनोवृत्ति के तौर पर विकसित हो रहा है कि सेना सब कुछ ठीक कर देगी। यह आज की नव-राष्ट्रवादी मानसिकता के अनुकूल भी बैठती है। भारतीय सेना पर गर्व की मुखर अभिव्यक्ति इधर के वर्षों में लगातार सामाजिक जीवन में, खासकर मीडिया में पाकिस्तान और चीन के खिलाफ तैयार किये गए जनमत के माध्यम से होती रही है और इसके राष्ट्रवादी राजनीतिक निहितार्थ भी छिपे नहीं हैं। इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव बहुत सूक्ष्म है। इस रूप में कि नागरिक प्रशासन की विफलता पर उसे विकल्प के तौर पर आजमाने से उस पर जनता का जो अगाध विश्वास मिलता है, वह कहीं शासन तंत्र के सूत्र उसे सौंप दिए जाने की मांग का आधार भी बन सकता है। इसलिये सेना का भरोसा सरहद पर उसकी तैनाती और देश की सुरक्षा के लिये उसकी कर्मठता तक होनी चाहिए। उससे मदद लेने की बजाए सब कुछ उसके हवाले कर देना उचित नहीं है।