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राजनीति को निर्बलों की हाय लगी है

राजनीति को निर्बलों की हाय लगी है

ध्रुव शुक्ल

अम्बेडकर जी ने सदियों से सताये गये दलित जीवन के उत्थान का ख़याल रखते हुए और उसे राजनीतिक,सामाजिक,आर्थिक न्याय देने की दृष्टि से दस साल के लिए आरक्षण का प्रावधान रखा था। तेहत्तर साल बीत गये। 

भारत के सत्ताकामी राजनीतिक दल और स्वयंसेवी संगठन इस पिछड़े और असहाय जीवन का अब तक भला नहीं कर पाये हैं। इस दबे और आज भी तिरस्कृत किये जाते अभावग्रस्त जीवन को दलित राजनीति ने अपना वोट बैंक बनाये रखने के सिवा आखिर किया ही क्या है। इनके नेता सम्पन्न और समझौता परस्त हो गये और इन नेताओं की सभाओं में अपना कलेवा बांधकर आने वाले ये असुरक्षित जन जहाँ के तहाँ बेबस जीवन काट रहे हैं।

जब भी आरक्षण पर पुनर्विचार की बात उठती है तो दलितों और पिछड़ों के वोट बैंक की राजनीति करने वाले सत्ता लोभी नेता ऐसी अराजक रार मचाते हैं कि इस विवश जीवन की दशा सुधारने का मंसूबा कभी पूरा न हो सके। बस दलित और पिछड़ों की वोट बटोरू राजनीति का धंधा चलता रहे।

आखिर यह कब तक चलेगा।  हम और हमारे प्रतिनिधि इस बेबस जीवन के प्रति अपनी जिम्मेदारी को और कितने साल स्थगित करते रहेंगे।  इस पतित राजनीति ने बेबसी में गुजर-बसर करते जीवन की उपेक्षा करके राजकाज की सौदेबाजी में तेहत्तर साल बरबाद कर दिए। इस राजनीति को निर्बलों की हाय लगी है। यह हाय एक दिन समूची भ्रष्ट राज्य व्यवस्था को ले डूबेगी।