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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - हेल्थ और वेल्थ के मामले में देश संकट में

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - हेल्थ और वेल्थ के मामले में देश संकट में

- सुभाष मिश्र
देश की सेहत फिलहाल ठीक नहीं है चाहे वह मामला हेल्थ का हो या फिर वेल्थ का। दोनो ही मोर्चे पर देश संकट से गुजर रहा है। ऐसे समय में देश में स्वास्थ्य सेवाओं में वृद्धि कर बाकी सभी तरह की फिजूलखर्ची, दिखावे के निर्माण पर रोक जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट ने भले ही फिलहाल केन्द्र सरकार के सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर पर्यावरण संबंधी कारणों से रोक लगा दी हो, परंतु इस प्रोजेक्ट के तहत बन रही सारी इमारते जिनमें सांसद भवन, राष्ट्रपति भवन, उत्तर दक्षिण ब्लाक की ईमारते, मंत्रालय के निर्माण पर भी रोक लगनी चाहिए। सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट पर 13450 करोड़ व्यय संभावित है। मोदी सरकार की मंशा है की देश की स्वातंत्रता की 75वीं वर्षगांठ इसका उद्घाटन किया जाए। देश हो या प्रदेश अभी कहीं भी इस तरह की सांसद भवन, विधानसभा भवन, मंत्रालय, प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री व मंत्री निवास बनाने की जरूरत नहीं है। नए राज्य छत्तीसगढ़, तेलंगाना, झारखंड, उत्तराखण्ड को इस बारे में विशेष पहल करके इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी के नाम पर किये जाने वाले निर्माण कार्यो को तत्काल रोक देना चाहिए। केन्द्र की तरह बहुत से राज्यों में हो रहे इसी तरह के निर्माण और फिजूलखर्ची हो रही है। कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर को देखते हुए सबसे पहले पूरे देश में विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार की जरूरत है। स्वस्थ्य सेवाओं में रिक्त पड़े सभी पदों को पात्रता के आधार पर भरकर ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए की देश का एक भी नागरिक आक्सीजन की कमी से दम न तोड़े।

चुनाव जीतने के लिए राजनीतिक पार्टियां जो घोषणा पत्र बनाती है, उनमें ऐसे किसी भी प्रावधान पर प्रतिबंध लगना चाहिए जिसका भार राजकीय कोष पर पड़े। अधिकांश पार्टियां लोक लुभावन नारों के साथ ऐसे वादे करती है जिन्हें पूरा करना उनके लिए संभव नहीं होता। देश को मुफ्तखोरी और कर्जा लेने की प्रवृत्ति से मुक्त कराने के लिए जरूरी है की इस समय मनरेगा जैसी योजना बनाकर लोगों से काम लिया जाये और उनकी मेहनत का भुगतान किया जाए। अजीज प्रेमजी फाउडेशन द्वारा कराये गये ताजा सर्वे के अनुसार देश के करोड़ लोग गरीबी की सीमा रेखा के नीचे चले गये है, और हमारा देश आंकठ तक कर्ज में डूबा हुआ है।
हम चार्वाक के सिध्दांत यदा जीवेत सुखं जीवेत, ऋणं कृत्वा, घृतं पिवेत यानी जब तक जियो सुख से जियो, उधार लो और घी पियो के सिध्दांत पर चल रहे है। इस मामले में कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब एक हैं ।
जिस तहत देश की वित्तीय व्यवस्था के बुरे हाल हैं उसी तहर राज्यों की भी स्थिति है। राज्यों की जीएसटी सहित अपने अन्य करों की राशि केन्द्र से नहीं मिल रही है। अगर हम छत्तीसगढ़ की बात करें तो सरकार ने इस तिमाही में बजट की 25 प्रतिशत राशि ही खर्च करने का प्रावधान किया है। छत्तीसगढ़ सरकार को राजस्व प्राप्ति के विपरीत अपै्रल-मई 2021 में तीन हजार करोड़ रूपये के राजस्व का घाटा होने का अनुमान है।
इस समय छत्तीसगढ़ सरकार पर कुल 66 हजार 968 करोड़ का कर्ज है। भूपेश बघेल सरकार को भाजपा की रमन सिंह सरकार से विरासत में 40 हजार 695 करोड़ का कर्ज मिला था। भूपेश बघेल सरकार ने पिछले दो सालों में 25 हजार 277 करोड़ का कर्ज लिया है। छत्तीसगढ़ का प्रत्येक नागरिक 18800 रूपये के कर्ज में डूबा हुआ है। सरकार ने इसके अलावा रिजर्व बैंक से 5000 करोड़ कर्ज मांगा है, और पॉंच साल के सुरक्षित अपनी प्रतिभूति बेचने का फैसला किया है।

देश के वित्त राज्यमंत्री अनुराग ठाकुर ने के अनुसार भारत पर कुल विदेशी कर्ज 554 अरब डॉलर (39 लाख करोड़ रुपए, 1 डॉलर की कीमत 70 रुपए के हिसाब से) है। बिजनेस इनसाइडर की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले साल सरकार पर कुल कर्ज 147 लाख करोड़ था। मार्च 2021 में भारत में बेरोजगारी दर 6.5 फीसदी है। शहरी इलाकों में बेरोजगारी की दर 7.1 फीसदी तो ग्रामीण इलाकों में 6.2 फीसदी है।
सेंट्रल विस्टा परियोजना के अंतगर्त एक नये त्रिकोणाकार संसद भवन का निर्माण किया जाना है, जिसमें 900 से 1200 सांसद की बैठक क्षमता होगी। सरकार ने कोरोना वायरस महामारी के बावजूद सेंट्रल विस्टा परियोजना खारिज नहीं की। न ही उसने 1,10,000 करोड़ रुपये की लागत वाली बुलेट ट्रेन परियोजना बंद की। 2021 के आम बजट में कोरोना महामारी में कोरोना वैक्सीन के लिए 35000 करोड़ आवंटित हैं। वहीं स्वास्थ्य पर 2.24 लाख करोड़ खर्च किये जायेगें। सरकार द्वारा बजट में घोषित यह राशि बहुत कम है।

हमारे देश में यूं तो कहने के लिए जनता की चुनी हुई सरकारें हैं, किंतु बहुत सी सरकारे जनता से जुड़ी जरूरतों की बजाय ऐसे गैर जरूरी कार्यो पर पैसे खर्च करती हैं। बसपा के राज में उत्तरप्रदेश में बाग-बगीचे, हाथियों की मूर्तियों पर होने वाला खर्च हो या फिर सरदार सरोवर पर सरदार वल्लभ भाई पटेल की आदमकद मूर्ति पर होने वाला खर्च हो। स्टैचू ऑफ यूनिटी पर 3000 करोड़ खर्च हुए है और इसकी साफ-सफाई के लिए वर्ष 2020-21 के बजट में 387 करोड़ का बजट प्रावधान रखा गया हैं। उत्तरप्रदेश की योगीनाथ सरकार ने भगवान राम की 251 मीटर ऊंची प्रतिमा स्थापित करने के लिए अधिग्रहित 61 हेक्टेयर जमीन के लिए 447 करोड़ तथा तकनीकी अध्ययन के लिए 200 करोड़ का बजट प्रावधान किया हैं। महाराष्ट्र सरकार ने मुंबई में शिवाजी की मूर्ति लगाने के लिए 3600 करोड़ का प्रावधान किया हैं। तेलंगाना सरकार ने वास्तु अनुरूप भवन बनाने के लिए भी 200 करोड़ खर्च किये हैं। अमरावती में नई राजधानी बनाने के लिए भी करोड़ो रूपये खर्च किये जा रहे हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य में नई राजधानी नवा रायपुर के विकास पर भाजपा सरकार ने दस सालों में 7 हजार करोड़ रूपये खर्च किए है और अभी तक यहॉ शहर नहीं बसा। कहने को नवा रायपुर में मंत्रालय, विभागाध्यक्ष और बहुत से कार्यालय संचालित है, किंतु यहॉ पर एक भी सरकारी अस्पताल नहीं हैं। नये रायपुर में उपचार के अभाव में बहुत से अधिकारी-कर्मचारी दम तोड़ चुके हैं। बिना ज्यादा मानव बसाहट के बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएँ, आवासीय कालोनी, जगर-मगर करती चौड़ी सड़के, बाग-बगीचों को मनुष्यों की जरूरत हैं। अभी भी सारे अधिकारी-कर्मचारी सरकार द्वारा अनुबंधित बसों, गाडिय़ों से नया रायपुर आते-जाते हैं। करोना संक्रमण के कारण अब बसे भी बंद कर दी गई हैं। कर्मचारी संगठन इस बात पर नाराजगी जता रहे है की नया रायपुर 30 किलोमीटर की दूरी पर अपने साधन से कैसे जाये। नया रायपुर में सारे सरकारी कार्यालय खुल जाने के बावजूद रायपुर के पुराने कार्यालय यथावत संचालित है। अफसर, मंत्री अपनी मर्जी और अपनी सुविधा से रायपुर से अपने आफिस संचालित करते हैं। रायपुर में सरकारी गाड़ी के लिए डीजल, पेट्रोल की खपत सीमा 80 लीटर है। वही नया रायपुर के लिए 250 लीटर। बहुत से अधिकारी जो एक से अधिक प्रभार में है, अपने पास तीन-चार गाड़ी रखे हुए है। नया रायपुर में नए विधानसभा भवन, मुख्यमंत्री निवास, मंत्री निवास का शिलान्यास होकर काम चालू है। विधानसभाभवन के लिए 270 करोड़ का प्रस्ताव रखा गया है।

दरअसल हमारे नेता, ब्यूरोक्रेट अभी तक अपने देश और राज्य की जनता की बुनियादी जरूरतों, प्राथमिकताओं को ठीक ढंग से नहीं समझ पाये हैं। इसलिए उनकी प्राथमिकता में अस्पताल, स्कूल नहीं हैं। उनकी प्राथमिकताएं बड़े-बड़े निर्माण, ठेको में है, जहॉ से उन्हें शुरू में ही अच्छा खासा कमिशन मिलें। छोटे और जरूरी कामों की ओर किसी का ध्यान नहीं हैं।