बाबरी विध्वंस : न्याय होते दिखना भी चाहिए हुजूर : दैनिक आज की जनधारा की संपादकीय.

बाबरी विध्वंस : न्याय होते दिखना भी चाहिए हुजूर : दैनिक आज की जनधारा की संपादकीय.

1990 के दशक में आई एक फिल्म का यही नाम था लेकिन आज सोशल मीडिया पर यह लाइन खासा वायरल हुई. 28 साल तक लंबे इंतजार के बाद सीबीआई की विशेष अदालत ने बाबरी केस में सभी 32 लोगों को बरी कर दिया. भाजपा और संघ परिवार से जुड़े संगठन इसे सत्य की जीत बता रहे हैं जबकि विपक्षी दल इसे लोकतंत्र का काला न्याय निरूपित कर रहे हैं. सीबीआई के विशेष जज सुरेन्द्र कुमार यादव का मानना है कि लाल कृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी और उमा भारती सहित 32 आरोपियों का इस ऐतिहासिक घटना से कोई ताल्लुक नहीं है. यह कार्रवाई अराजक तत्वों ने की. विद्वान न्यायाधीश ने यह भी कहा है कि इस संबंध में सीबीआई के पास ठोस सबूत नहीं थे.

यहां मुझे जॉली एल.एल.बी. फिल्म याद आ रही है. उसमें एक संवाद था- कानून अंधा नहीं होता है. वह सब समझता है पर उसे सुबूतों की जरूरत होती है और वो बैठा-बैठा सुबूत का इंतजार करता रहता है. देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी गए 28 सालों में कोई प्रमाण क्यों नहीं जुटा सकी, इसका उसे जवाब देना होगा. सीबीआई का कहना है कि वह ऊंची अदालत में अपील के लिए अपने विधि प्रकोष्ठ से सलाह लेगी. हो सकता है कि ब्यूरो हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाए क्योंकि 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इन नेताओं पर आपराधिक मुक़दमा चलाने को कहा था.

यह स्वत: सिद्ध सत्य है कि बड़ी भीड़ ने मस्जिद पर हमला बोलकर उसे ध्वस्त कर दिया था. इसके हर तरह के साक्ष्य उपलब्ध हैं. यहां सवाल उठता है कि अगर देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री सहित ये 32 लोग इसके दोषी नहीं हैं तो वे ‘अराजक तत्व’ कौन थे जिन्होंने इस वारदात को अंजाम दिया? उन्हें ढूंढा क्यों नहीं गया? वे कौन लोग थे, जो पत्रकारों को पीट रहे थे? वे कौन लोग थे, जो बलवा कर रहे थे? इतनी बड़ी संख्या में भीड़ खुद जुटी थी या जुटाई गई थी? इन लोगों को कारसेवक कहा जाता था। वे कौन थे, कहाँ से आए और कहाँ चले गए?
 
यह स्वत: सिद्ध सत्य है कि बड़ी भीड़ ने मस्जिद पर हमला बोल कर उसे ध्वस्त कर दिया था. इसके हर तरह के साक्ष्य उपलब्ध हैं. यहां सवाल उठता है कि अगर देश के पूर्व उपप्रधानमंत्री सहित ये 32 लोग इसके दोषी नहीं हैं, तो वे ‘अराजक तत्व’ कौन थे जिन्होंने इस वारदात को अंजाम दिया? उन्हें ढूंढ़ा क्यों नहीं गया? वे कौन लोग थे, जो पत्रकारों को पीट रहे थे? वे कौन लोग थे, जो बलवा कर रहे थे? इतनी बड़ी संख्या में भीड़ खुद जुटी थी या जुटाई गई थी? इन लोगों को कारसेवक कहा जाता था। वे कौन थे, कहाँ से आए और कहाँ चले गए?
 
कुछ प्रत्यक्षदर्शियों ने कहा भी था कि उस दिन भाजपा के इन आला नेताओं की सुनी नहीं गई थी पर यह सच है कि महीनों से जिस तरह के शब्द इनके श्रीमुख से निकल रहे थे, वे लोगों को उत्तेजित करने के लिए पर्याप्त थे. क्या यह जन-उत्तेजना उस दिन हदें पार कर गई थी कि इसके उन्नायक तक नेपथ्य में चले गए थे? अगर ऐसा था तो फिर हर्ष विह्वल उमा भारती और मुरली मनोहर जोशी के चित्र अखबारों में क्यों छपे थे?

उम्मीद के अनुरूप बाबरी ‘मस्जिद एक्शन कमेटी’ के जफरयाब जिलानी ने इस फ़ैसले के खिलाफ हाईकोर्ट जाने की घोषणा कर दी है. अब सीबीआई अपील करे, न करे पर मामला उच्च न्यायालय की दस्तक हर हाल में देगा. क्या वहां से इन सवालों के जवाब मिल सकेंगे? आश्चर्य कि शिवसेना के प्रवक्ता ने फैसले पर खुशी जताई है और ऐसा करते वक्त वे भूल गए कि उनके सर्वेसर्वा बाला साहब ठाकरे सीना ठोंककर कहा करते थे कि हमारे ‘सैनिकों’ ने इस कार्रवाई को अंजाम दिया। हालांकि, उन्होंने कभी उनके नाम सार्वजनिक नहीं किए थे. राजनीति की अपनी रीति-नीति है पर न्याय-नीति का तकादा है कि अपराध का दंड मिलना चाहिए. अगर अयोध्या में 6 दिसम्बर, 1992 को कोई अपराध हुआ, तो अपराधियों को दंड मिलना चाहिए पर यह हो कैसे? मुजरिम तो 28 बरस बीत जाने के बावजूद लापता हैं. अंत में इस मामले के एक और आरोपित आचार्य धर्मेंद्र ने बाइज्जत बरी होने के बाद जो टिप्पणी की, उस पर ध्यान दीजिए. वे कहते हैं- ये तो पहली झांकी है, काशी-मथुरा बाक़ी है. आप चाहें तो इसमें आने वाले दिनों की आहटें खोज सकते हैं.