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दे दो अपने निपटो कहना रिश्वत का सबूत नहीं, हाईकोर्ट ने निरस्त की सजा

 दे दो अपने निपटो कहना रिश्वत का सबूत नहीं, हाईकोर्ट ने निरस्त की सजा

इंदौर। दे दो अपने निपटो- कह देना रिश्वत की मांग नहीं। जब तक रिश्वत के पैसों की मांग साबित नहीं तब तक कैसे मान लेे कि रिश्वत ली गई। इस टिप्पणी के साथ हाई  कोर्ट इंदौर ने निचली अदालत द्वारा पंचायत सचिव सको सुनाई गई चार साल की सजा अपास्त (निरस्त) कर दी।
 हाई कोर्ट इंदौर में न्यायमूर्ति विवेक रुसिया की एकल पीठ ने एडवोकेट मनीष यादव के तर्क सुनने के बाद उक्त आदेश जारी किए। लोकायुक्त पुलिस द्वारा रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़े जाने पर पंचायत सचिव गिरिराज जाट को जिला कोर्ट ने भ्रष्टाचार अधिनियम की धाराओं में चार वर्ष की सजा सुनाई थी। फैसले के बाद आरोपी पंचायत सचिव ने निचली अदालत के फैसले की एडवोकट यादव के जरिए हाई कोर्ट इंदौर में चुनौती दी थी।
गौरतलब है कि तीन अगस्त 2015 को ग्राम पंचायत फोफलिया तहसील जीरन जिला नीमच निवासी फरियादी कैलाश मालवीय ने एक शिकायत आवेदन लोकायुक्त पुलिस को देते हुए कहा था कि उसे मुख्यमंत्री आवास योजना के तहत लीज पर पात्रता होने से भूमि का आवंटन हुआ है। लीज आवंटन के लिए पंचायत सचिव दो हजार रुपए की रिश्वत मांग रहा है। इस पर से लोकायुक्त पुलिस की टीम ने पंचायत सचिव को रिश्वत लेते रंगेहाथ पकड़ा था।
 निचली अदालत ने पंचायत सचिव को 29 अगस्त 2019 को चार वर्ष कैद की सजा सुनाई थी। तब से वह जेल में था। लोकायुक्त पुलिस अपराध सिद्ध नहीं कर सकी - पंचायत सचिव की ओर से एडवोकेट यादव ने अदालत में बहस में तर्क रखते हुए कहा कि लोकायुक्त पुलिस ने न तो किसी प्रकार की रिश्वत मांगने की आवाज की रिकार्डिंग पेश की और न ही किसी स्वतंत्र गवाह ने ऐसा आरोप लगाया। महत्वपूर्ण तथ्य भी अभिलेख पर नहीं प्रस्तुत किया आरोपी द्वारा लीज आवंटन के लिए केवल दे दो अपने निपटो कह देना भर से ही साबित नहीं होता कि रिश्वत मांगी गई। इन तर्कों से सहमत हाई कोर्ट ने सजा निरस्त कर दी।