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जनसंपर्क अधिकारी के पास नहीं है जिले में कार्यरत नियमित पत्रकारों की सूची

जनसंपर्क अधिकारी के पास नहीं है जिले में कार्यरत नियमित पत्रकारों की सूची

2 हज़ार का पोर्टल बना नशेड़ियों की हावी होती फौज पत्रकारिता से परे 

 कोरिया - पत्रकारिता के नाम पर लगातार हावी होती असामाजिक तत्वों  की तादात ने बहुत गंभीर स्थिति को निर्मित कर दिया है। असल मेहनतकश श्रमजीवियों और दायित्व निर्वहन कर्ताओं को इस पेशे में क्या कम चुनौतियां थीं जो अब इन विसंगतियों से भी जूझना पड़ रहा है।आपको बता दें कि जिस तरह से पत्रकारिता को आसान पेशा मानकर कोई भी और कहीं से भी चला आ रहा है।ना तो उसके लिए कोई दायरा है और ना ही कोई निर्धारित योग्यता ना तो अनुभव। सारा कुछ बिल्कुल बेरोक टोक सा होता चला जा रहा है।विज्ञापन दाताओं के सामने विकट परिस्थिति बन चुकी है।नियमित अख़बार और टीवी चैनलों के पत्रकारों से भी 4-5 गुना ज्यादा पोर्टल की फौज बिना किसी प्रमाण के खुद को पत्रकार की श्रेणी में गिनती गिनाते नजर आते हैं।कोरिया जिले के हालात तो इस मामले में इतने बदतर हो चुके हैं कि अब चर्सी और नशीली दवाओं के आदतन भी अपनी बुराइयों की खर्च पूर्ति के लिए 2 हज़ार का पोर्टल बनवा अधिकारियों से उगाही का ढर्रा अपना चुके हैं।कभी किसी नाम से तो कभी अपना आदमी भेज रहा विज्ञापन का पैसा दे देना कहकर पत्रकारिता को सिर्फ उगाही के उद्देश्य से चरितार्थ करने की होड़ मचा चुके हैं।हालांकि इन मामलों में पेशेवर वरिष्ठों की पहल भी कारगर हो सकती है और स्थिति काफी हद तक सुधारी जा सकती है।पर वहीं दूसरी ओर संघी गुटों की बड़ी फौज बनाने की प्रतिस्पर्धा स्थिति को बेकाबू करने में सहयोगी बना रहता है।और दो दिन के तथाकथित लोगों को पत्रकारिता के बिना गुण परखे उन्हे अपनी शरण गाह में पनाह दे देते हैं।वहीं अगर जिले के जनसंपर्क अधिकारी से जिले में संचालित नियमित अख़बार और टीवी चैनलों के पत्रकारों की सूची पर सवाल किया जाता है तो अधिकारी महोदय के जवाब बेहद ही गैरजिम्मेदाराना मिलते हैं।आपको बता दें कि नियमित पत्रकारों के अलावा अगर बात करें तो कोरिया जिले में तकरीबन डेढ़ सौ से सवा दो सौ की लिस्ट में पत्रकारों को शुमार किया जाता है।जो आंकड़े बेहद चौंकाने वाले हैं।जबकि अगर जिले में संचालित अख़बार और टीवी चैनलों के पत्रकारों की बात करें तो गिनती 50 के लमसम बमुश्किल पूरी होती है।फिर इन आंकड़ों का हिसाब तो जिला जनसंपर्क कार्यालय से ही तलब करना बनता है।जो वहां मौजूद नहीं है कहा जाता है।बहरहाल फर्जी और आदतन जालसाजों से पत्रकारिता को अगर बचाकर रखना है तो प्रशासनिक स्तर पर जिला जन संपर्क विभाग का दायित्व बनता है कि विभाग सभी पत्रकारों के पी आर ओ लेटर की पड़ताल 6-6 महीनों में उनके उच्च कार्यालय से करें जिससे उसके नियमित या सही रूप से कार्यों की जानकारी रहे।हर नए पी आर ओ लेटर पर दिए गए सस्था के संपर्क नंबर से बात पश्चात ही उसे सूची में शामिल करें।संधारित पत्रकारों की सूची में उनकी डिटेल भी सम्मिलित करें।पत्रकारों की सूची जनसंपर्क विभाग से सभी प्रशासनिक कार्यालयों को समय समय पर भेजा जावे।तभी पूरी पारदर्शिता बनी रहेगी और बिचौलियों,नशेड़ियों और पेशे को दागदार करने वालों की फौज पर शिकंजा कसेगा।