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राज्यपाल उइके का 'प्रफुल्लित' पक्ष : अनुसूइया उइके के कार्यकाल का एक वर्ष पूरा होने की समीक्षा कर रहे हैं संपादक अनिल द्विवेदी

राज्यपाल उइके का 'प्रफुल्लित' पक्ष : अनुसूइया उइके के कार्यकाल का एक वर्ष पूरा होने की समीक्षा कर रहे हैं संपादक अनिल द्विवेदी
  • अनिल द्विवेदी

    राजनीति शास्त्र की पुस्तकों में राज्यपाल को सरकारों का 'स्टाम्प—पेड जरूर कहा गया है लेकिन भारतीय समाज में शंकराचार्य हों या राज्यपाल, ये दो पद ही ऐसे हैं जो सोसायटी के लिए श्वेतरक्त कणिकाओं का काम करते हैं जो समाजरूपी शरीर को सेहतमंद रखती हैं. राज्य की प्रथम नागरिक यानि राज्यपाल सुश्री अनुसूइया उइके अपने कार्यकाल का आज एक वर्ष पूरा कर रही हैं. उन्हें सहस्त्रों बधाईयां, शुभकामनाएं. सुश्री उइके बड़प्पन, ज्ञान और उदारता की प्रतीक हैं. वे संपर्कों की सूरमा हैं. एक साल में लगभग 10 हजार से ज्यादा 'अप्वाइंटमेंट लेकर उन्होंने साबित किया है कि वे राजभवन राज करने नही आईं, उन्होंने उसे आमभवन बना दिया है. नियमों, मर्यादाओं पर चलकर सुशासन कायम रखना उनकी पहली प्राथमिकता रही.

    फिर मैडम उइके उस 'कांग्रेसियत' से निकली हैं, जो देश में सबसे ज्यादा समय तक स्वीकार की गई. आपने यूरोप के मशहूर सियासतदाँ बिस्मार्क का नाम सुना है या नहीं. उसके बारे में मशहूर था कि वह एक वक्त में पांच गेंदें हवा में उछालता था जिनमें से दो हमेशा उसके हाथ में होती थीं. वे दो गेंदे भी कौन सी? वही, जिन्हें वह हाथ में रखना चाहता था. मैडम ने राज्य का प्रथम नागरिक होने का पूरा फर्ज अता किया. गरियाबंद के सुपेबेड़ा में जाकर किडनी के मरीजों से मुलाकात, लॉकडाउन में प्रथम नागरिक की तरह सबकी चिंता करना, राष्ट्रपति—उपराष्ट्रपति से प्रदेश के विकास को लेकर संपर्क रखने से लेकर उच्च शिक्षा और जनजातीय मुददों पर भी बेबाक रॉय रखी.

    अब सबको खिलौने के रूप में चंद्रमा तो नही दिया जा सकता ना. गवर्नर सुश्री अनुसूइया उइके ने 'वीसीज की नियुक्ति के मामले से लेकर पत्रकारिता विश्वविद्यालय का नाम बदलने तक में जिस तरह इस्पाती और दानाई फैसले लिए, उससे यही निष्कर्श निकाला जा सकता है कि मैडम राज्यपाल को कोई नही हांक सकता. उनके कुलपति नियुक्त करने के फैसले पर सरकार ने आंखें जरूर तरेरी थीं, फिर बड़ा दिल दिखाते हुए शिरोधार्य भी कर लिया. राजपाट और लोकतंत्र को ऐसे ही चलाया जाता है. यहां कोई कठपुतली नही है, संविधान में सबकी सुरक्षा है, सबको अधिकार भी दिए हैं.

    आंखें मल मलकर देखें तो पूर्व राज्यपाल दिवंगत दिनेशनंदन सहाय को छोड़कर बाकी के तीन राज्यपाल संग चलव' का राग अलापते रहे. गवर्नर हाउस क्लीयरिंग हाउस ही बने रहे. हां, शेखर दत्त जब कुलाधिपति थे तो प्रदेश की शिक्षा, उच्च शिक्षा को लेकर काफी संजीदा थे नतीजन वे स्कूलों और विश्वविद्यालयों पर पैनी नजर रखते थे. कई बार छापामार शैली में सरकारी स्कूल पहुंचते और विदयार्थियों के साथ—साथ अध्यापकों के ज्ञान की भी परीक्षा ले लेते थे. आश्चर्य कि तबकी सरकार ने कभी मुंह नही फुलाया लेकिन एक चुभता हुआ प्रश्न यह है कि विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति और प्रोफेसरों के भ्रष्टाचार के खिलाफ जो शिकायतें हुई, उनकी फाइलों की गर्द कब साफ होगी भला!

    मध्य दृश्य में हम पाते हैं कि सालोंसाल से मामले पेंडिंग पड़े हैं और कुलाधिपति होने के नाते दृष्टिपात तो गवर्नर को ही करना है, चाहे वह तकनीकी विश्वविद्यालय का मामला हो, पं. सुंदरलाल शर्मा विश्वविद्यालय का या फिर पत्रकारिता विश्वविद्यालय का. कुलपतियों के भ्रष्टाचार से जुड़ी सैकड़ों शिकायतें राजभवन तक पहुंचती रही लेकिन कड़ी कार्रवाई की दरकार ना हो सकी. अन्य राज्यपालों के कार्यकाल में कुछ चेतावनियों ने कानाफूसियों को जन्म जरूर दिया परंतु यह एक सदानीरा की सतह पर उभरते हुए बुलबुले से अधिक की हैसियत कभी अख्तियार नही कर सका. उम्मीद है कि सुश्री उइके इन मामलों पर भी गौर फरमाएंगी.

    क्योंकि वे जिस राजभवन में विराजित हैं, वहां से सरकार तक का रास्ता थोड़ा उबड़—खाबड़ है इसलिए संतुलन बनाना पहली शर्त है. इसे समझते हुए ही सरकार के तीन मंत्री उनसे बातचीत करने पहुंचे थे. चाय के साथ चर्चा के बाद जाहिर है रिश्तों में जामिद.बर्फ पिघलनी ही थी. महामहिम ने आदर्श स्थिति निर्मित करते हुए हाल ही में संगीत विश्वविद्यालय में उसी कुलपति की नियुक्ति की जो सरकार को पंसद था. यानि सुश्री उइके सरकार से टकराव के मूड में भी नही हैं और अपने अधिकारों में हस्तक्षेप करने की इजाजत भी नही देंगी. लेकिन वे राज करने भी नही आई हैं. नियमों और मर्यादाओं पर चलकर सुशासन कायम रखना महामहिम की पहली प्राथमिकता है और एक साल में उन्होंने इसके साथ पूरा न्याय किया है.

    ( लेखक दैनिक आज की जनधारा तथा वेब मीडिया हाउस के संपादक हैं )