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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - वादे हैं वादों का क्या?

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - वादे हैं वादों का क्या?


चुनाव और वादे एक-दूसरे के पर्याय हैं। चुनाव आने से पहले आजकल जनघोषणा पत्र का चलन बढ़ा है। पहले राजनीतिक पार्टियां अपनी पॉलिसी और जनता की मांग और जरूरतों के अनुसार घोषणा तैयार करती थीं। चुनाव में खड़े होने वाले प्रत्याशी पार्टी लाईन से अलग भी बहुत से वादे करते हैं और प्रलोभन भी देते हैं।

दुष्यंत कुमार का एक शेर है।

कहां तो तय था चिरांगा हर एक घर के लिए

कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए।

यह शेर हमारी आजादी के बाद दिखाए गए सब्जबाग था, उस समय नारा लगाया जाता था 'देश जब होगा आजाद, उजड़े घर होंगे आबाद। देश आजाद हो गया पर उजड़े घर आबाद होने की बांट ही जोहते रहे।

रायबहादूर राय, साहब सब देशभक्त हो गये। जनता आश्वासन के झूले पर झूलती हुई साधु-संतों, जादूगरों को देखती रही। नेता बनकर लोग शासन के घोड़े पर सवार होकर आजाद भारत में कश्मीर से कन्या कुमारी तक विचरण करते रहे। हमारे देश में बहुत सारे नेता हर बार चुनाव के समय अलग-अलग नारो, टोपी, मुद्दे और वेशभूषा में आकर जनता से वादे करते थे। वे एक तरह के जादूगर होते हैं, जो अपना जादू दिखाकर दृश्य से गायब हो जाते हैं। मासूम जनता बहकावे या झासे में आकर वोट देकर छली जाती है। यही सिलसिला खूब चला किन्तु धीरे-धीरे लोगों ने सवाल पूछना शुरू किया। अपनी मांगों के लिए प्रदर्शन, आंदोलन, चुनाव का बहिष्कार तक के लिए निर्णय लिए। हालात पहले से थोड़े सुधरे, किन्तु वादा खिलाफी का सिलसिला भी यूं ही चलता रहा।

जनता कहने लगी- 'वो करके गये ये वादा आयेंगे मजार पर, हमने तो जान दी भी इसी एतबार पर।Ó वो प्रकट तो हुए पर एक चुनाव से दूसरे चुनाव के समय। बहुत बार तो जिस दल से जीतकर गये थे, अगली बार उसी के खिलाफ वोट मांगते नजर आये। सत्ता में बने रहने के लिए कुछ भी करने को तत्पर नेता अब एक-दूसरे के खिलाफ बोल रहे हैं। पासवान भाजपा के साथ नूरा कुश्ती करते हुए नीतिश बाबू को निपटाने में लगे हैं। अभी बिहार का चुनाव होने जा रहा है, बिहार के चुनाव में राजनीतिक पार्टियां एक से बढ़कर एक वादे कर रही हैं। भाजपा ने प्राथमिकता के आधार पर कोरोना वैक्सीन बिहार को देने का वादा अपने घोषणा पत्र में किया है। अभी वैक्सीन का दूर-दूर तक ठिकाना नहीं। यदि वैक्सीन मिल रही होती तो अमेरिका के राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंम्प ही उसे नहीं बांट देते। दरअसल तेजस्वी यादव ने अपने घोषणा पत्र में 10 लाख लोगों को नौकरी देने की बात कह दी। अब बाकी पार्टी क्या करें, तो वे भी 19 लाख नौकरी के साथ वैक्सीन देने की बात कह रही है। जनता बिना मास्क लगाये बेधड़क घुम रही है।

हमारे देश के मुखर और 56 इंच सीना रखने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी लोकसभा चुनाव 2014 में सभी के खातों में 15 लाख रुपये आने, विदेशों से काला धन लाने के साथ अच्छे दिन आने का वादा किया था। लोग अभी तक इसका इंतजार कर रहे हैं। अच्छे दिनों को कोरोना की नजर लग रही है, वो किसी आइसोलेसन सेंटर में चला गया है। भला हो पाकिस्तान का जिसके ऊपर चढ़कर 2019 के चुनाव की वैतरणी पार हो गई वरना लोग 15 लाख और कालाधन पूछते। ऐसा नहीं है कि यह वादा खिलाफी पहली बार की गई। अटल बिहारी वाजपेयी के समय शाइनिंग इंडिया का नारा था। इसके पहले राजीव गांधी की सरकार सबको इक्कसवीं सदी के भारत की सैर करा रही थी। इंदिरा गांधी की सरकार ने गरीबी हटाओ का नारा दिया था। वो कहते हैं इंदिरा हटाओ, हम कहते हैं गरीबी हटाओ यही वह लाइन थी, जिसके जरिए चुनाव प्रचार में उन्होंने लोगों की हमदर्दी बटोरी। वहीं, विरोधियों ने गरीबी हटाओ के जवाब में नारा दिया, 'देखो इंदिरा का ये खेल, खा गई राशन, पी गई तेल।

किसानों का कर्जा माफ, बिजली बिल हाफ, पानी का पैसा माफ, अच्छी सड़क, अस्पताल, रोजगार, सुशासन, भ्रष्टाचार से मुक्त पारदर्शी सरकार जैसे शब्द तो चुनाव घोषणा पत्र के जरूरी उपकरण है। लालबत्ती हटती है तो पीली बत्ती आ जाती है।

बीजेपी ने बिहार विधानसभा चुनाव के जो विजन डॉक्यूमेंट जारी किया है उसकें वादा किया है कि बिहारवासियों को फ्री में कोरोना का टीका लगाया जाएगा। बीजेपी के इस वादे के बाद विपक्षी पार्टियां हमलावर हो गई हैं। शिवसेना नेता संजय राउत ने कहा कि क्या जो लोग बीजेपी को वोट नहीं देंगे, उन्हें वैक्सीन नहीं दी जाएगी? संजय राउत ने सवाल उठाया कि क्या जहां बीजेपी की सरकार नहीं हैं, वहीं टीका नहीं मिलेगा, इसको क्लियर करना चाहिए। जब हम स्कूल में थे तब एक घोषणा थी कि 'तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा। अब एक नई घोषणा देख रहा हूं कि 'तुम मुझे वोट दो मैं तुम्हें वैक्सीन दूंगा।

राजद नेता तेजस्वी यादव वादा कर रहे हैं कि उनकी सरकार बनी तो कैबिनेट की पहली बैठक में युवाओं को 10 लाख रोजगार देने के फैसले पर मुहर लगेगी।

चुनाव के समय राजनीतिक पार्टियों द्वारा मतदाताओं को आकर्षित करने के लिये मुफ्त में सुविधायें देने या रेवडिय़ा बांटने की, प्रलोभन देने की प्रवृत्ति से उच्चतम न्यायालय भी सहमत नहीं है। उच्चतम न्यायालय का मानना है कि राजनीतिक दलों को चुनाव के दौरान अपने घोषणा पत्रों में मुफ्त में रेवडिय़ां बांटने का प्रलोभन मतदाताओं को नहीं देना चाहिए, क्योंकि इससे स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की बुनियाद ही कमजोर होती है। शीर्ष अदालत ने करीब सात साल पहले 2013 में अपने एक फैसले में कहा था कि हालांकि चुनाव घोषणा पत्रों मे किये गये वायदे जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 के तहत 'भ्रष्ट आचरण नहीं होते हैं। परंतु इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि बड़े पैमाने पर मुफ्त मे रेवडिय़ां बांटने के वायदे समाज के सभी लोगों को प्रभावित करते हैं। इस तरह की गतिविधियां बड़े पैमाने पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव की जड़ो को हिला देती हैं। चुनाव घोषणा के खिलाफ और वादों के बारे में चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों से कहा था कि वे चुनाव में वायदे कर सकते हैं, लेकिन उन्हें ऐसा करने की वजह और इन्हें पूरा करने के लिये धन की व्यवस्था के बारे में भी बताना चाहिए, ताकि यह महज चुनावी वायदे ही बनकर नहीं रह जायें। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल लोकपाल वादे के साथ ही थे, लेकिन वो भी दुनियादारी वाले कसमें-वादे, प्यार-वफा जैसा ही रहा। दो चुनाव जीतने के बाद तीसरी कवायद में जुटे हैं, लेकिन वादे पर वादे करते चले जा रहे हैं, ठीक ही है, 'वादे तो वादे हैं, वादों का क्या?

चुनाव में किये जाने वाले वादों को लेकर केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कहा कि सपने दिखाने वाले नेता लोगों को अच्छे लगते हैं, लेकिन वही सपने पूरे न हों तो जनता पिटाई भी करती है। गडकरी ने राजनेताओं को चेताया है कि वे लोगों को वही सपने दिखाएं जो आप पूरा कर सकें।

ऐसा नहीं है कि सरकारें चुनाव जीतने के बाद अपने घोषणा पत्र अमल नहीं करती। दरअसल, घोषणापत्र बनाते समय कोई ये नहीं देखता कि देश की राज्य की वित्तीय स्थिति कैसी है। देश के खजाने में कितना पैसा है, कितना कर्जा है। बहुत सी सरकारें को अपने वादे पूरा करने के लिए देश को, राज्य को पूरी तरह कर्ज में डूबों देती हैं। सभी सरकारों की मंशा आने वाली सरकारों को खाली खजाना और कर्जा देकर जाने की होती है।

देश की जनता की आंख पर धर्म की, राष्ट्रवाद की, जातियत की, सांप्रदायिका की पट्टी बांधकर उसे गोदी मीडिया के जरिये गैर जरूरी मुद्दों से उलझाने वाले हमारे देश के नेता बखूबी जानते हैं कि हमारी भोलीभाली धर्मपारायण जनता को किन-किन मुद्दों में उलझाया जा सकता है। बकौल दुष्यंत कुमार

'उन्हें मालूम है कि

न हो कमीज तो पांवो से पैर ढंक लेगें

ये लोग कितने मुनासिब हैं, इस सफर के लिए।