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किस्सा ए मुक्तिबोध: मुक्तिबोध काव्य गगन के प्रखर तेजस्वी सूर्य हैं

किस्सा ए मुक्तिबोध: मुक्तिबोध काव्य गगन के प्रखर तेजस्वी सूर्य हैं

शीरीन सिद्दिक़ी/ रायपुर।  13 नवंबर 1917 को ग्वालियर मध्य प्रदेश मे जन्मे हिन्दी सहित्य जगत की बुनियाद कहे जाने वाले शीर्ष, प्रगतिशील कवि, बल्कि कविता के बीच का सेतू कहलाते थे गजानन माधव मुक्तिबोध। 

मुक्तिबोध काव्य गगन के प्रखर, तेजस्वी सूर्य हैं। आपकी रचनाओं को पढ़कर मह्सूस होता है। मानो आप कविता की आत्मा खोजने के बजाय, आत्मा की अंतरात्मा मे उतर जाते थे। बड़ी से बड़ी या गहरी बात को सरलता से कहने का हुनर उनमें खूब था।  उनकी कविता में जीवन के अनेक रंग नजर आते हैं.। 

 संघर्ष, आजादी,प्रेम,मुफलिसी,घुटन ना जाने कितने भावों की अभिव्यक्ति को कलात्मकता के साथ शब्दों में पिरो दिया करते थे। उनकी जिज्ञासा बड़ी हो जाती,और सामने आकर खड़ी हो जाती। 

मुक्तिबोध जी ने बताया रस और चिंतन का फर्क

जैसे रस का संबंध हृदय है और ज्ञान का संबंध बुद्धि या आत्मा से है। मुक्तिबोध कहते हैं संवेदनात्मक ज्ञान और ज्ञानात्मक संवेदना दो बिल्कुल अलग अलग भाव हैं।  तय करो किस ओर हो तुम सुनहली उर्धवासन के दबाते पक्ष में या अंधेरी निम्न कक्षा में तुम्हारा मन। 

तय करो किस ओर हो तुम...

वो कहते .. मेरी कविता की आग की तपिश में जलोगे... तो समझ पाओगे...मुक्तिबोध जी की कविताओं में फंतासी का तत्व भरपूर होता है...जो हक़ीकत का अक्स हुआ करती था।  मुक्तिबोध जी के बारे में कई स्थापित साहित्यकार कहते हैं कि , मुक्तिबोध की कविता को समझने के लिए उनकी तरह ही जीना होगा या जीने के अनुभवों से गुज़रना होगा। एक लिखने वाले को समझने के लिये एक पढ़ने वाले के पास वैसा ही मापदंड होना चाहिए। पता नहीं कब कौन कहां किस ओर मिले, किस सांझ मिले किस सुबह मिले। ये राह जिन्दगी की जिससे जिस ओर मिले, जिससे जिस ओर मिले,,,,,