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संपादकीय : हमें कैसी पोलिस चाहिए, आइपीएस आर के विज के एक टिवट से उठा यह सवाल

संपादकीय : हमें कैसी पोलिस चाहिए, आइपीएस आर के विज के एक टिवट से उठा यह सवाल

सोशल मीडिया के प्रमुख प्लेटफार्मस में से एक है टिवटर. राज्य के बहुत से नौकरशाह इससे जुड़े हैं और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत टिवट करते हुए अपने विचार रखते हैं, कोई नया मुददा पेश करते हैं या फिर अच्छी बातों को शेयर कर लेते हैं. ऐसा ही एक टिवट राज्य के वरिष्ठ आइपीएस आर के विज ने किया था. वे पुलिस के महानिदेशक हैं तथा आए दिन बेस्ट पुलिसिंग के कई उदाहरण दिखाते हुए इस बात के पक्षधर हैं कि पुलिस अधिकारी या आरक्षकों का व्यवहार जनता के अनुरूप होना चाहिए. विज साहब ने एक महिला आइपीएस का वीडियो वायरल किया जिसमें अपने बेटे की हत्या से दुखी एक पिता, उस महिला एसपी के पैर छू रहा है और महिला अफसर हंस रही हैं.

विज का मानना है कि पुलिस अफसरों को इस तरह के दिखावे से बचना चाहिए. वे अपराधियों के 'माई—बाप' हो सकते हैं लेकिन न्याय पाने की उम्मीद में आया एक बूढ़े शख्स के नही. उसे तो न्याय मिलना चाहिए. एक दूसरी तस्वीर भी टिवटर पर दिखाई दी जिसमें एक गैंगरेप पीड़िता 24 घण्टे से किसी थाने के बाहर धरना पर बैठी है ताकि पुलिस उसकी इज्जत के दोषियों को तत्काल पकड़े और जेल की सलाखों के पीछे डाले. मैंने इन दोनों टिवट को देखा तो उसे शेयर करते हुए आइपीएस आर के विज से कहा कि इन तस्वीरों का दूसरा पहलू यह है कि पुलिस पर आज भी भरोसा टिका हुआ है कि उन्हें न्याय मिलेगा. हर पुलिस वाला आम आदमी को 'सिंघम ही नजर आता है. हालांकि यह भरोसा अब राजनीतिज्ञों से उठता जा रहा है अन्यान्य वजहों से. संविधान सभी से यह अपेक्षा करता है कि लोग उन कानूनों का पालन करेंगे, जो संविधान-विरोधी नहीं हैं मगर जब ऐसा नहीं होता, तो पुलिसिंग शुरू हो जाती है.

पुलिसिंग और पुलिस एजेंसी, दोनों अलग-अलग अवधारणाएं हैं, इसे एक समझने की भूल कतई न करें. पुलिसिंग एक व्यापक विचार है, जिसमें कानून लागू करने वाली प्रक्रिया के सभी अंग आते हैं. यह दो तरह की होती है, आंतरिक और बाहरी. अभी दिक्कत यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर मौलिक अधिकारों का जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल नहीं हो रहा, जिस कारण बाहरी पुलिसिंग की जरूरत बढ़ती दिख रही है, मगर सवाल यह है कि जिसे यह जिम्मेदारी सौंपी जा रही है, वह एजेंसी इसके लिए कितनी तैयार है? बेशक पुलिस कानून लागू करने वाली एकमात्र एजेंसी नहीं है, मगर आम धारणा में यह उसी का दायित्व माना जाता है. इसकी बड़ी वजह यह है कि अपने यहां पुलिस सरकार का हिस्सा है, जबकि अमेरिका, जापान जैसे तमाम देशों में यह एक स्वायत्त संस्था है. इसी कारण अपने यहां पुलिस का सदुपयोग कम, दुरुपयोग ज्यादा दिखता है. इतना ही नहीं, अपने यहां पुलिस की जिम्मेदारी दोहरी प्रवृत्ति की है. वह नियुक्ति, तबादला, सेवा निवृत्ति जैसे कामों के लिए सरकार व राजनेताओं पर निर्भर है, जबकि कानून लागू करने के वास्ते न्यायपालिका के प्रति जवाबदेह है.

यह एक ऐसा भंवरजाल है, जिससे भारतीय पुलिस चाहकर भी नहीं निकल पा रही. पुलिस की इसी दोहरी प्रकृति का लाभ सरकार उठाती है. बाबरी मस्जिद ध्वंस इसका एक बड़ा उदाहरण है. 6 दिसंबर, 1992 को जब आयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई थी, तब आनन-फानन में वहां के तत्कालीन डीएम और एसएसपी को निलंबित कर दिया गया था, लेकिन आज की तारीख में कानूनन कोई राजनेता या कोई इंसान इस घटना का कुसूरवार नहीं है. जाहिर है, लोकतंत्र में पुलिस के माध्यम से शासन करने का तरीका गलत है. स्थिति यह है कि आज पुलिस-प्रशासन को लेकर विपक्ष और सत्ता पक्ष की अपनी-अपनी दलीलें हैं. जो आज सत्ता में है, वह विपक्ष में जाने पर वही भाषा दोहराता है, जो आज विपक्षी दल बोल रहे होते हैं. पुलिस सैद्धांतिक तौर पर ‘एजेंसी ऑफ लॉ’ (कानून लागू करने वाली संस्था) होती है, पर असलियत में उसे ‘रूलर्स एजेंसी’ (शासकों की एजेंसी) बना दिया गया है. नतीजतन, आज पुलिस जो कुछ भी करती है, हर किसी को यही लगता है कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे शख्स के इशारे पर वह हो रहा है. अब ‘अपराधी और पुलिस के गठजोड़’ जैसी बातें बेमानी हो चुकी हैं. इससे भी खतरनाक गठजोड़ ‘पुलिस और राजनेता’ का बन चुका है. लिहाजा समाज को ही यह सोचना होगा कि उसे कैसी पुलिस चाहिए? मीडिया से अपेक्षा होती है कि वह समाज को इस बाबत जागरूक करेगा, लेकिन दुखद है कि उसे भी पूरी जानकारी नहीं है.

साफ है, एक जागरूक समाज ही अच्छी पुलिसिंग की व्यवस्था कर सकता है मगर दुर्भाग्य से हमारा समाज इसके लिए तैयार नहीं है, और पुलिस भी उत्तरोत्तर शासन का हिस्सा बनती जा रही है, जिससे होने वाली गड़बड़ियां हमारे सामने हैं. हमें यह मान लेना चाहिए कि जब पुलिस को राजनीतिक पार्टी का हिस्सा बना दिया जाएगा, तब सदुपयोग से ज्यादा उसके दुरुपयोग होंगे.