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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सामाजिक पंचायतों की भूमिका

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से-सामाजिक पंचायतों की भूमिका

 
किसान आंदोलन के दौरान सबसे ताकतवर तरीके से हरियाणा, पंजाब और उत्तरप्रदेश, राजस्थान की बहुत सी खाप पंचायत, किसान पंचायतों की भूमिका दिखाई व सुनाई दी। अभी भी ऐसी पंचायतों के फैसलों के कारण किसान आंदोलन को बार-बार नई ऊर्जा मिलती है। पूरे देश में अलग-अलग पंचायतें खास करके समाजिक पंचायतें बहुत ही सशक्त हैं। पंचायती राज व्यवस्था को मजबूत करने के लिए संविधान में 73वें संशोधन के साथ पंचायती राज व्यवस्था लागू करके त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू की गई, किन्तु अधिकांश जगहों पर पंचायतें सरकारी दफ्तर होकर रह गई। पंचायत पदाधिकारियों के चुनाव में भी धनबल का प्रभाव साफ दिखाई देने लगा। पंचायतों के पास उपलब्ध परिसंपत्तियों, अधिकारों विशेषकर खनिजों का उत्खनन, उद्योग को एनओसी देने और सार्वजनिक जमीनों की उपलब्धता, केन्द्र और राज्य की योजनाओं का पैसा सीधा पंचायतों को मिलने से बहुत से लोगों को पंचायत के सरपंच का पद लाभ का पद दिखाई देने लगा। ग्राम पंचायत से लेकर जनपद और जिला पंचायत के प्रतिनिधि अब बड़ी-बड़ी महंगी लग्जरी गाडिय़ों पर सवार दिखाई देते हैं। मनरेगा जैसी योजनाओं ने पंचायत प्रतिनिधियों को आर्थिक रुप से मजबूती प्रदान करने में बड़ी भूमिका निभाई।

खैर हम बात कर रहे हैं सामाजिक रीति-रिवाज, पंचायतों द्वारा जारी निर्देशों और समाज के मान्य नियमों के विरुद्घ व्यवहार, आचरण करने पर दंडात्मक कार्यवाही की। बहुत पहले से हरियाणा की खाप पंचायतें अपने ऐसे फैसलों के लिए चर्चा में रही है जो कानून संगत नहीं थे। पंचायतों के निर्णय पर बहुत से लोगों की जानें अंतरजातीय, सजातीय गोत्र में विवाह करने के कारण गई है। अब मामला छत्तीसगढ़ का है जहां का नारा है सबले बढिय़ा छत्तीसगढिय़ा। ऐेसे तो यहां के लोग बहुत शांत और अनुशासन प्रिय हैं किन्तु यहां के कुछ समाजों में पंचायतों की भूमिका बहुत ही अहम है।
रायपुर जिले की आरंग तहसील के ग्राम रींवा (लखौली) गांव ने 14 फरवरी को समाज की सामाजिक बैठक में प्रेम विवाह करने वाले ग्राम लखौली, रींवा, खम्हरिया और गुरवेरा के परिवारों से 40-40 हजार रुपये अर्थदंड वसूल किया गया। इधर, राज्य की बिगड़ती कानून-व्यवस्था और महिलाओं पर होने वाले अपराध और अत्याचार को लेकर भाजपा पूरे प्रदेश में 20 फरवरी को धरना प्रदर्शन करने जा रही है। उन्हें सामाजिक पंचायतों के इस तरह के निर्णय से कोई खास लेना-देना नहीं है। यहां सवाल यह है कि समाजिक पंचायतों द्वारा सामाजिक बहिष्कार की यह परंपरा बहुत पुरानी है। यदि हम अकेले छत्तीसगढ़ की बात करें तो यहां तीस हजार परिवार ऐसे हैं जो सामाजिक बहिष्कार का दंश झेल रहे हैं। छत्तीसगढ़ में पहले जादू-टोना, टोनही प्रथा के नाम पर अकेली महिला को प्रताडि़त करने की घटनाएं बहुत होती थी। वर्ष 2005 में छत्तीसगढ़ टोनही प्रताडऩा निवारण विधेयक लागू हुआ, जिसमें जेल में निरुद्घ करना, आर्थिक दंड, मुआवजा को शामिल किया गया। इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय समस्त अपराध संज्ञेय और अजमानतीय है। दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की धारा 360 तथा अपराधी परिवीक्षा अधिनियम 1958 के तहत दोषी व्यक्ति के लिए तीन वर्ष तक की सजा का प्रावधान किया गया है।

टोनही प्रथा, सामाजिक भेदभाव, अंधविश्वास जैसी कुरीतियों और कुप्रथाओं के विरुद्घ लंबे समय से संघर्ष कर रहे अंधश्रद्घा निर्मूलन समिति के अध्यक्ष डॉ. दिनेश मिश्र कहते हैं कि अभी हाल ही में हमने दो परिवारों का सामाजिक बहिष्कार समाप्त कराया। जशपुर और राजिम के दो परिवार भले ही सामाजिक बहिष्कार के दंश से बच गये हों किन्तु अभी भी हजारों परिवार सामाजिक प्रताडऩा झेल रहे हैं। डॉ. दिनेश मिश्र कहते हैं कि जशपुर के पंडरी पानी, फरसाबहार ग्राम से सामाजिक बहिष्कार का एक मामला सामने आया था। जिसमें प्रवीण बंजारा ने जानकारी दी थी कि गांव के कुछ लोगों जिसमें सामाजिक पदाधिकारी शामिल हैं, ने सामाजिक बैठक बुलाकर उसका सार्वजनिक अपमान किया। बैठक में ही उसका सामाजिक बहिष्कार कर हुक्का-पानी बंद करने की भी घोषणा कर दी। बैठक में उसके परिजनों से पांच हजार रुपए जुर्माना भी लिया गया। प्रवीण बंजारा ने कुछ समय पहले समाज से बाहर प्रेम-विवाह किया था, जिसके लिए उक्त युवक को दोषी मानकर सामाजिक पंचायत ने उक्त परिवार को बहिष्कार की सजा दी। इसी प्रकार कुछ समय पूर्व राजिम के एक साहू परिवार ने समिति से अपने परिवार का बहिष्कार समाप्त कराने के लिए मदद मांगी थी। जिस पर उक्त परिवार के ग्राम जाकर समाज के पदाधिकारियों से चर्चा की, उन्हें समझाया गया जिससे उक्त परिवार का बहिष्कार वापस हुआ। डॉ. मिश्र का मानना है कि समिति अपने प्रयास से जो थोड़ा बहुत कर सकती है कर रही है, किन्तु जब तक इस मामले में स्थानीय प्रशासन-शासन त्वरित कार्यवाही नहीं करेगी और सरकार सामाजिक बहिष्कार के खिलाफ सक्षम कानून नहीं बनायेगी तब तक छत्तीसगढ़ के हजारों बहिष्कृत परिवारों को न्याय नहीं मिल सकेगा। कानून बनने के बाद ही उनका सामाजिक सम्मान बरकरार हो पाएगा।

राष्ट्रीय महिला आयोग की जांच रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के प्रति अपराध के मामलों को जिस गंभीरता और सावधानी के साथ निपटाया जाना चाहिए वे अपेक्षित स्तर के नहीं हैं। आयोग ने पाया कि जघन्य अपराधों में प्राथमिकी दर्ज करना अभी भी समस्या है। देश में लव मैरिज करना कई जगहों पर आज भी चुनौती वाला काम है। समाज और परंपराओं के नाम पर देश के कई हिस्सों में आज भी इसे स्वीकार नहीं किया जाता है। मई 2018 में छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में देखने को मिला, जहां अंतरजातीय प्रेम विवाह करने पर एक जोड़े को समाज से बहिष्कार करने का फैसला सुनाया गया। साहू समाज के पदाधिकारियों ने लव मैरिज करने वाले जोड़े पर एक लाख 11 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। सिरगिट्टी थाना क्षेत्र के बसिया गांव के इस मामले को संज्ञान में लेते हुए पुलिस ने साहू समाज के पदाधिकारियों पर मामला दर्ज किया है।

अक्टूबर 2019 में रायगढ़ में प्रेम विवाह करने पर समाज से निकाला गया था। पंचायत का तुगलकी फरमान देखने को मिला है। यहां प्रेम विवाह करने पर तीन परिवार के लोगों को पंचायत ने सामाजिक बहिष्कार का आदेश दे दिया। पुलिस ने इस मामले में सात लोगों के खिलाफ  केस दर्ज किया है। क्षेत्र के कपिस्दा गांव में एक ही परिवार के दो युवक संजय लहरे और सोहन लहरे ने गांव की दो लड़कियों से प्रेम विवाह किया था। इसके अलावा एक अन्य युवक गौतम जाटवर ने भाठागांव निवासी एक लड़की से प्रेम विवाह किया था। गांव के पंचायत ने इसे सामाजिक परंपराओं के विरुद्ध बताया और सामाजिक बैठक बुलाई। बैठक में सामाजिक पंचायत को दो-दो लाख रुपये जुर्माना देने की शर्त पर युगलों को समाज में मिलाने का निर्णय किया गया। जब युगलों ने इस निर्णय को नहीं माना तब गांव में सर्व समाज की बैठक की गई। बैठक में युगलों को समाज में शामिल करने के लिए उनसे तीन-तीन लाख रुपये लेने की व्यवस्था दी गई। फरवरी 2020 में अपनी पसंद का जीवन साथी चुनना या प्रेम विवाह करना कुछ युवाओं और उनके परिजनों के लिए मानसिक प्रताडऩा का कारण बन गया है। इस बारे में दुर्ग कलेक्टर को अंतरजातीय विवाह करने वाले 25 लोगों ने ज्ञापन सौंपकर सुरक्षा देने या आत्मदाह की अनुमति देने की मांग की है। शिकायतकर्ता गुलाब नामक युवक ने मीडिया को बताया कि कुर्मी समाज से होने और अंर्तजातीय विवाह करने की वजह से उन्हें और उनके जैसे कई युवा या उनके घर वालों को परेशान किया जाता है। इच्छा मृत्यु मांगने वालों में चिंगरी गांव में रहने वाले कुर्मी जाति का गुलाब है। 2016 में एक विजातीय लड़की से शादी करने के बाद अपना गांव छोड़कर अब रिसाली भिलाई में रहना पड़ रहा है। उसके अंतराज्यीय शादी के कारण गुलाब के पिता को अर्थदंड देने पड़ा साथ ही पूरे गांव को भोज कराने का दंड भी भोगना पड़ा। इतना सब होने के बाद भी गुलाब के भाई की शादी के कार्ड में उनका नाम नहीं छपवाया गया। समाज के लोगों ने इसे लेकर भी शर्त रख दी थी। इतना ही नहीं गुलाब को किसी की मौत होने पर कंधा देने तक पर मनाही होती है। इसके ठीक उलट, छत्तीसगढ़ सरकार ने अंतरजातीय विवाह को प्रोत्साहित करने 50 हजार रुपये तथा अम्बेडकर फाउंडेशन द्वारा 2.50 दो लाख पचास हजार रुपये प्रोत्साहन के रूप में दिया जाता है।

2018 की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट के चीफ  जस्टिस दीपक मिश्रा ने कहा कि था कि कोई भी वयस्क स्त्री-पुरुष अपनी मजऱ्ी से शादी कर सकते हैं। कोई खाप पंचायत या सामाजिक संस्था इसके आड़े नहीं आ सकती, लेकिन लगता है कि ऐसे लोगों को कानून का कोई डर नहीं है। फैसला सुनाते हुए चीफ  जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने सुनवाई के दौरान खाप पंचायतों के फरमान और लव मैरिज करने वाले जोड़ों पर होने वाले हमलों को न रोक पाने के मुद्दे पर केंद्र सरकार को भी जमकर फटकार लगाई थी। इसी बीच इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 11 नवंबर 2020 को दिए आदेश में कहा है कि अपनी पसंद के शख्स के साथ रहने का अधिकार चाहे उनका मज़हब कुछ भी हो जीवन और निजी आज़ादी के अधिकार का स्वाभाविक तत्व है। इस बीच कुछ राज्यों ने लव जिहाद के नाम पर धर्म परिवर्तन कानून को लाकर कड़ी सजा का प्रावधान किया। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकार द्वारा लव जिहाद से जुड़े कानूनों को पास किए जाने के खिलाफ  सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी गई थी। अब इस याचिका में हिमाचल प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकार द्वारा लिए फैसलों को भी शामिल कर लिया गया है। सर्वोच्च अदालत में जब इसकी सुनवाई होगी तो चारों राज्यों की सरकारों को इसमें पार्टी माना जाएगा।

हम चाहे भू्रण हत्या, दहेज प्रताडऩा, स्त्री धन, महिलाओं पर होने वाले अत्याचार, बाल श्रम अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन को लेकर कितने ही कानून क्यों न बना लें जब तक समाज का नजरिया इन्हें लेकर सकारात्मक नहीं होगा, ये कानून केवल किताबों या कुछ लोगों को सजा देने तक सीमित होकर रह जाएंगे। यदि हम अपने आसपास एक बेहतर समाज बनाना चाहते हैं तो हमें उन मूल्यों को अपनाना होगा जो एक प्रगतिशील उन्नत समाज के लिए जरुरी है। सामाजिक पंचायतें जब गांव में तीज त्यौहार, उत्सव या धार्मिक आयोजनों के लिए एकजुट हो सकती है। अपने जातिगत हितों के लिए एक हो सकती है, तो फिर कानून संगत समाज और उससे जुड़े मूल्यों के लिए क्यों एकजुट नहीं हो सकती। प्रेम और विजातीय विवाह की सजा या दंड स्वरुप पैसे लेकर, भोज करा कर, बहिष्कार का दंड देने से क्या नया समाज, नया भारत बन पायेगा?

धान का कटोरा छत्तीसगढ़ तो उस पूरे गंज में पक रहे भात का एक दाना मात्र है, यदि हम सारा भात निकालकर देखेंगे तो परत-दर-परत हमें ऐसी बहुत सी घटनाएं दिखलाई देंगी।