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छत्तीसगढ़ एक खोज- नवमी कड़ी: महान जीनियस हरिनाथ डे

छत्तीसगढ़ एक खोज- नवमी कड़ी: महान जीनियस हरिनाथ डे

- रमेश अनुपम

एफ.ए.की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात हरिनाथ डे ने कोलकाता के प्रसिद्ध कॉलेज प्रेसीडेंसी में बी.ए. की कक्षा में प्रवेश लिया।

सन 1896 में हरिनाथ डे ने लेटिन तथा अंग्रेजी ऑनर्स के साथ बी. ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में  उत्तीर्ण की। 

सन 1896 में ही उन्होंने प्राइवेट छात्र के रूप में कोलकाता विश्वविद्यालय से एम. ए.लैटिन की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की।

The Calcutta University Magazine ने प्रकाशित किया  : 

" We congratulate mr Harinath De of our college who , having passed his B.A. Examination in Latin and has stood First class, having secured as much as 77 percent of the maximum marks ”

सन 1897 के अप्रैल माह में हरिनाथ डे ने इंग्लैंड के प्रख्यात कॉलेज कैम्ब्रिज क्राइस्ट कॉलेज में दाखिला लिया। कैंब्रिज कॉलेज में पढ़ते-पढ़ते हरिनाथ डे ने कोलकाता विश्वविद्यालय से ग्रीक भाषा में भी एम.ए. की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली। उन्हें कोलकाता विश्वविद्यालय द्वारा स्वर्ण पदक से सम्मानित किया गया।


सन 1898 में भारत सरकार द्वारा उन्हें प्रति वर्ष 200 पौंड की  स्कॉलरशिप प्रदान की गई । कैंब्रिज में पढ़ते हुए हरिनाथ डे ने क्लासिकल ट्राईपास की परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण कर ली थी। हरिनाथ डे से पूर्व केवल एक भारतीय विद्यार्थी ने यह परीक्षा उत्तीर्ण की थी और वह भारतीय कोई और नहीं अरबिंदो घोष थे, जिन्होंने सन 1892 में यह परीक्षा उत्तीर्ण की थी जो कालांतर में श्री अरबिंदो के नाम से चर्चित हुए।

सन 1900 में हरिनाथ डे ने उस समय की सर्वाधिक प्रतिष्ठापूर्ण I.C.S.  की परीक्षा भी अच्छे नंबरों से पास कर ली, पर उन्होंने I.C. S .की सेवा में जाना स्वीकार नहीं किया।

सन 1901 में उन्होंने Medieval and Morden Languages Tripose की  परीक्षा भी कैंब्रिज से उत्तीर्ण कर ली। उसी वर्ष उन्हें अंग्रेजी के सुप्रसिद्ध नाटककार शेक्सपियर तथा फ्रांसीसी अंग्रेजी साहित्यकार जेफ्री चौसर पर  किए गए काम के लिए स्किट एवार्ड से सम्मानित किया गया।

कैंब्रिज में अध्ययन के दरम्यान ही उन्होंने फ्रांस और जर्मनी की यात्रा की। इन्हीं वैश्विक यात्राओं के मध्य वे अरबिक भाषा के विषय में शोध के लिए इजिप्ट भी गए।

सन 1901 में वे इंडियन एजुकेशनल सर्विस ( I.E.S. ) में चयनित होकर भारत लौटे। 7 दिसंबर को उन्होंने सुप्रसिद्ध ढाका कॉलेज में अंग्रेजी भाषा और साहित्य के प्राध्यापक के रूप में पदभार ग्रहण किया। 


वे पहले भारतीय आई. ई. एस. थे, उनसे पूर्व किसी भी भारतीय को यह गौरव प्राप्त नहीं हुआ था।

क्राइस्ट कॉलेज पत्रिका में उन्हीं दिनों प्रकाशित हुआ ” Harinath De ,B.A. has been appointed to a post in the Imperial branch of the Educational Service of India . Mr. De is the first native of India to obtian a post in this service, as he was the first to be placed in the First class in the Classical Tripos ".

सन 1904 में लॉर्ड कर्जन ढाका गए। वहां उन्होंने हरिनाथ डे से मिलने की अपनी इच्छा प्रकट की। लॉर्ड कर्जन भले ही अन्य मामलों में भारत में कुख्यात रहें हों, पर शिक्षा के प्रति उनमें गहरा रुझान था। वे विद्वानों का आदर करते थे, इसलिए स्वाभाविक था वे ढाका में हरिनाथ डे से मिलने की अपनी इच्छा को दबा नहीं पाए थे।


सन 1905 में हरिनाथ डे का ट्रांसफर ढाका से प्रेसीडेंसी कॉलेज कोलकाता हो गया। संस्कृत, अरबिक तथा ओड़िया भाषा में उत्कृष्टता के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा पांच हजार रुपए की पुरुस्कार राशि से सम्मानित किया गया। 

सन 1907 में हरिनाथ डे कोलकाता के प्रसिद्ध इंपीरियल लाइब्रेरी ( वर्तमान में नेशनल लाइब्रेरी ) के लाइब्रेरियन नियुक्त किए गए। इस महत्वपूर्ण जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए भी हरिनाथ डे ने अपना पढ़ना-लिखना और विविध भाषाओं के प्रति अपने अनुराग को कभी समाप्त नहीं होने दिया। अपने भीतर के ज्ञान की लौ को कभी बुझने नहीं दिया। 

सन 1908 में उन्होंने संस्कृत भाषा में प्रथम श्रेणी से एम. ए. की परीक्षा पास की, उन्हें पुरस्कार स्वरूप दो गोल्ड मेडल प्रदान किए गए। सन 1909 में उन्होंने  कोलकाता विश्वविद्यालय में अपनी पी-एच. डी. की थिसिस जमा की।कोलकाता विश्वविद्यालय द्वारा उन्हें अंग्रेजी, ग्रीक, लैटिन, फ्रेंच, जर्मन, आर्मेनियन, संस्कृत, अरबिक, पर्शियन ,उर्दू भाषाओं का परीक्षक नियुक्त किया गया।

दुनिया की छत्तीस भाषाओं में एक साथ अपनी किरण बिखेरने वाला यह सूर्य 30 अगस्त सन 1911 को सदा-सदा के लिए बादलों में कहीं छिप गया।

छत्तीसगढ़ और रायपुर का इतिहास जब भी लिखा जायेगा वह महान जीनियस हरिनाथ डे के बिना कभी पूरा नहीं होगा। आज भले ही छत्तीसगढ़ ने उसे भूला दिया हो पर आने वाले दिनों में छत्तीसगढ़ न केवल अपने इस सपूत को याद करेगा, अपितु गर्व के साथ सिर ऊंचा उठाकर कह भी सकेगा कि हरिनाथ डे छत्तीसगढ़ के सचमुच हीरा थे और हमेशा रहेंगे।

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हिन्दी की अनेक सुप्रसिद्ध पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर कविताएँ, लेख, साक्षात्कार तथा समीक्षाएँ प्रकाशित।

'समकालीन हिन्दी कविता’ तथा छत्तीसगढ़ की छह सौ वर्षों की दुर्लभ काव्य-यात्रा पर केन्द्रित ग्रन्थ 'जल भीतर एक वृच्छा उपजै’ का सम्पादन।

एक काव्य-संग्रह 'लौटता हूँ मैं तुम्हारे पास’ प्रकाशित। रायपुर स्थित शासकीय दू्.ब. महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय के हिन्दी विभाग के सेवानिवृत्त अध्यापक।