breaking news New

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -अब के ना सावन बरसे

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -अब के ना सावन बरसे

- सुभाष मिश्र

कोरोना महामारी के चलते पिछले दो सावन यूं ही बीत गए। मौसम का मिजाज तो जलवायु परिवर्तन ने बदल ही दिया था और फिर कोरोना ने सावन की मन की उमंगों को अवसाद के पानी से बुझा दिया। सावन के पहले सोमवार को भगवान शंकर के मंदिर में गूंजती घंटियों की गूंज और आरती की आवाज़ धीमी हो रही है। कोरोना का प्रकोप कुछ ऐसा है कि इसने किसी भी वर्ग को नहीं बक्शा। अमीर, गरीब, ग्रामीण, शहरी, नेता, अभिनेता मतदाता सब एक लाइन में लगे रहे। कोरोना ने प्रजातांत्रिक समानता से सभी पर एक समान कृपा बरसाई। सब की एक ही ख्वाहिश है कि प्रभु दो डोज लगवा दो और कोरोना से बचाकर रखो। कोरोना की इस कृपा से मंदिरों के पंडित, मौलवी, पादरी कोई  भी अछूता नहीं रहा है। नवजात के जन्म की पूजा से लेकर अंतिम संस्कार तक की पूजा को कोरोना ने प्रभावित किया। अबके बरस सावन में आग नहीं लगी बल्कि अव्यवस्था के कारण आग दिल में सुलगी है और पेट्रोल -डीजल के दाम इस आग में घी का काम कर रहे हैं।

पहले सावन आता था तो गांव देहात की ललनाएं पेड़ों पर झूले डालकर खुद झूलती थीं और सखियों को झुलाती थीं लेकिन अब पेड़ों की बेरहमी से हुई कटाई के बाद सावन के झूलों की भी विदाई हो गई। कुछ झूले तो घर की छतों पर, गार्डन में अखबार पढऩे और चाय की चुस्कियां लेने के काम आ रही है। सरकार के पास लोकलुभावन, आश्वासन रूपी कई झूले हैं जिन पर वो हमको, आपको झुलाती रहती हैं। ये झूले गोदी मीडिया के जरिये तेजी से झुलकर जनता को चक्कर तक में डाल देते हैं।

सरकार के पास झूले भी हैं और सावन के अंधे भी उन्हें झोल खाती, झूला झूलती योजनाएं नजऱ नहीं आती। देश में खुशहाली का विरह गीत गाती बेरोजग़ारी, महंगाई इन्हे दिखाई नहीं देती। सावन बहुत रोमानी होता है। घटा सावन की मन भावन की होती है। जब सावन की झड़ी लगती थी तो सारा जंगल झूमने लगता था। अब जंगल चूंकि शहर के कांक्रीट लील चुके हैं तो वहां से सावन की विदाई हो चुकी है और वो फेसबुक और व्हाट्सएप के संदेशों में सिमट गया है। सावन गाने वाली सखियों के हाथों में स्मार्टफ़ोन आ गया है, वहीं अब प्रियतम है...प्रेयसी है। प्रियतम और प्रेयसी यू ट्यूब सब्सक्राइबर है सावन के दीदार यू ट्यूब पर ही कर लेते हैं। जो चातक पी..पी की रट लगाता था उसकी ज़बान आधुनिक नारी को बेशक समझ न आए मगर आपकी शराब आपके द्वार वाली तर्ज पर घर-घर शराब पहुंचाने के लिए चातक ब्रांड एंबेसेडर मौजूद हैं। पीयूवाला प्रीतम, दारूवाला पी बन चुका है और अंग्रेजी के पी अक्षर के बाद के अक्षर क्यू में गहरी आस्था रखते हुए वाइन शॉप की क्यू में ज्यादा नजऱ आता है। यही वजह है कि पट खुलते ही मंदिरों से ज्यादा भी मदिरालयों में नजर आती है।

प्रदूषण सावन प्रवास को कभी लंबा तो कभी छोटा कर देता है। कभी जल्दी आता है तो कभी देर से। सावन भी मौसम का सरकारी कर्मचारी है। उसको बरसना, काम का बोझ लगता है। वैसे भी ये दौर वर्चुअल रियल्टी का है। पीछे हरा पर्दा तान दो यानी क्रोमा लगा दो तो जब चाहे तब सावन की हरियाली, जंगल स्टूडियो में हाजिऱ कर दो। सरकार भी जैसे क्रोमा इस्तेमाल कर रही है।तरक्की होती नहीं मगर दिखती वैसी ही है जैसी सरकार चाहती है। इस वर्चुअल वल्र्ड को आभासीदुनिया कहते हैं जहां हर चीज आभासी है यानी प्रगति है नहीं पर आभासी है। फिल्मों में भी सावनआभासी होता है। प्रोडक्शन कंट्रोलर उसे तकनीशियनों के ज़रिए वाटर पाइपों से हाजिऱ करवा देता है। पाइपों में फंसा सावन डायरेक्टर के इशारे पर बाहर निकलता है और हीरो-हीरोइन उसमें भीगते हुए सावन का गाना गाते हैं। कोरोना की मार सावन पर भी पड़ी है। वो भी लॉक डाउन कीमार झेल रहा था। लॉकडाउन खुला तो शहर के बेलगाम ट्रैफिक की तरह वह भी बरसने लगा। बारिश हमेशा भारतीय सिनेमा की परम कामोद्दीपक रही है। राजकपूर की सत्यम शिवम सुंदरम से डेविड धवन की फिल्मों में सुडौल स्त्री देह दिखाने में बारिश का उपयोग भरपूर हुआ है । हमारे सिनेमाई गाने के लिए, बिल्ड-अप बनाने के लिए या कहानी के एक अभिन्न अंग के रूप में भी बारिश और सावन की अहम भूमिका रही है। इस चलन की शुरुआत बरसात के प्रेम गीतों से हुई जो बिना अप्रिय या अश्लील लगे फिल्मों में कुछ ओम्फ जोड़ते हैं। यह रोमांटिक, शरारती और कामुक था। बॉलीवुड में जब बारिश होती है तो साडिय़ां एकदम साफ हो जाती है और बारिश में फंसने वाले प्रेमी छतरी के नीचे शरण ले लेते हैं। सबसे यादगार दृश्य और गीत जो बारिश का उपयोग करते हैं इक लड़की भीगी-भागी सी गाने में मधुबाला और किशोर कुमार नजर आते हैं।   

राज कपूर और नरगिस के प्रतिष्ठित प्यार हुआ इकरार हुआ बारिश गीत, फिल्म श्री 420 (1955) से -जहां प्यार में फंसे जोड़े एक-दूसरे से एक छतरी के नीचे नजर नहीं हटा सकते हैं। किशोर का हिट गाना रिमझिम गिरे सावन, जो मरीन ड्राइव के पास फिल्माया गया है, 80 के दशक की शुरुआत में बॉम्बे को दर्शाता है। पृष्ठभूमि पुरानी विक्टोरियन इमारतों, खुली जगहों, सड़कों की है जहां आप सांस ले सकते हैं और बारिश में भीग सकते हैं।  

मानसून की बारिश, जो हर गर्मियों में भारत को पछाड़ती है, आज देश की वार्षिक वर्षा का 80 प्रतिशत हिस्सा अपनी सीमाओं से बहुत दूर है। अर्थ-साइंस रिव्यूज जर्नल में प्रकाशित एक पेपर में पाया गया कि मध्य पूर्व में रेगिस्तान से वायुमंडल में बहने वाले धूल के कण सूरज की रोशनी में इतने गर्म हो जाते हैं कि वे अरब सागर पर हवा के दबाव को बदल देते हैं। यह आकाश में एकप्रकार का हीट पंप बनाता है, जो समुद्र के ऊपर से नमी को भारतीय उपमहाद्वीप में ले जाता है, जिससे एक गीला मानसून का मौसम होता है जो हवाओं को मजबूत करता है और भी धूल के कणों को कोड़ा मार सकता है। अर्थ सिस्टम्स डायनेमिक्स नामक पत्रिका में प्रकाशित दूसरे अध्ययन में पाया गया कि मानव निर्मित जलवायु परिवर्तन भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून कोगीला और अधिक अनिश्चित बना रहा है।  

औद्योगिक क्रांति के बाद से पृथ्वी पहले ही 1 डिग्री सेल्सियस (3.6 डिग्री फैरेनहाइट) से अधिक गर्म हो चुकी है। अंग्रेजी शब्द मानसून अरबी शब्द मौसिम से आया है, जिसका अर्थ मौसम होता है। यह प्रचलित हवा की दिशा में दो बार वार्षिक बदलाव को संदर्भित करता है जो गर्मियों में गर्म बारिश लाती है और सर्दियों में ठंडी, शुष्क हवा समुद्र में भेजती है। हजारों सालों से किसानों ने चावल और गेहूं जैसे मुख्य खाद्य पदार्थों के रोपण और कटाई का समय मानसून के अनुकूल किया है जो स्वाभाविक रूप से साल-दर-साल बदलता रहता है लेकिन जैसे-जैसे ग्रीनहाउस गैसें वातावरण को अवरुद्ध करती हैं, सूर्य के प्रकाश में फंस जाती है और ग्रह गर्म हो जाता है, वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि मानसून तेजी से अराजक हो जाएगा।

कोरोना की तीसरी लहर की आशंका के कारण देशभर में लोगों से सतर्क रहने की अपील के साथ बिहार सरकार ने सावन के महीने को लेकर बड़ा फैसला लिया है।  जिसमें अगस्त महीने तक किसी भी तरह के धार्मिक कार्यक्रम और उसके आयोजन पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है। लोगों की सुरक्षा और कोरोना संक्रमण की तीसरी लहर की आशंका को देखते हुए इस बार श्रावणी मेला का आयोजन नहीं होगा। लोगों से अपने घरों में ही पूजा-अर्चना करने की अपील की गई है।    

बिहार के बाबा धाम के रूप में विख्यात अशोक धाम मंदिर में श्रावणी मेला में यहां लाखों की संख्या में श्रद्धालु जलार्पण करने आते हैं। एक महीने तक अशोक धाम शिवमय बना रहता है। इसमेले से मंदिर की भी आमदनी बढ़ जाती है। गत वर्ष कोरोना के कारण मेले का आयोजन नहीं हुआ था। इस साल भी सरकार और जिला प्रशासन की पाबंदी जारी है।

यूं तो सावन बरसेगा किन्तु पहले जैसा शायद ही खुलकर ना बरसे। लॉकडाउन के चलते पति या प्रेमी की नौकरी जाने से उपजे हालात को देखते हुए शायद ही कोई प्रेमिका अब यह गाने का साहस कर पायेगी।

अरे हाय हाय हाय मजबूरी
ये मौसम और ये दूरी
मुझे पल पल है तड़पाये
तेरी दो टकियाँ दी नौकरी वे मेरा लाखों का सावन जाये।।