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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः प्रजातंत्र का बीमा

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः प्रजातंत्र का बीमा



अगर नहीं रहा प्रजातंत्र

चौरासी लाख योनियों का

किस के भरोसे जियेगी जनता

कहाँ करेगी दावा

प्रजातंत्र के मर जाने का?


क्या दुनिया के किसी बैंक में

प्रजातंत्र का बीमा है?

बीत गयीं हैं कितनी सदियाँ

हर शासन की सीमा है

नश्वर जन-जीवन में

अमर है प्रजातंत्र


विधि का है ऐसा विधान

सबके मन में यही प्रश्न

शासन से कैसे छूटे जान

जीवन छेड़े युगानुरूप

प्रजातंत्र की नयी तान


अपनी विफलताओं से

सीखता जीवन बार-बार

स्वराज्य रचने को व्याकुल

जैसे जल सिमट-सिमट कर

भरता रहता ताल

मुरझाते फिर-फिर खिल उठते

जीवन की माल

गूँथी जाती है बार-बार