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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - धान की खेती भविष्य में क्या रंग लाएगी

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  - धान की खेती भविष्य में क्या रंग लाएगी

- सुभाष मिश्र
छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। सरकार की लाख कोशिशें, फसल चक्र परिवर्तन की समझाईश के बावजूद यहॉ प्रमुखता से धान की खेती  होती है। इस साल छत्तीसगढ़ ने धान खरीदी का इतिहास रच दिया। पिछले बीस सालो में कभी भी इतनी धान नहीं खरीदी गई जितनी इस बार छत्तीसगढ़ सरकार ने 95 प्रतिशत पंजीकृत किसानो से 92 लाख मेट्रिक टन धान की खरीदी की। सरकार का कहना है की समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की बेहतर व्यवस्था के कारण यह संभव हुआ। इस धान खरीदी पर 2500 करोड़ का व्यय संभावित है। धान उत्पादन और धान खरीदी का एक दूसरा पक्ष भी है, जो भविष्य को लेकर चौकाता है। राज्य सरकार को केन्द्र से उसके हिस्से की राशि नहीं मिल रही है, यहीं केन्द्र सरकार ने 60 लाख टन चावल लेने की सहमति देकर केवल 45 लाख टन ही जमा करने की अनुमति दी है। हमारे यहॉ 12 लाख मेट्रिक टन के आसपास भंडारण व्यवस्था है और भारतीय खाद्य निगम एफसीआई अभी धान नहीं ले रहा है। पिछले साल 2019-20 में खरीदी गई धान का निराकरण होना शेष है। उठाव में पिछले साल की बचत के चलते करोड़ो का धान सड़ रहा है।

धान की नीलामी का बेस रेट 2050 है, लेकिन भाव आज कई जिलों में 1100 से 1200 के आसपास ही अधिकतम बोली लग रही है। आखिर क्या होगा हज़ारों करोड़ के संभावित नुकसान की जवाबदेही का निर्धारण कैसे होगा। क्या अत्यधिक धान आधारित खेती और शासकीय प्रश्रय ने ही स्थिति बिगाड़ दी। क्या नए कृषि कानून के तहत मंडी भी खरीदे, मिलर या खुले मार्केट में व्यापारी भी एमएसपी से ऊपर खरीदे। किसान जिसे चाहे उसे बेचे इस विकल्प को अगले वर्षों में सोचा जा सकता है। यहां सवाल यह भी है कि क्या इस स्थिति का अधिकारियों को पूर्वानुमान नहीं था? क्यों वैकल्पिक उपाय नहीं किये गए?

केंद्र सरकार कहती है यदि आप एमएसपी से ऊपर खरीदी करते हैं तो हम सेंट्रल पुल के तहत धान नहीं लेंगे। क्या इसके आकलन में चूक हो गयी। यदि अब नीलामी में भी रेट खरीदी के आधे भाव से कम रेट आ रहे तो क्या विकल्प होंगें? यदि व्यापारियों को ही देना था तो यह निर्णय पहले क्यो नहीं कर लिया गया। यदि ऐसा किया जाता तो धान खरीदी, भंडारण, बारदाना, व्यय भी कम होता। यक्ष प्रश्न कठिन है इसका उत्तर और सम्यक समाधान निकलना चाहिए।

इस साल 92 लाख मीट्रिक टन से अधिक धान की खरीदी की गई है। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद से अब तक हुई धान खरीदी का ये सबसे अधिक आंकड़ा है। इस साल पंजीकृत 21 लाख 52 हजार 475 किसानों में से 20 लाख 53 हजार 483 किसानों ने अपना धान बेचा है। छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल की सरकार ने रिकॉर्ड धान खरीदी कर इतिहास रच दिया है। वह भी ऐसे समय जब केंद्र की ओर से बहुत सारी रुकावटें सामने आई। छत्तीसगढ़ सरकार ने अपने दम पर अब तक सबसे अधिक खरीदी की है। खरीदी की शुरुआत के साथ ही जहाँ बारदाने को लेकर संकट गहरा गया था, वहीं बीच में केंद्र ने केंद्रीय पूल का चावल लेने इंकार कर दिया था। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार खरीदी को जारी रख किसानों को राहत पहुँचाने की एक बड़ी चुनौती स्वीकारी। भूपेश सरकार बार-बार अपने निर्णयों से गांव, गरीब और किसान हितैषी के रूप में सामने आई हैं।

सीएम भूपेश बघेल कहते है कि किसानों के साथ हम अन्याय नहीं होने देंगे, किसी भी वजह से खरीदी बंद नहीं होगी। किसानों से तय समय पर पूरी खरीदी होगी। इस तरह से छत्तीसगढ़ में आज धान खरीदी का एक ऐसा रिकार्ड बना, जो 20 सालों में कभी नहीं बना। सरकार ने 95 प्रतशित से पंजीकृत किसानों से रिकार्ड 92 लाख मीट्रिक धान की खरीदी की। सरकार की ओर जारी आँकड़ों के मुताबिक समर्थन मूल्य पर धान खरीदी की बेहतर व्यवस्था के कारण खरीफ  विपणन वर्ष 2020-21 में कुल पंजीकृत किसानों में से रिकार्ड 95.38 प्रतिशत किसानों ने धान बेचा है। धान बेचने वाले किसानों की संख्या इस साल सबसे अधिक रही है। इस वर्ष पंजीकृत 21 लाख 52 हजार 475 किसानों में से 20 लाख 53 हजार 483 किसानों ने अपना धान बेचा है।
राज्य सरकार का दावा है कि छत्तीसढ़ में बीते दो सालों में खेती-किसानी के रकबे और किसानों की संख्या में उल्लेखनीय बढ़ोत्तरी हुई है। राज्य सरकार की किसान हितैषी नीतियों के चलते धान की खेती के पंजीयन का रकबा 27 लाख हेक्टेयर से अधिक और पंजीकृत किसानों की संख्या 21 लाख 52 हजार तक जा पहुंची है। कृषि प्रधान छत्तीसगढ़ राज्य में समृद्ध हो रही खेती-किसानी के लिए यह एक सुखद भविष्य का संकेत है। राज्य में खेती-किसानी को एक सम्बल मिला। कृषि छोड़ चुके लोग फिर कृषि की ओर लौटे हैं। राजीव गांधी किसान न्याय योजना के अंतर्गत प्रति एकड़ 10 हजार रूपए की कृषि आदान सहायता राशि मिलने से किसानों का उत्साह बढ़कर दोगुना हो गया। इस योजना के तहत राज्य के किसानों को 5750 करोड़ रूपए की सीधी मदद दी जा रही है। तीन किश्तों में राशि किसानों के खातों में अंतरित भी कर दी गई है और चौथी भी किश्त की राशि मार्च तक अंतरित की जाएगी।

छत्तीसगढ़ सरकार का यह भी आरोप था कि धान खरीदी के दौरान केंद्र सरकार की ओर से धान के बोरे कम आए हैं और एफसीआई से चावल लेने की अनुमति भी अब तक नहीं मिली है जिसके चलते धान खरीदी की प्रक्रिया रुकी हुई है और किसानों की उपज के खराब होने का डर बना रहा। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखा और इसके बाद उन्होंने खुद पीएम मोदी से धान खरीदी को लेकर बातचीत भी की है। उन्होंने पत्र में लिखा कि खरीफ  वर्ष 2020-21 में केंद्र सरकार द्वारा विकेंद्रीकृत उपार्जन योजना में छत्तीसगढ़ राज्य को 60 लाख मेट्रिक टन चावल उपार्जन हेतु सैद्वान्तिक सहमति दी गई। इसके उपरान्त राज्य सरकार ने 1 दिसंबर 2020 से समर्थन मूल्य पर धान खरीदी प्रारंभ की और अब तक 12 लाख किसानों से लगभग 47 लाख टन धान का उपार्जन हो चुका है। पत्र में कहा गया कि समर्थन मूल्य पर खरीदे गए धान को मिलिंग उपरान्त केंद्रीय पूल में भारतीय खाद्य निगम को परिदान किए जाने हेतु आवश्यक अनुमति खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण विभाग, भारत सरकार से अभी तक अप्राप्त है। धान खरीदी कार्य पूर्ण करने हेतु बारदाने की व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है। कृपया इसका संज्ञान लेना चाहेंगे। राज्य सरकार द्वारा जूट कमिश्नर, भारत सरकार के माध्यम से 3 लाख गठान बारदानों की आपूर्ति की मांग की थी जिसके विरूद्व राज्य को मात्र 1.45 लाख गठान बारदाने आबंटित हुए जिसमें से केवल 1.05 लाख गठान बारदाने ही प्राप्त हुए हैं।

धान खरीदी प्रभावित होने से राज्य के पंजीकृत 21.52 लाख किसानों की आजीविका पर विपरीत प्रभाव पडऩा निश्चित है। पत्र लिखने के बाद मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बातचीत भी की थी। भूपेश बघेल ने बाकायदा ट्वीट कर इसकी जानकारी दी और लिखा 'प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से फोन पर बात हुई। मैंने उनसे अनुरोध किया है कि एफसीआई के चावल न लेने से छत्तीसगढ़ में भंडारण की समस्या हो जाएगी और किसानों के धान की खरीदी प्रभावित होगी। उन्होंने आवश्यक हस्तक्षेप करने का आश्वासन दिया है।

20 लाख टन राज्य के पीडीएस में रहेगा। बाकी 24 लाख टन केंद्रीय पूल में जमा होगा। इसके बाद राज्य सरकार के पास करीब 16 लाख टन चावल यानी लगभग करीब 24 लाख टन धान बच जाएगा। इससे न केवल राज्य सरकार पर आर्थिक के साथ ही अतिरिक्त धान का भी बोझ बढ़ेगा। परिवहन पर होने वाला खर्च केंद्र सरकार वहन करती है। केंद्र के इस रुख से राज्य सरकार पर 11 हजार करोड़ का आर्थिक बोझ बढ़ जाएगा। इसमें करीब 5600 करोड़ राजीव गांधी न्याय योजना के तहत दी जाने वाली राशि के साथ ही 24 लाख टन धान की खरीदी पर होने वाला करीब 4400 करोड़ का खर्च शामिल है।