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कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः शुक्रिया बुलाने का

कोरोना श्रृंखला में सुप्रसिद्ध कवि ध्रुव शुक्ल की कविताः शुक्रिया बुलाने का

वाह क्या खूब हुआ इंतज़ाम जाने का

आपने याद किया शुक्रिया बुलाने का


रहें ख़ुदा की तरह तो यहाँ बरसें पत्थर

आपने नाम तक पूछा नहीं दीवाने का


फ़रेब क्या है यहाँ क्या मिसाल दे कोई

आपने काम दिया नाज़-ओ-ग़म उठाने का


आने-जाने के लिए क्या कोई कुछ करता है

आपने ज़िक्र किया फिर किसी बहाने का


ध्रुव किसी काम न आया चला गया यूँ ही

आपने ख़याल रखा क्यों किसी बेगाने का


कहीं पहाड़ के पीछे तो कहीं पानी में

कहीं दिन डूबता आकाश की पेशानी में


गाँव से दूर तलहटी में शाम घिरती है

जैसे दिन डूब रहा हो किसी वीरानी में


आज फिर जा रही ये रौशनी थामें कैसे

कोई परछाँई भी बचती नहीं निशानी में


तुम कहाँ मुझमें छिपो और मैं कहाँ तुममें

दिन गया रात हुई है इसी हैरानी में


हरेक शाम ही ध्रुव इस तरह से ढलती है

जैसे अब रौशनी रह जाएगी कहानी में


पेटिंग-ऋतु साहू