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कांकेर पत्रकार विवाद : 15 दिनों से चल रहा आंदोलन खत्म, राज्यपाल सुश्री अनुसूइया उइके को ज्ञापन सौंपने के बाद जूस पिलाकर तुड़वाया गया अनशन

कांकेर पत्रकार विवाद : 15 दिनों से चल रहा आंदोलन खत्म, राज्यपाल सुश्री अनुसूइया उइके को ज्ञापन सौंपने के बाद जूस पिलाकर तुड़वाया गया अनशन

रायपुर. राज्य में पिछले पन्द्रह दिनों से खिंच रहे कांकेर पत्रकार विवाद का अंतत: पटाक्षेप हो गया. राज्यपाल सुश्री अनुसूइया उइके को ज्ञापन सौंपने के बाद आंदोलनकारियों ने घोषणा की कि वे पत्रकार साथियों के भारी दबाव, मानमनौव्वल और राज्यपाल के आग्रह के बाद अपना अनशन तोड़ रहे हैं.

विदित है कि गत 26 सितंबर 2020 को कांकेर में पत्रकार कमल शुक्ला और सतीश यादव के साथ कुछ लोगों ने दुरव्यवहार और मारपीट की थी. इस घटना ने प्रदेशभर के पत्रकारों को उद्वेलित कर दिया था. राजधानी रायपुर सहित कई जिलों में अनशन और प्रदर्शन हुए. दूसरी ओर सरकार प्रयास करती रही कि यह टकराव खत्म हो. इसका पहला रास्ता बातचीत का अपनाया गया. मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के निर्देश पर पत्रकारों की एक जांच कमेटी गठित की गई. उच्च स्तरीय जांच दल के अध्यक्ष नवभारत के संपादक राजेश जोशी, जांच दल के सदस्य दैनिक आज की जनधारा के संपादक अनिल द्विवेदी, बस्तर इम्पेक्ट के संपादक सुरेश महापात्र, राष्ट्रीय हिंदी मेल की सहायक संपादक शगुफ्ता शीरीन और स्वराज्य एक्सप्रेस के संपादक रूपेश गुप्ता थे जिसने कांकेर जाकर पूरे मामले की जांच की और अपनी रिपोर्ट मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को सौंपते हुए कुछ सिफारिशें की थी. जांच कमेटी ने जो रिपोर्ट सौंपी, सरकार ने उस पर तुरंत एक्शन लिया और बिना देरी किए कांकेर घटना के लिए दोषी पुलिस अधिकारियों के स्थानांतरण किए तथा सिट' कमेटी का गठन भी कर दिया.

मीडिया अपने अंदर झांके : जांच कमेटी

जांच कमेटी ने मार्गदर्शक टिप्पणी की है. कमेटी ने कहा कि  'इस बात को लेकर मीडिया के अंदर ही विमर्श होना चाहिए कि पत्रकार के रूप में लक्ष्मण रेखा कहां तक है. मीडिया का अपना दायित्व है, अपना दायरा है लेकिन कांकेर में जो देखने को मिला, उसमें कमल शुक्ला और सतीश यादव ने पत्रकारिता से बेपटरी होकर अपनी निजी नाराजगी को सोशल मीडिया के माध्यम से प्रस्तुत किया. इसके बाद ही दोनों के साथ गंभीर घटना घटित हुई, जो निंदनीय है. कमल शुक्ला ने पत्रकारिता के दायरे से निकलकर एक्टिविज्म का प्रदर्शन किया. समिति का ये सुझाव है कि मीडिया के अंदर भी इस पर विचार होना चाहिए कि पत्रकार के रूप में उनका दायरा कहां तक है ताकि इस तरह की घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके. पूरे घटनाक्रम में अहं का टकराव स्पष्ट दिखता है. यह स्थिति संवादहीनता से पैदा होती है. संवाद कायम करने की जिम्मेदारी प्रशासन और शासन दोनों की होती है.'