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राजनीति विफल क्यों होती है

राजनीति विफल क्यों होती है

ध्रुव शुक्ल

विश्व में राजनीति की स्थायी विफलता को देखकर श्रीकृष्ण की याद आती है। वे पाँच हजार साल पहले उस भूले हुए योग की याद दिला गये जिसे हम हर युग में भूल जाते हैं। वे कह गये हैं कि जगत में कोई ऐसे प्रभु नहीं जो हमारे कर्म और उसके फल का निर्धारण करते हों। प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वभाव का प्रवर्तक है। उसके स्वभाव से उत्पन्न कर्म ही उसे बाँधकर भटकाते रहते हैं। 

श्रीकृष्ण के वचनों में डूबा साधते हुए लगता है कि संसार के अरबों लोग किसी राज्य के द्वारा नहीं सँभाले जा सकते। अगर प्रत्येक व्यक्ति चाहे तो अपने ही स्वराज्य में अपने आपको सँभाले रह सकता है। शर्त यही है कि सब अपनी देह के धर्मों को त्यागने की कला जान लें।

विषयों में आसक्ति ही इंद्रियों का संयोग पाकर प्रत्येक व्यक्ति में उसके स्वभाव के अनुरूप सुख-दुख और राग-द्वेष के भाव और उसी के अनुरूप कर्म उत्पन्न करती रहती है। जन्मजात सबने यही धर्म धारण किया है। इस धर्म से उठने वाली आकाँक्षाएँ पूरी करने के लिए पृथ्वी पर आज तक कोई राज्य सक्षम नहीं हो सका। कोई राज्य सबको सुखी नहीं कर सका और सुख में विघ्न आने पर करोड़ों लोगों के क्रोध का सामना भी नहीं कर सका।

पर यदि लोग चाहें तो अपने सुख-दुख और राग द्वेष की क्षणभंगुरता को पहचानकर अपने सामुदायिक जीवन में सहजीवी सद्भाव का मार्ग बना सकते हैं। इसके लिए किसी दूसरे से नहीं अपने आपसे ही युद्ध करना पड़ेगा । अपने अंतःकरण में बुद्धि और अहंकार के बीच  छिड़े युद्ध में अपने मन को जीतना पड़ेगा। 

इस विजय में वह सर्वव्यापी आत्मप्रकाश रूह के अहसास में उतरता जान पड़ेगा जिसमें सब अपने-अपने स्वभावों से उत्पन्न राग-द्वेष और उनसे उत्पन्न कर्मों को त्यागने के लिए आतुर हो उठते हैं और अपने-अपने स्वराज्य में जागकर किसी भी राज्य की पराधीनता को त्यागकर क्षिति-जल-पावक-गगन-समीर के सहयोग से अपनी स्थानीयता में अपना पोषण पाकर खुशहाल बने रहने की ठान सकते हैं।

हम याद करें स्वतंत्रता के महासमर के बीच इस भूले हुए योग की याद महात्मा गांधी ने दिलायी थी। लगता है कि हमारे चारों तरफ भरते वैश्विक बाज़ारों ने यह ठान लिया कि किसी को इस काबिल ही न छोड़ा जाये कि उसे इस भूले हुए योग की याद आ सके। बाज़ार की इस चुनौती का सामना किये बिना जीवन को अराजकता से नहीं बचाया जा सकता।