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भारत के चिंतन और कल्याण की अवधारणा वाले गेम बनायें युवा: PM मोदी

भारत के चिंतन और कल्याण की अवधारणा वाले गेम बनायें युवा: PM मोदी

नई दिल्ली, 24 जून। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज कहा कि मौजूदा समय में उपलब्ध ज्यादातर ऑनलाइन या डिजिटल गेम की अवधारणा भारतीय सोच से मेल नहीं खाती इसलिए ऐसी वैकल्पिक अवधारणा को बढावा देने की जरूरत है जिसमें भारत का मूल चिंतन हो और यह मानव कल्याण से जुड़ी हो।

श्री मोदी ने गुरूवार को वीडियो कांफ्रेन्स के माध्यम से टॉय-केथॉन को संबोधित करते हुए कहा , “ ऑनलाइन गेमिंग में देश की संभावनाएं और सामर्थ्य तेजी से बढ रहा है लेकिन जितने भी ऑनलाइन या डिजिटल गेम्स उपलब्ध हैं उनमें से अधिकतर का कॉन्सेप्ट भारतीय नहीं है, हमारी सोच से मेल नहीं खाता है। आप भी जानते हैं कि इसमें अनेक गेम्स के कॉन्सेप्ट या तो हिंसा को प्रमोट करते हैं या फिर मानसिक दबाव का कारण बनते हैं।”

उन्होंने कहा,“ हमारा दायित्व है कि ऐसे वैकल्पिक कॉन्सेप्ट डिजायन हों, जिसमें भारत का मूल चिंतन, जो सम्पूर्ण मानव कल्याण से जुड़ा हुआ हो, वो हो, तकनीकि रूप में सुपीरियर हों, फन भी हो, फिटनेस भी हो, दोनों को बढ़ावा मिलता रहे। और मैं अभी ये स्पष्ट देख रहा हूं कि डिजिटल गेमिंग के लिए ज़रूरी सामग्री और प्रतिस्पर्धा हमारे यहां भरपूर है। हम 'टॉय-केथॉन' में भी भारत की इस ताकत को साफ देख सकते हैं। इसमें भी जो आइडिया सलेक्ट हुए हैं, उनमें मैथ्स और कैमिस्ट्री को आसान बनाने वाले कॉन्सेप्ट हैं, और साथ ही मूल्य आधारित समाज को मजबूत करने वाले विचार भी हैं। ”

श्री मोदी ने कहा कि बीते पांच छह वर्षों में हैकाथॉन को देश की समस्याओं के समाधान का एक बड़ा प्लेटफॉर्म बनाया गया है। इसके पीछे की सोच है कि देश के सामर्थ्य को संगठित करना उसे एक माध्यम देना। उन्होंने कहा , “ कोशिश ये है कि देश की चुनौतियों और समाधान से हमारे नौजवान का सीधा कनेक्ट हो। जब ये कनेक्ट मजबूत होता है तो हमारी युवा शक्ति की प्रतिभा भी सामने आती है और देश को बेहतर समाधान भी मिलते हैं। देश के पहले 'टॉय-केथॉन' का मकसद भी यही है।”

उन्होंने कहा, “ खिलौने और गेम हमारी मानसिक शक्ति, हमारी क्रिएटिविटी और हमारी अर्थव्यवस्था पर, ऐसे अनेक पहलुओं को प्रभावित करते हैं। हम सब जानते हैं कि बच्चे की पहली पाठशाला अगर परिवार होता है तो, पहली किताब और पहला दोस्त, ये खिलौने ही होते हैं। समाज के साथ बच्चे का पहला संवाद इन्हीं खिलौनों के माध्यम से होता है। आपने देखा होगा, बच्चे खि‍लौनो से बाते करते रहते हैं, उनको निर्देश देते हैं, उनसे कुछ काम करवाते हैं। क्योंकि उसी से उसके सामाजिक जीवन की एक प्रकार से शुरुआत होती है। इसी तरह, ये धीरे-धीरे उसकी स्कूल लाइफ का भी एक अहम हिस्सा बन जाते हैं, सीखने और सिखाने का माध्यम बन जाते हैं।”

प्रधानमंत्री ने कहा कि इसके अलावा खिलौनों से जुड़ा एक और बहुत बड़ा पक्ष यह है कि खिलौने और गेम की दुनिया की अर्थव्यवस्था करीब करीब 100 अरब डॉलर की है। जिसमें भारत की हिस्सेदारी सिर्फ डेढ़ अरब डॉलर के आस पास ही है। ” उन्होंने कहा कि देश अपनी जरूरत के लगभग 80 प्रतिशत खिलौने विदेशों से आयात करता है यानि इन पर देश का करोड़ों रुपए बाहर जा रहा है। इस स्थिति को बदलना बहुत ज़रूरी है। ये सिर्फ आंकड़ों की ही बात नहीं है, बल्कि ये सेक्टर देश के उस वर्ग तक, उस हिस्से तक विकास पहुंचाने में सामर्थ्य रखता है, जहां इसकी अभी सबसे ज्यादा ज़रूरत है।

उन्होंने कहा , “ खेल से जुड़ा जो हमारा कुटीर उद्योग है, जो हमारी कला है, जो हमारे कारीगर हैं, वो गांव, गरीब, दलित, आदिवासी समाज में बड़ी संख्या में हैं। हमारे ये साथी बहुत सीमित संसाधनों में हमारी परंपरा, हमारी संस्कृति को अपनी बेहतरीन कला से निखारकर अपने खिलौनों में ढालते रहे हैं। इसमें भी विशेष रूप से हमारी बहनें, हमारी बेटियां बहुत बड़ी भूमिका निभा रही हैं। खिलौनों से जुड़े सेक्टर के विकास से, ऐसी महिलाओं के साथ ही देश के दूर-दराज इलाकों में रहने वाले हमारे आदिवासी और गरीब साथियों को भी बहुत लाभ होगा।”