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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -भ्रमकाल में बदलता कोरोना काल

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -भ्रमकाल में बदलता कोरोना काल

-सुभाष मिश्र
कोरोना की पहली लहर हमारे देश में अफवाहे लेकर आई थी और दूसरी लहर भ्रम। कोरोना संक्रमण की इस महामारी के बीच क्या करें, क्या न करें की सलाह अलग-अलग फोरम, राजनैतिक दलों और चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा दी जा रही है। जितने चैनल, जितने मीडिया, जितने नेता, जितने विशेषज्ञ उतनी बात। इस राष्ट्रीय आपदा के लिए कोई स्पष्ट और एक रूपता वाली नीति नहीं होने के कारण इस समय केंद्र और राज्यों के बीच टकराहट जैसी स्थिति निर्मित हो रही है। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन प्रधानमंत्री के फोन काल के बाद ट्विट करके कह रहे हैं वे मन की बात करने के बजाए काम की बात करते और सुने तो ज्यादा अच्छा होता। मन की बात सुनने वालों को बुरा लगना स्वाभाविक है। दुष्यंत कुमार का एक शेर है -
गिड़गिड़ाने का यहां कोई असर होता नहीं
पेट भरकर गालियां दो आह भरकर बददुआ।।


देश में कोरोना के बिगड़ते हुए हालात और सरकारों की नाकामी पर जब लोग बात करते हैं तो उन्हें समझाईश दी जा रही है कि यह आलोचना का समय नहीं है, साथ मिलकर विपदा से लडऩे का समय है। आपकी विपत्ति हमारी संपत्ति की मानसिकता को छोड़कर देश की विपत्ति को अपनी संपत्ति न समझकर सहयोग करने की बात भी हो रही है। कांग्रेस नेता सोनिया गांधी और राहुल गांधी ने इस आपदा के लिए सिस्टम के बजाए नेतृत्व की असफलता करार दिया है। सोनिया गांधी ने कांग्रेस के राज्यसभा और लोकसभा सांसदों से कहा है की कोरोना से हालात बिगड़ते जा रहे हैं। इसमें सिस्टम नहीं मोदी सरकार फेल साबित हुई है।
राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को लिखी अपनी चि_ी में कहा कि देश में कोरोना के म्यूटेशन को लगातार ट्रैक किया जाए। उन्होने प्रधानमंत्री पर आरोप लगाते हुए कहा है  कि सरकार की 'विफलताÓ के कारण देश एक बार फिर से राष्ट्रीय स्तर के लॉकडाउन के मुहाने पर खड़ा हो गया है।

वैक्सीन और कोरोना वायरस से जुड़े भ्रम और आशंका का आलम यह रहा की लोगों को बताया की सैनिटाइजर से हाथों को नुकसान हो सकता है। शाकाहारी लोगों को कोरोना से कोई खतरा नही हैं। मास्क लगाने से शरीर में कार्बन डाई आक्साइड बढ़ जाती है। कोरोना वायरस से लहसून का पानी बचा सकता है। गोमूत्र और गाय के गोबर से कोरोना से बचाव हो सकता है। रामदेव बाबा के पतंजलि की कोरोनिल को मिली डब्ल्यूएचओ से मान्यता मिल गई है जबकि ऐसा नहीं था। कोविड-19 सिर्फ एक सामान्य फ्लू की तरह है, इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है। काढ़ा पीजिए, इम्युनिटी बढ़ाईये।

व्हाट्सप्प यूनिर्वसिटी पर इस समय कोरोना से बचाव के लिए ज्ञान की गंगा बह रही है। हरिद्वार के कुंभ की तरह यहां भी लोग बेझिझक डुबकी लगा रहे हैं।
कोरोना वैक्सीन के पहले चरण में लोग भ्रम के कारण वैक्सीनेशन के लिए नहीं आये। जब दूसरी लहर में कोरोना संक्रमण बढ़ा, तो लोग वैक्सीन की डोज लेने आगे आये। इस बीच कोरोना वैक्सीन की उपलब्धता और मांग को लेकर भी पूरे देश में भ्रम की स्थिति बनी हुई है। समय पर वैक्सीन का आर्डर नहीं देने के कारण अब वैक्सीन उपलब्ध नहीं है। बहुत से राज्यों में एक मई से शुरू होने वाले 18+ आयु का टीकाकरण प्रारंभ नहीं हो पाया। इस भ्रम समय में यदि देश के प्रधानमंत्री हमेशा की तरह रात्रि 8 बजे आकर बहनों और भाईयों के साथ पूरे देश को बता दे की वैक्सीन के डोज कब तक सबको लग जायेंगे। वैक्सीन की उपलब्धता कब तक होगी। सभी राज्यों को आक्सीजन का पर्याप्त कोटा कब तक मिल जायेगा। तब तक के लिये लोगो को घर में रहिए,
सुरक्षित रहिए, जान है तो जहान है की समझाईश के साथ राष्ट्रीय लाकडाउन की घोषणा कर दें। देश के लोग तब तक उनकी सलाह मानकर घर में रहेंगे, सुरक्षित रहेंगे।

भारत सरकार के स्वास्थ्य विभाग ने कोरोना के पहली लहर में जिस तरह की गाईड लाईन, दवाईयों के डोज बताएं ये, दूसरी लहर में इससे परहेज क्यों हो रहा है। एम्स के निर्देशक डा. रणवीर गुलेरिया बता रहे हैं कि सिटी स्केन से बचिए। सिटी स्केन कराने से तीन सौ एक्सरे के बराबर रेडियेशन होता है जिससे कैंसर होने का खतरा है। वहीं इंडियन रेडियेलॉजिकल संगठन कह रहा हैं की आधुनिक सिटी स्केन मशीन केवल चार एक्सरे के बराबर ही रेडियेशन होता है। अस्पतालों में भर्ती मरीजों के परिवाजन पागलों की तरह रेमडेसिविर और सेमीफूलो जैसे इंजेक्शन ढूंढ रहे हैं, ब्लेक में खरीद रहे हैं और बहुत से डाक्टर, विशेषज्ञ कह रहे हैं कि यह बिना चिकित्सक की सलाह के नहीं लेना है। आईसीएमआर और डब्ल्यूएचओ भी इसके इलाज की गारंटी नहीं दे रहा है। जिन लोगों के परिवारजन अस्पतालों में भर्ती हैं, उन्हें यह भी नहीं पता चल रहा है कि अंदर आक्सीजन है या नहीं और यदि खत्म होगी तो उसका इंतजाम किसे करना है। पूरे देश में इस समय लोग आक्सीजन सिलेंडर लेकर घुमते देखे जा सकते हैं। हवाई यात्रा कर रहे यात्रियों को यह स्पष्ट तौर से नहीं बताया जा रहा है कि उन्हें कितने दिन पहले ही आरटीपीसीआर रिपोर्ट लानी है। डॉक्टर कह रहे है कि कोरोना पाजिटिव होने के बाद 17 दिनों के उपचार और आइसोलेशन के उपरांत किसी प्रकार की नेगेटिव रिपोर्ट की जरूर नहीं है, किन्तु विमानन अधिकारी इसे नहीं मान रहे है। आये दिन विमान के यात्रियों को हवाई अड्डे पर रोके जाने या यात्रा नहीं करने देने को लेकर बवाल मच रहा है।

कोरोना संक्रमण के उपचार के दौरान किन मरीजों को अस्पताल में भर्ती होना है किन्हें नहीं या भी स्पष्ट नहीं है। ऐसी स्थिति में बहुत से गंभीर मरीजों को अस्पताल में बेड नहीं मिल रहा है, और जिनका आक्सीजन लेवल अच्छा भला है, वे अस्पताल के बेड पर लेटे हैं। कोरोना पीडि़तों की सहायता के लिए जितने मोबाइल नंबर, नोडल आफिसर बताए जाते हैं, उनसे संपर्क करना भी एक बड़ा टास्क है। जरूरतमंद लोग सही सूचनाओं के अभाव में यहां वहां मारे-मारे भटक रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी ने जिसे आपदा में अवसर करार दिया था उसका लाभ इस भ्रम की स्थिति के कारण मुनाफाखोर उठा रहे हैं। छोटी-छोटी सर्दी, खांसी-बुखार को भी कोरोना बताकर लोगों के भीतर कोरोना का डर पैदा करके उनसे तरह-तरह के टेस्ट करने, भर्ती होने कहा जा रहा है।

केंद्र सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार के विजयराघवन ने कहा है कि  जिस तरह तेजी से वायरस का प्रसार हो रहा है। कोरोना महामारी की तीसरी लहर आनी तय है, लेकिन यह साफ नहीं है कि यह तीसरी लहर कब और किस स्तर की होगी। कोरोना वायरस के विभिन्न वेरिएंट मूल स्ट्रेन की तरह ही फैलते हैं। ये किसी अन्य तरीके से फैल नहीं सकते। वायरस के मूल स्ट्रेन की तरह यह मनुष्यों को इस तरह संक्रमित करता है कि यह शरीर में प्रवेश करते समय और अधिक संक्रामक हो जाता है और अपने और अधिक प्रतिरूप बनाता है। तीसरी लहर के कहर से बचाने के लिए सबसे बड़ा हथियार वैक्सीनेशन होगा। यह वायरस इंसानो से इंसानो में फैलता है। इसलिए संक्रमण की कड़ी को सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क लगाने समेत कोविड एप्रोप्रिएट बिहैवियर का सख्ती से पालन के जरिए तोड़ा जा सकता है।

हमारे देश में बाबूगिरी की मानसिकता के चलते टीकाकरण का कार्यक्रम भी बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। यदि 18 साल के ऊपर के लोगों को टीका लगना है तो कोई भी आदमी जिसके पास आधार कार्ड, अंत्योदय कार्ड हो या ना हो यदि टीकाकरण केद्र पर जाए तो उसे टीका लगना चाहिए। कोई भी आदमी निर्धारित टीके की डोज से ज्यादा टीके तो नहीं लगवाएगा, किन्तु नहीं हम उसे इतनी औपचारिकताओं में उलझा देंगे की पूरा टीकाकरण कार्यक्रम ही फेल हो जाए।

समूचे कोरोना संक्रमणकाल और उससे उपजी स्थितियों में जिस तरह का भ्रम निर्मित किया गया है, वह बताता है कि हमारे देश में इस तरह की आपदा से निपटने का कोई वैज्ञानिक व्यवस्थित कार्यक्रम, कार्ययोजना नहीं है। कहते हैं जब रोम जल रहा था तो नीरो बांसुरी बजा रहा था।