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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - रंगों में बांटने के खेल को खारिज करता होली का पर्व

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - रंगों में बांटने के खेल को खारिज करता होली का पर्व

सुभाष मिश्र
जोभी ताकतें हमारे आपके जीवन को बदरंग और बेरंग करना चाहती हैं, होली का त्यौहार रंगो को बाटंने के खेल को खारिज करके सबको एक कर देता है। होली में न कोई भगवा रह पाता है, न कोई हरा। होली के रंग किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करते। होली का पर्व हमारे भीतर के नकारात्मक रंगो को निकालकर हमें खूबसूरत रंगो की ओर ले जाता है। यह एक पर्व है जो हमें हमारी आपसी दुश्मनी को भुलाकर, आपस में गले लगने के लिए प्रेरित करता है। होली के अवसर पर हम सब अपनी दबी हुई वर्जनाएं, कुंठांए, गुस्से को अलग-अलग नारो, दोहों के माध्यम से बेखौफ व्यक्त करते हैं, और सामने वाला इसका बुरा भी नहीं मानता। यदि बुरा भी लगे तो हम यह कहते हैं की बुरा न मानो होली है। यदि उसके बाद भी कोई न समझे तो हमारे कहने में यह भाव भी छिपा रहता है की, यदि बुरा मान भी लिया तो क्या कर लोगे। होली में चढ़े रंगों के साथ ही थोड़ेें दिन बाद होली पर की गई शैतानियों, बदमाशियों का रंग भी साफ हो जाता है। होली पर जब सब उसे लाल करने में लगे रहते है और वो भी सुर्ख लाल होकर और न जाने क्या-क्या हो जाता है। रायपुर के सदर बाजार में होली के समय नाथुलाल की बारात निकलती है। जो समाज की सेक्स संबंधी उन वर्जनाओं का प्रकरीकरण है, जिन पर हम बात करने से कतराते हैं।
कोविड संक्रमण के चलते लगातार यह दूसरा साल है जब विश्व रंगमंच दिवस 27 मार्च को लाइव नाटको का मंचन नहीं हुआ। हमने भी कई दिनों तक रंगमंच की यात्रा के बहाने बहुत से नाटयांश तैयार किये, पर उसका शो नहीं हो पाया। अब ऑनलाईन इसे जारी करना पड़ रहा है। कोविड के ऐसे ही बुरे हाल रहे तो आने वाले समय में तीज त्यौहार पूजा-अर्चना भी ऑनलाईन करनी पड़ेगी।  
होली और रंगपंचमी के समय हमारे देश में जिस तरह लोग घुम-घुमकर एक दूसरे को रंग-गुलाल लगाकर, मस्तों की टोली के रूप में होली मनाते हुए फाग गाते फिरते है उस उत्साह और माहौल में भी थोड़ी कमी आई है। रंगमंच और होली विविध रंगो से भरा हुआ ऐसा माहौल निर्मित करता है कि हमारा समय कलरफुल हो जाता है। मनुष्य की जिजीविषा उसे विषम से विषम परिस्थितियों में जीने के लिए प्रेरित करता है। जीवन के सारे नकारात्मक प्रसंगवश एक कविता याद आती है।
रात के खाने के बाद
मां ने ढ़ंक दिए हैं ,कुछ अंगारे राख से
थोड़ी सी आग, कल सुबह के लिए भी तो चाहिए।
होली के मौके पर बाई यानी मां दादी सब होलिका दहन के बाद थोड़ी सी आग लेकर  घर आती थी, और उसे चूल्हे में दबाकर रख देती थी। घर का चूल्हा ऐसी ही दबी हुई आग से रोज जलता था। गैस सिलेण्डर और खाना पकाने गर्म करने के बहुत सारे इलेक्ट्रानिक उपकरण आने से अब शहरो के अधिकांश घरो से और गांवो में उज्जवला योजना से मिले गैस कनेक्शन के कारण लकड़ी के चूल्हे रोज जलना बंद से हो गए हैं। फिर भी परपंरा अनुसार अभी भी होलिका दहन के बाद थोड़ी सी आग घर लाने का चलन है। कुछ लोग होली में होरा यानी चना भूनकर भी खाते है। कुछ लोग दूसरों की छाती पर भी होरा भूनने से भी बाज नहीं आते। होली हमारे भीतर और बाहर के बहुत सारे कचरे को जलाकर नष्ट कर देती है।
होली का त्यौहार पैसे वालों से ज्यादा सर्वहारा वर्ग का है जिसमें अभिजात्य का प्रदर्शन कम और फटे पुराने कपड़ो की पूछपरख ज्यादा होती है। होली की फाग में कबीर की उल्टबासियों का रंग भी समाहित होता है।
एक अचंभा देखा रे भाई, कुंए में लग गई आग
जलने वाले सब जल गये, और मछली खेल फाग।।
हमारे देश और यहॉ के लोग बहुत उत्सवधर्मी है। हमारे अधिकांश तीज-त्यौहार खेती-किसानी, नई फसल के आगमन से जुड़े है, ये हमने नये उत्साह का संचार करते हैं। इधर के कुछ सालों में सरकार और कोरोना दोनो ने मिलकर पब्लिक के साथ ऐसी होली खेली है की उसका रंग निकलने का नाम नहीं ले रहा है। पिछले एक साल से मंहगाई चरम पर है, बेरोजगारी बेकाबू है। पेट्रोल की कीमतें आसमान छू रही है। अच्छे दिनो की आस लगाए बैठी जनता नये-नये चुनावी जुमलों और मन की बातें सुनकर भ्रमाई हुई है। कुछ ऐसी ताकतें भी हैं जो हमारे देश में अलग-अलग सोशल मीडिया प्लेटफार्म और समाजिक जीवन में क्षेत्रों में सक्रिय है, जो हमारी आपसी कलरफूल जिंदगी और सामाजिक ताने बाने को बदरंग और बेरंग करके एक सा रंग भरने की सोचती हैं। ऐसे लोग भूल जाते हैं कि प्रकृति ने हमें अलग-अलग रंग प्रदान की है और यही हमारी खूबसूरती हैं। हम अनेकता में एकता और विविध रंगो, पर्वों की संस्कृति में रहने वाले लोग हैं जिन्हे इन दिनों एक रंग का नया सांस्कृतिक पाठ पढ़ाया जा रहा है।
होली के अवसर पर हमने अपनी अभिव्यक्ति को मुखर करके बड़े से बड़े और आसपास के लोगो को टाईटिल देकर उसकी वास्तविक औकात तक बताते हैं। अपनी करनी-कथनी के अनुरूप टाइटिल/उपाधि पाया। ऐसा व्यक्ति सिवाय खिसियानी हंसी हंसने के अलावा और कुछ नहीं कर पाता। होली ही वो त्यौहार है जो युवक-युवती को आपस में एक दूसरे को छुकर रंगो से सरोबार करने का, भीगने का और शरारत करने का मौका देता है। देवर-भाभी, जीजा-साली और ऐसे बहुत से रिश्तों की मस्ती भी इस त्यौहार पर प्रदर्शित होती है। हमारी हिन्दी सिनेमा के बहुत से गाने जो हमारे लोक गीतों से भी लिए गए हैं, ऐसे अवसरों पर खूब सुनाई देते हैं।  
रंग बरसे भीगे चुनरवाली, रंग बरसे
अरे कैने मारी पिचकारी तोरी भीगी अंगिया
ओ रंगरसिया रंगरसिया, हो
अरे, सोने की थाली में, जोना परोसा
अरे खाए गोरी का यार, बलम तरसे रंग बरसे
इस बार होली के पर्व को लेकर लोगों में कोई उत्साह नहीं दिख रहा है। कोविड की दूसरी लहर का असर होली के कारोबार पर भी पड़ा है। देश के कई हिस्सों में कोविड की वजह से प्रतिबंध लगे हुए हैं। लोगों को शारीरिक दूरी का पालन करते हुए अन्य सभी नियमों का पालन करने के लिए कहा जा रहा है। छत्तीसगढ़ में कोरोना के तेजी से बढ़ते मामलो को देखते हुए बहुत जिलो में होली मिलन समारोह के आयोजन पर भी रोक लगा दी गई हैं। होली के अवसर पर होने वाले होली मिलन समारोह और सार्वजनिक कार्यक्रमों पर रोक हैं। होली में डीजे, नगाड़ा आदि ध्वनि यंत्रो को बजाए जाने पर भी प्रतिबंध है।
होली मनाने का चलन भी धीरे-धीरे बदल रहा हैं। अब पक्के रंगों वार्निश, मिट्टी, कीचड़ आदि से लोग परहेज करने लगे हैं। यहीं वजह हैं कि अब हर्बल होली पर अधिक जोर हैं। लोगों की रूचि को देखते हुए अब बाजार में फलों के फ्लेवर वाला गुलाल व पेस्ट लुभा रहा है। रंगो में फलों के फलेवर वाले रंग व पेस्ट भी बिक रहे हैं। आरेंज, पाइन एप्पल, मैंगो, स्ट्राबेरी आदि फलों के फ्लेवर में गुलाल और कलर देख बच्चे इनकी ओर आकर्षित भी हो रहे हैं। उम्मीद है कि होली का यह पर्व खुशियों से भरे रंगो के इंतजार में बैठे लोगो के जीवन में वो रंग घोलेगा जो कोविड के खौफ को कम करेगा। ऐसे में नजीर अकबराबादी की इस नज्म को जाद कर सकते हैं -
जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़ूम शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।
महबूब नशे में छकते हो तब देख बहारें होली की।
                    आप सभी को होली पर्व की शुभकामनाएं।