II संपादकीय : नवरात्रि पर 'सातवां वचन' याद कीजिए II

II संपादकीय : नवरात्रि पर 'सातवां वचन' याद कीजिए II

अनिल द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार


हिन्दुस्तानी त्योहारों के पीछे कोई न कोई ऐसी कथा जरूर होती है, जो आदमी को इंसान बनाने की राह हमवार करती है. कल से देश-दुनिया में देवी का पर्व नवरात्रि प्रांरभ हो रहा है. हर दिन मां दुर्गा को समर्पित रहेगा. नवरात्रि के नौ दिनों तक दुर्गा मां के अलग-अलग नौ रूपों की पूजा की जाती है. यह सिर्फ देवी की पूजा और उपवास का ही पर्व नही है बल्कि हमारे अंदर छुपे नौ दुर्गुणों के नाश करने का संकल्प लेने का भी पर्व है. आपको याद होगा कि नवरात्रि के अंतिम दिन को महानवमी कहा जाता है और इस दिन कन्या पूजा की जाती है मगर क्या सिर्फ नौ दिनों तक ही! साल के बाकी दिन कन्याओं के साथ क्या हो रहा है, मेरा इशारा आप समझ रहे होंगे.

वक्त का यह वह विरल दौर है, जब सिर्फ भारत नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में कन्याओं के साथ क्या कुछ नही घट रहा है. सालों तक चल रहे आंदोलन के बावजूद आपको यदा-कदा, आस-पड़ोस में बालिका विवाह होते दिख जाएंगे. स्कूल से लेकर आफिस या घरों तक में हमारी कन्याएं महफूज नही हैं. कोई छेड़खानी का शिकार है तो कोई बलात्कार का. किसी को पराये का दंश मिल रहा है तो किसी को अपने बाप तक की यातना भोगनी पड़ रही है. क्रिकेट कप्तान रहे महेन्द्र सिंह धोनी की बिटिया की उम्र क्या होगा! महज पांच या छह साल लेकिन मात्र 16 साल का एक युवक उसका बलात्कार करने की धमकी खुलेआम सोशल मीडिया पर देता है. सर उठाता सवाल यह है कि हम अपनी पीढ़ी को कैसा संस्कार और वातावरण दे रहे हैं. जाहिर है ऐसे प्रदूषित संस्कार के पीछे हम बड़ों की जरूरत से ज्यादा छूट या लापरवाही है!

ऐसे दौर में राहत देने वाला संदेश सोशल मीडिया से ही मिलता है कि अगर बेटियों को बचाना है तो हम हर कन्या को अपनी बेटी समझकर उसे सुरक्षित घर पहुंचाएं तभी बेटियां महफूज रह सकेंगी. एनसीआरबी के आंकड़े चौंकाते हैं कि गुजरे 2019 में देशभर में एक लाख से ज्यादा कन्याएं यौन-उत्पीड़न का शिकार हुई हैं. अब आएं महिलाओं पर तो वे भी नारकीय यातनाओं से गुजर रही हैं. छत्तीसगढ़ में पिछले 13 महीने में बलात्कार के 2,575 मामले दर्ज किए गए हैं. गृह मंत्री ताम्रध्वज साहू ने स्वीकारा है कि राज्य में एक जनवरी 2019 से 31 जनवरी 2020 तक राज्य में डकैती, लूट, हत्या, बलात्कार और अन्य अपराधों के 17,009 मामले दर्ज किए गए हैं.

कुछ लोगों को हमारा लोकतंत्र अक्सर लड़खड़ाता नजर आता है, पर यह सच है कि भारतीयों में गिरकर उठने और उठकर चल पड़ने की अद्भुत शक्ति है. आप 16 दिसंबर, 2012 को हुए 'निर्भया कांड' को याद करें. उस बच्ची के साथ उस रात जो हुआ, उसके दंश और पीड़ा को समूचे देश ने महसूस किया. आदमी, औरतें, बच्चे, बूढ़े, सब उठ खड़े हुए. कश्मीर से कन्याकुमारी तक, कामरूप से द्वारका तक, कोई कोना ऐसा नहीं था, जहां लोग उबल न रहे हों. छोटी-छोटी बातों पर बहस में उलझ पड़ने वाली हमारी संसद भी एकजुट हो गई थी. एक झटके में तमाम कानून बन या सुधर गए. इस मुद्दे पर समूचे देश में जो एका हुआ, वह राहत प्रदान करता है.

हमें आधी आबादी के पोषण और संरक्षण के लिए अभी लंबी दूरी तय करनी है. इसके लिए जरूरी है कि महिलाओं को शिक्षित और सशक्त बनाया जाए. तमाम खौफनाक खबरों के बीच यह तथ्य कुछ तसल्ली देता है कि संसार के दूसरे विकासशील मुल्कों की तुलना में भारत की स्थिति अपेक्षाकृत अच्छी है. इस बार सिविल सर्विसेज परीक्षा में शीर्ष चार स्थानों पर युवतियां सफल हुई हैं. ये आंकड़े थोड़ी राहत देते हैं, पर मंजिल अभी दूर है. बैंगुई से भारत तक, कोसोवो से केन्या तक हर रोज दिल-दहलाने वाली दर्जनों दास्तानें हमारा पीछा करती हैं. इनसे मुक्ति के लिए साझा संग्राम जरूरी है. प्रत्येक पुरूष चाहे वह शादीशुदा हो या कुंवारा, उस सातवें वचन को याद रखना चाहिए जो उसने विवाह के दौरान एक स्त्री को दिए थे. अंतिम वचन के रूप में कन्या वर मांगती है कि आप पराई स्त्रियों को माता के समान समझेंगे और पति-पत्नी के आपसी प्रेम के मध्य अन्य किसी को भागीदार न बनाएंगे. यदि आप यह वचन मुझे दें तो ही मैं आपके वामांग में आना स्वीकार करती हूं. किसी स्त्री को पहले मां और अंत में दुर्गास्वरूप हमेशा सम्मान दें.

हैप्पी नवरात्रि.