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बेहद जिद्दी ये पांच खरपतवार..!

बेहद जिद्दी ये पांच खरपतवार..!


जागने लगे मोथा, सांवा, जंगली धान ,चौड़ी पत्ती और कांसी

राजकुमार मल

भाटापारा, 22 जून। खरपतवार की कुछ प्रजातियां किसानों की परेशानी बढ़ा रहीं हैं। ऐसी 5 प्रजातियों की पहचान की गई है ,जिनको नष्ट करने के लिए जरूरी दवाइयों की मांग कृषि दवा दुकानों में पहुंचने लगी है। 

मानसून की पहली बारिश। खरीफ की तैयारी में भरपूर मदद कर रही है । इसी के साथ शुरू हो चुका है धान की बोनी का काम। पीछे- पीछे खरपतवारों की कुछ बेहद जिद्दी प्रजातियों ने सिर उठाने शुरू कर दिए हैं। इसके बाद यह खेत के, हर हिस्से में अपना कब्जा जमाने की फिराक में नजर आता है क्योंकि मानसून का पूरा साथ मिल रहा है।


बेहद जिद्दी ये पांच

वैसे तो अपने प्रदेश के खेतों में कई तरह के खरपतवार मिलते रहे हैं लेकिन जंगली धान ,सांवा, मोथा, कांसी और चौड़ी पत्ती को सबसे ज्यादा जिद्दी और नुकसान पहुंचाने वाला खरपतवार माना जा चुका है। बढ़ते फैलाव के पीछे के कारणों की जांच में त्रुटि रहित प्रबंधन की कमी की बात सामने आई है। इसलिए इस बार सलाह दी जा रही है कि खरपतवार प्रबंधन पर गंभीरता दिखाएं अन्यथा परिणाम नुकसानदेह  हो सकता है।

नियंत्रण के लिए पहला काम

खरपतवार की इन जिद्दी प्रजातियों को पूरी तरह खत्म करने के लिए डीप कल्टीवेशन का किया जाना सही होगा। इससे खरपतवार के कंद बाहर आ जाएंगे और धूप में स्वाभाविक रूप से नष्ट हो जाएंगे। इसके साथ ही उनमें  दोबारा अंकुरण की क्षमता जाती रहेगी।

बीज भी हैं घातक

खरपतवार प्रबंधन पर ध्यान नहीं दिए जाने से मिट्टी में दबे कंद फैलाव तो लेते ही हैं, साथ ही फूलों में लगने वाले फल और उनके बीज, अपना परिवार, अपनी जनसंख्या भी बढ़ाते हैं। आगे चलकर इनसे निकलने वाले पौधे मुख्य खरपतवार का रुप ले लेते हैं।

अंतिम अस्त्र रासायनिक उपचार

खरपतवार नियंत्रण के लिए वैसे तो शस्य क्रिया और यांत्रिक विधि जैसे अन्य उपाय भी हैं लेकिन रासायनिक उपचार ही अंतिम उपाय है। इसलिए छिड़काव के पहले डीप कल्टीवेशन पहली अनिवार्य शर्त है। इससे कंद बाहर निकल आएंगे जिन्हें खरपतवार नाशक दवाओं की मदद से नष्ट किया जा सकेगा।

एस जी कालेज ऑफ एग्री एंड रिसर्च स्टेशन, जगदलपुर के डीन डा.एच सी नंदा ने बताया कि खरपतवार के कंद ही नए पौधे बनाते हैं। सही प्रबंधन के लिए उचित एवं मानक मात्रा में रसायन का छिड़काव ही एकमात्र उपाय है। किसान भाई अपने क्षेत्र के विषय विशेषज्ञ या कृषि विभाग की मदद ले सकते हैं।