II प्रधान संपादक सुभाष मिश्र बता रहे हैं कि फेक न्यूज के जरिए देश में अंधभक्तों, अंधविश्वासियों और मूर्खों की एक बड़ी जमात तैयार हो रही है, जिससे उबरने में सदियां लग जायेंगी

II प्रधान संपादक सुभाष मिश्र बता रहे हैं कि फेक न्यूज के जरिए देश में अंधभक्तों, अंधविश्वासियों और मूर्खों की एक बड़ी जमात तैयार हो रही है, जिससे उबरने में सदियां लग जायेंगी
  • सुभाष मिश्र


इस मीडिया समय में हमारे सामने बहुत से भ्रमजाल फैलाये जा रहे हैं। सच और झूठ क्या है, इसका फर्क करना मुश्किल हो गया है। यदि इस सच और झूठ का खेल केवल उपभोक्ता सामग्री बेचे जा रहे उत्पादों तक होता तो शायद यह उतना नुकसानदायक नहीं होता जितना कि यह सामाजिक सौहार्द, आपसी भाईचारे और राष्ट्रीय एकता को क्षति पहुंचाने के स्तर पर हो रहा है। बहुत सारे मीडिया समूह, सोशल मीडिया वाररूम बनाकर जिस तरह से फेक न्यूज को सच बताकर फैला रहे हैं, वह बहुत खतरनाक है।

यदि देश में इस समय लागडाउन' की स्थिति नहीं होती तो पता नहीं किस—किस जगह पर सांप्रदायिक दंगे होते। कुछ गंवार और कथित रूप से धार्मिक अंधविश्वास से ग्रसित लोगों की गलती का खामियाजा पूरा देश भुगत सकता है। अल्पसंख्यक समुदाय के तबलीगी जमात के अनपेक्षित व्यवहार और आचरण के कारण जब पूरे देश में कोरोना तेजी से फैला, तब इस समाज के प्रमुख लोगों का आगे आकर देश से माफी मांगनी चाहिए थी जो इन्होंने नहीं किया, जबकि बहुत से लोग सोशल मीडिया के जरिये पूरे मुस्लिम समाज को गुनाहगार मान रहा हैं।

आपसी वैमनस्यता का इतना विस्तार तो रामजन्मभूमि विवाद और बावरी मस्जिद ध्वंस के समय भी नहीं हुआ था। यह विस्तार फेक न्यूज, प्रायोजित वीडियो और व्हाट्सअप समूह के जरिये कोरोना में घरों में बंद लोग तुरंत बड़ी संख्या में मोबाईल और कुछ टीवी चैनल के जरिये से पहुंचा। सबसे दु:खी करने वाली बात तो यह थी कि जिन खबरों, वीडियों और सूचनाओं पर लोग भरोसा करके उसे एक से दूसरे समूह में फारवर्ड कर रहे थे, उसकी विश्वनीयता के बारे में किसी ने भी कोई पूछताछ, जांच पड़ताल, एनालिसिस नहीं किया। अक्सर सीधे सरल लोग अफवाहों के बहकावे में आज जाते हैं और ऐसी प्रतिक्रिया देने लगते हैं, बातें करते हैं जो उन्होंने ना देखी है, ना सुनी है, ना ही उनका जीवन अनुभव ही ऐसा है। फिर भी वे इन बातों के बहकावों में आ ही जाते हैं। वे ऐसी सारी बातों को सच समझने लगते हैं।

इन दिनों पोस्ट ट्रूथ यानी सच से परे शब्द काफी प्रचलन में हैं। आक्सफोर्ड डिक्शनरी ने इसे इस साल का सबसे प्रचलित शब्द घोषित किया है। पोस्ट ट्रूथ के जरिये ऐसे बिन्दुओं को उछाला जाता है जिससे लोग भावना में बहकर उसके बारे में बिना तथ्यों को जाने विश्वास करने लगे, उस बात के समर्थक हो जायें। लोगों के दिलों में घर करने वाली बात भले ही वह सच ना हो, मिथ्या हो या अधूरा सच है, उस पर लोग विश्वास करें। दरअसल यह शब्द 2016 में अमेरिका में ट्रम्प के चुनाव समय चर्चा में आया। राष्ट्रपति पद के प्रत्याशी के रूप में ट्रम्प ने अपने प्रचार में बड़े-बड़े वादे किये, अमेरिका की तस्वीर को बढ़ा-चढ़ाकर बताया, बहुत से आरोप लगाये, जो बात में झूठे निकले। ऐसा ही कुछ व्हाट्सअप के जरिये मुस्लिमों के खिलाफ हमारे देश में किया जा रहा है।

आज मीडिया के जरिये मनचाहा ओपिनियन बनाने का काम चल रहा है। हिन्दू बड़े संख्यकवाद का जनमत तैयार किया जा रहा है। इसके लिये फेक वीडियो, फेक मैसेज की भरमार है। इसी पोस्ट ट्रूथ के शिकार स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हुए। जब किसी ने 12 अप्रैल रविवार को उन्हें 5 मिनट खड़े होकर सेल्यूट देने की बात कही और लोगों ने सच मान लिया। बाद में खुद मोदी जी को इसका खंडन करना पड़ा। इस समय देश में विभेद फैलाने का भयानक षडयंत्र जारी है। देश की मिली—जुली, साझा संस्कृति को गोदी मीडिया और बहुत से लोगों द्वारा जानबूझकर नष्ट करने की कोशिशे हो रही हैं। देश में अंधभक्तों, अंधविश्वासियों और मूर्खों की एक बड़ी जमात तैयार हो रही है, जिससे उभरने में देश को सदियां लग जायेंगी।

एक ओर जहां फेक न्यूज का बोलबाला है, वहीं दूसरी ओर कही पर भी झूठी खबरों के जरिये यदि जरा सी भी चिंगारी उठी तो उसे पूरे देश में फैलते देर नहीं लगेगी। कोविड 19 के चलते हमें वैश्विक खतरों के साथ साथ अपनी अभिव्यक्ति के खतरे भी दिखाई पड़ रहे हैं। फेक न्यूज जो कि ज्यादातर सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़े लोगों और उनके आसपास के लोगों द्वारा ही फैलाई जाती है, उसे रोकने के नाम पर सच, झूठ का भेद किये बगैर सभी को एक लाठी से भांजने की कवायद होती है। देश में अचानक लागू किये गये लाकडाउन के कारण जब हमारों लोग सड़क पर आ गये और जब यह खबर अधिकांश मीडिया ने प्रसारित करना शुरू किया तो सुप्रीम कोर्ट को गाइड लाईन जारी करनी पड़ी.

इसमें कहा गया कि जनता में अफरा तफरी और भ्रांति ना फैले इसलिये उस तरह की खबरें न दिखाई जाएं। सरकार द्वारा दिये जा रहे तथ्यों के अलावा मीडिया में कुछ भी अलग से न छापा जाये, न ही प्रसारित किया जाए। गलत सूचना प्रसारित करने वालों के जेल में डालने तक का प्रावधान किया गया। सुप्रीम कोर्ट की गाईड लाईन के बाद क्या कोरोना फैलाने के नाम पर सांप्रदायिकता का जहर फैलाने की फेक न्यूज बंद हो गई? सुबह से सोशल मीडिया पर और कुछ टीवी चैनल पर जानबूझकर ऐसी खबरें दिखाई, प्रसारित की जाती हैं जो कोरोना से ज्यादा घातक और दूरगामी परिणाम वाली होंगी.

कोरोना वायरस को लेकर सोशल मीडिया पर भ्रामक और फर्जी खबरों की बाढ़ सी आ गई है. चैटिंग एप व्हॉट्सएप पर तो लोग बिना पुष्टि किए ही संदेश को आगे बढ़ा दे रहे हैं जो बाद में झूठे साबित हो रहे हैं। भारत में तालाबंदी विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के लॉकडाउन प्रोटोकॉल के मुताबिक की गई है. मेसेज में कहा गया कि 20 अप्रैल से 18 मई के बीच तीसरा चरण लागू होगा. इस मैसेज में दावा किया गया कि डब्ल्यूएचओ ने लॉकडाउन की अवधि को चार चरणों में बांटा है और भारत भी इसका अनुसरण कर रहा है. चार चरणों में लॉकडाउन की बात झूठी थी और यह सिर्फ लोगों में भय पैदा करने के इरादे से फैलाई गई थी. डब्ल्यूएचओ के साथ—साथ भारत सरकार ने भी इस मेसेज को झूठा करार दिया.

व्हॉट्सएप पर एक और मेसेज तेजी से वायरल हुआ कि व्हॉट्सएप ग्रुप में कोरोना वायरस को लेकर कोई मजाक या जोक साझा किया तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी. मैसेज में लिखा हुआ था कि मजाक या जोक साझा करने पर ग्रुप एडमिन के खिलाफ धारा 68, 140 और 188 के उल्लंघन की ही तरह कार्रवाई की जाएगी. प्रेस इनफॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) ने इस संदेश को भी फर्जी करार दिया. भारत के सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय ने टिकटॉक और फेसबुक को पत्र लिखा है. पत्र में कहा है कि ऐसे यूजर्स को वे अपने मंच से हटा दें जो गलत जानकारी फैला रहे हैं और साथ ही उनकी जानकारी रखने को कहा है ताकि बाद में जरूरत पडऩे पर पुलिस और प्रशासन से साझा की जा सके.

व्हॉट्सएप ने सात अप्रैल को मैसेज फॉरवडिंग को सीमित कर दिया था. कंपनी के नए नियम के मुताबिक फॉरवर्ड मैसेज को सिर्फ एक चैट के साथ ही साझा किया जा सकेगा. यानी अब मैसेज फॉरवर्ड करने वाला एक बार में एक ही यूजर को मैसेज फॉरवर्ड कर पाएगा. रामपुर में क्वारंटाइन जमातियों ने मांसाहारी भोजन की मांग को लेकर हंगामा किया। ऐसी खबर फैलाई गई जिसका खंडन सहारनपुर पुलिस ने एक प्रेस नोट जारी कर किया है। प्रयागराज में दो परिवारों के बीच संघर्ष छिड़ गया और लोटन निषाद नामक व्यक्ति मारा गया। सोशल मीडिया पर पोस्ट किए गए कई टीवी चैनलों और मीडियाकर्मियों ने कहा कि इस व्यक्ति को तबलीगी जमात से संबंध रखने वाले व्यक्ति ने मार डाला। रविवार को प्रयागराज पुलिस ने ऐसे आरोपों का खंडन किया और सोशल मीडिया के माध्यम से बताया कि न तो पीडि़त और न ही आरोपी का जमात से कोई संबंध था।

इसी तरह रायपुर के एम्स में भर्ती जमात के मरीज के डाक्टरों पर थूकने की खबर फैलाई गई जिसका बाद में एम्स प्रशासन ने खंडन किया। मीडिया जिसे पहले प्रेस कहा जाता था, सूचना की सत्यता, तथ्यपरकता और तटस्थता को अपना बुनियादी मानक समझता था। पत्रकार केवल सूचना का संवाहक और संप्रेषक होता था, उत्पादक नहीं। आज कुछ पत्रकार, टीवी चैनल वास्तव में खुद पक्षकार हो गये हैं। टीवी चैनलों पर आने वाली बहसों में वे किसी पार्टी प्रवक्ता से अधिक दूसरी पार्टी के लोगों के खिलाफ मुखर दिखते हैं। चुनाव के समय राजनीतिक दलों से ज्यादा टीवी चैनल स्वयं एक चुनाव लड़ती पार्टी दिखाई देता है। वे फोर्थ पार्टी की तरह काम करते हैं। भारतीय राजनीति की त्रासदी यही है कि जो नकारात्मक तत्व हैं, वे क्रमश: केंद्रीय भूमिका में दिखाई देते हैं।


गजानन माधव मुक्तिबोध जैसे स्वप्नदृष्टा कवि ने आज से पचास साल पहले अपनी कविता अंधेरे में.. हमारे समय के सच को देख लिया था। उन्होंने शहर के विजय जूलुस में जिन लोगों को शामिल देखा था, वैसे ही लोग हमें आज भी दिखाई दे रहे हैं-
उनके चित्र समाचार—पत्रों में छपे थे,
उनके लेख देखे थे, यहां तक कि कविताएं पढ़ी थीं, भई वाह
उनमें कई प्रकाण्ड आलोचक, विचारक, जगमगाते कवि-गण,
मंत्री भी, उद्योगपति और विद्वान, यहां तक कि शहर का हत्यारा कुख्यात
डोमा जी उस्ताद, बनता है बलबन हाय-हाय।।
यहां ये दिखते हैं भूत-पिशाच-काय भीतर का राक्षसी स्वार्थ अब
साफ उभर आया है
छिपे हुए उद्देश्य
यहां निखर आये हैं।


( लेखक दैनिक आज की जनधारा और वेब मीडिया हाउस के प्रधान संपादक हैं )