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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से -संगीत और योग पर बाजारवाद का साया

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से  -संगीत और योग पर बाजारवाद का साया

-सुभाष मिश्र
अंतर्राष्ट्रीय योग एवं संगीत दिवस पर विशेष

धंधे को धर्म से जोड़ लो तो उसे योग कहते हैं। आज योग दिवस है। योग गुरू कहलाने वाले बाबा रामदेव के सुर-ताल बिगडऩे से आजकल वो संकट में है। देश के डाक्टर उनसे अनुलोम विलोम करवा रहे हैं। आज अंतरराष्ट्रीय संगीत दिवस भी है। देह की गति और सुर-ताल को नियंत्रित रखने में योग के साथ-साथ गीत-संगीत का होना भी ज़रूरी है। रामदेव बाबा अपनी योग साधना से देह का संगीत रचते हैं जिस पर बहुत से लोग मोहित हैं परन्तु इसमें भी बाजार और पूंजी की गर्त चढऩे लगी है। जिस तरह स्वाद के लिए नमक ज़रूरी है वैसा ही संगीत। जिस आदमी के जीवन में गीत-संगीत नहीं है, वह बेरंग है। हमारी प्रकृति हमें संगीत के बहुत से रंगों, ध्वनियों से जोड़ती है। सुर की साधना कठिन है पर उसके साथ जुडऩा आसान है। हमारे भावों की अभिव्यक्ति का सबसे सशक्त माध्यम है गीत-संगीत। हम कला साहित्य संगीत को किसी देशकाल की सीमाओं में नहीं बांध सकते। आप पाकिस्तान को कितना ही गरियाएं, नाराज़ हों पर आपको मेहंदी हसन, बेगम अख्तर, राहत फतेह अली खां, आतिफ असलम अपने साथ जोड़े रखते हैं। अमीर खुसरो हमें अपने सूफी कलाम के ज़रिए अपने महबूब के साथ-साथ उस  पिया के पास भी ले जाते जहां दोनों एकाकार होकर एक रंग हो जाते हैं। संगीत के सात स्वरों के आसपास ही संगीत रचा बसा रहता है। जीवन में जिस तरह नव रसों का महत्व है उसी तरह संगीत में सा रे गा मा पा धा नी सा है।

बाजार ने योग और संगीत दोनों को प्रभावित किया है। आज दोनों का बड़ा बाजार है आज योग के जरिए बाबा रामदेव का पतंजलि एक बड़ा ब्रांड बन चुका है। रामकृष्ण यादव यानी बाबा रामदेव की तरह एक साधारण पृष्ठभूमि से आने वाले गुलशन कुमार के द्वारा स्थापित टी सीरीज आज संगीत के साथ-साथ फिल्म बनाने का भी बड़ा ब्रांड बन चुकी है।

एक तरह की कठिन साधना और संयम के साथ शुरू हुए संगीत  व योगाभ्यास की साधना धीरे-धीरे बाजारवाद और पूंजी के चलते काफी कुछ बदल गए हैं। उनका मूलस्वरूप अब धीरे-धीरे बदलकर बाजार की ताकतों के अनुसार ढल रहा है। बावजूद इसके आज भी दिलो-दिमाग और हमारी सेहत के लिए सबसे आसान मार्ग योग और संगीत का ही है। कोरोना काल में लोगों ने इस दोनों के भरोसे ही अपनी मानसिक और शारीरिक इम्युनिटी को बनाए रखा। बाजार में दिन-प्रतिदिन महंगी होती दवाई हो या मनोरंजन के आधुनिक संसाधन उन पर सबकी पहुंच नहीं है।

यदि हमें अपने व्यक्तित्व का विकास करना है तो हमारी सेहत के साथ हमारे भीतर आत्मविश्वास भी होना चाहिए। कोई भी प्रदर्शनकारी कला हमें बेहतर इंसान के साथ-साथ समूह के बीच अच्छे तरीके से रहना भी सिखाती है। म्यूजिक पर्सनालिटी डेवलपमेंट का एक अच्छा माध्यम है इसके जरिए हम अपनी विशिष्ट पहचान बना सकते हैं। आधुनिक तकनीक के चलते आज बाथरूम में गाने वाले भी करावके पर खुलेआम गा रहे हैं। शादियों में आज सबसे बड़ा इवेंट संगीत संध्या हो गया है। संगीत में रिमिक्स के जरिए आज बाजारूकरण ने संगीत से उसकी आत्मा छीन ली है। एक समय था जब किसी गीत-संगीत की रचना के लिए बहुत सारे साजिंदे, गायक, गीतकार यहां तक कि वो कलाकार जिस पर गाना फिल्माया जाना है वह भी साथ बैठते थे। अब यह दौर खत्म हो रहा है। आधुनिक तकनीक और अरेंजर ने साजिंदों की जगह ले ली है। अब कोई गाना दो घंटे में बिना किसी तामझाम के रिकार्ड हो जाता है। युगल या सामूहिक गाने के लिए जरूरी नहीं कि सब कलाकार एक साथ आकर गाएं। सब अपनी अपनी बारी व सुविधा से आकर, गाकर चले जाते हैं। तकनीक के जरिए बेसुरी आवाज को भी सुरीली आवाज में बदल दिया जाता है। गाने के बोल गाए जाने से पहले ही उसका ट्रेक बन जाता है। गायक केवल ट्रेक पर आकर गाता है। यही वजह है कि अब धीरे-धीरे नामचीन संगीतकार, गीतकार के अलावा बाकी लोगों को नाम तक याद नहीं रहते। देश में जिस तरह का माहौल और मौसम है उसमें बेसुरे सुर लगा रहे हैं। दंगाई शांति का पाठ पढ़ा रहे हैं। आकंठ तक चोरी चकारी में डूबे लोग आध्यात्म और धर्म की घुटी पिला रहे हैं। देश के अधिकांश क्षेत्रों में टीम वर्क गायब है व्यक्तिवाद हावी है।

यदि हम बेहतर रचनात्मकता की बात करें तो कला की रचना में परंपरा और नवीनता दोनों का समन्वय ही श्रेयस्कर है। यह सही है कि देशकाल और पात्र ऐसे तत्व हैं जो प्रत्येक कला पर अपना प्रभाव डालते हैं। संगीत का मूल गुण स्वर लय के सौंदर्य से विशुद्ध आनंद की अनुभूति कराना जो आज भी कायम है। जिस तरह सुगंध अपना वातारवण बना लेती है उसी तरह संगीत कला भी अपना वातावरण सृजित करती है। संगीत में लोकानुरंजन और भावानुरंजन दोनों ही गुण होते हैं जिस प्रकार शिव का डमरू दोनों ओर से ध्वनित होता है उसी प्रकार कला भी दोनों लोक को संवारने में सक्षम मानी गई है। कला वही श्रेष्ठ है जिसमें कलात्मक सूक्ष्मता, परिष्कार, विविधता, नवीनता, अलंकरण और चमत्कार है। शास्त्रीय संगीत के अपने अनुशासन की वजह से लोकप्रिय संगीत और लोकसंगीत से श्रेष्ठ माना गया है। लोकसंगीत व्यक्तियों की इच्छा अनुसार किसी भी रूप में विकसित हो सकता है। इसमें नियम पालन का प्रतिबंध नहीं रहता। हमारे देश का शास्त्रीय संगीत हमारी विशिष्ट पहचान है और हमारे संगीत के बहुत सारे घराने भी हैं जिनमें ग्वालियर घराना, जयपुर घराना, दिल्ली घराना, किराना घराना, आगरा घराना, पटियाला घराना मशहूर है।

आधुनिक जीवन शैली और व्ययस्था के बीच सबसे सहज तरीके से योग स्वस्थ जीवन व्यतीत करने की कला तथा विज्ञान है। योग करने का मकसद आत्मज्ञान की प्राप्ति तथा सभी प्रकार की शारीरिक परेशानियों को दूर करना है। योग मनुष्य के मन और आत्मा की अनंत क्षमता को बढ़ाकर आत्मज्ञान की प्राप्ति करवाता है। योग करने से हमें अच्छी नींद आती है तथा हमारा शरीर स्वस्थ और तंदरुस्त रहता है। योग शब्द संस्कृत है यूज से बना है जिसका अर्थ है जोडऩा (स्वयं का सर्वश्रेष्ठ या स्वयं के साथ मिलान) और योग मन को आत्मा के साथ जोड़ता है। वैदिक काल में योग को एकाग्रता हासिल करने और सांसारिक मुश्किलों को खत्म करने के लिए किया जाता था। महाभारत तथा भगवत-गीता में योग के बारे में कहा गया है कि जिस व्यक्ति में दूसरों के प्रति विनम्रता, श्रद्धा, भावना होती है वह मनुष्य ही एक श्रेष्ठ अवस्था प्राप्त कर सकता है और इस युग में योग को चार भागों में वर्णित किया है- ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग और राज योग।

आज योग पूरे विश्व में आधुनिक जीवन शैली का एक अंग है जिस तरह हमारे देश में जींस पहनना और अंग्रेजी बोलना आधुनिकता की निशानी है, उसी तरह विदेशों में योगा करना एक नए किस्म की आधुनिकता है। दुकानों में योगा बुक्स से लेकर योगा मैट्स जैसे तमाम उत्पाद बिक रहे हैं। अमेरिका में पैकेज के तहत योगासन कराने वाली एक चेन है योगावर्कस।

न्यूयॉर्क और कैलिफोर्निया में ही दो दर्जन से ज्यादा योग स्टूडियो खुल चुके हैं। यह कंपनी सालाना करोड़ों डॉलर का व्यवसाय कर रही है। अमेरिका में इस तरह के योग स्टूडियो के जरिए ही करीब दो करोड़ डॉलर का बिजनेस हो रहा है। भारतीय मूल के योगाचार्य विक्रम ने अपने नाम से पेटेंट भी कराया। उनमें विक्रम योगा अथवा हॉट योगा प्रमुख है। अमेरिका में अन्य प्रचलित योगासनों में पावर योगा और काली-रे त्रियोग का जिक्र भी होता है।  

आधुनिक जीवन शैली की अनिवार्यता में संगीत और योग शामिल है। विश्व संगीत दिवस पहली बार वर्ष 1982 में फ्रांस में संक्रांति पर मनाया गया था। तत्कालीन फ्रांसीसी कला और संस्कृति मंत्री, जैक लैंग और मौरिस फ्लेरेट ने पेरिस में फ़ेते डे ला म्यूजि़क की शुरुआत की।  योग दिवस की शुरूआत से  21 जून 2015 से  भारत से हुई है।

योग की तरह ही संगीत तनाव को कम करने में मदद करता है, बेहतर नींद प्रदान करता है और हमें आगे बढऩे में मदद करता है। मानसिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों के लिए संगीत चिकित्सा अद्भुत साबित हुई है और यह किसी व्यक्ति को बेहतर व्यायाम करने में भी मदद कर सकती है। चूंकि, दोनों का बाजार दिन प्रतिदिन बढ़ रहा है। इसलिए इसके अलग-अलग रुप देखने को मिलरहे हैं। आज सबसे बड़ी चुनौती दोनों के मौलिक स्वरुप को बचाये रखने की है। प्रसंगवश हामिद इकबाल सिद्दीकी का एक शेर-
तुझे आवाज से पहचान लूंगा
ये मुमकिन है कि चेहरा भूल जाऊं। ।