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प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - एक परीलोक बसाने की कीमत !

प्रधान संपादक सुभाष मिश्र की कलम से - एक परीलोक बसाने की कीमत !

-सुभाष मिश्र

छत्तीसगढ़ की राजधानी को स्मार्ट तरीके से बसाने के लिए रायपुर के नजदीक हजारों एकड़ जमीन अधिग्रहित किया गया। अरबों रुपए की लागत से नवा रायपुर बसाया गया कई किलोमीटर सड़कों का जाल बिछा दिया गया। दूधिया रोशनी से नहाए इस परीलोक में आम जनता का पैसा पानी की तरह बहाने में पिछली सरकार ने कहीं कोई गुरेज नहीं किया लेकिन जितना खर्च हुआ उतनी बसाहट आज तक वहां नहीं पहुंच पाई है। यहां तक सरकार के अफसर और मंत्री आज भी पुराने शहर में ही रहना पसंद करते है। हालांकि 2018 में सरकार बनाने के बाद सीएम भूपेश बघेल ने जरूर योजना बनाई थी कि मुख्यमंत्री से लेकर तमाम मंत्री का आवास नवा रायपुर शिफ्ट हो जाए साथ ही तमाम प्रशासनिक अफसरों के आवास भी नई राजधानी में हो लेकिन कोविड-19 के चलते इसकी रफ्तार भी धीमी पड़ गई। यानि अरबों रुपए खर्च के बाद भी नवा रायपुर मानवीय बसाहट को लेकर तरस रहा है। आज नवा रायपुर के नाम पर हुए फिजूलखर्च का जिक्र हम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हाल ही में कर्ज से दबे नया रायपुर विकास प्राधिकरण की संपत्ति पर एक बैंक ने कब्जा कर लिया है.।

पिछले दिनों प्राधिकरण, यूनियन बैंक के 317.79 करोड़ रुपए की उधारी नहीं चुका पाया। अब बैंक ने नया रायपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी की 2.65 हेक्टेयर जमीन पर प्रतीकात्मक कब्जा कर लिया है। यूनियन बैंक ऑफ इंडिया की मिड कॉर्पोरेट शाखा ने एक दिन पहले अखबारों में एक विज्ञापन जारी किया। उसका मजमून है, बैंक ने नवा रायपुर विकास प्राधिकरण को 2 अगस्त 2021 को एक डिमांड नोटिस जारी किया था। इसके जरिए बैंक ने 317 करोड़ 79 लाख 62 हजार 793 रुपयों के साथ ब्याज और कानूनी शुल्क आदि देने की मांग हुई थी। कर्जदार एनआरडीए को यह राशि चुकाने के लिए बैंक ने 60 दिनों का समय दिया था। इस अवधि के भीतर प्राधिकरण ने बैंक को वह रकम नहीं चुकाई। मियाद पूरा होने के तीन महीने बाद बैंक ने वसूली की प्रतीकात्मक कार्यवाही शुरू की है। इसके तहत 12 जनवरी को नवा रायपुर के कयाबांधा और बरोडा गांव की 2.659 हेक्टेयर जमीन को बैंक ने अपने कब्जे में ले लिया है।

दुनियाभर के मास्टरप्लान की स्टडी के बाद बने इस परीलोक की ये हालत कैसे हो गई। जिसकी तुलना राज्य सरकार ने मलेशिया में क्वालालंपुर के नजदीक बसाए गए पुत्राजया नाम के नगर से की। वो आज कर्ज के बोझ से क्यों दबे जा रहा है। दरअसल पिछली सरकार में बैठे अफसरों ने कम्प्यूटर पर ऐसे डिजाइन और रोडमैप बनाए कि लगा  बस कुछ ही सालों में नवा रायपुर पूरे भारत के सबसे नए शहर के रूप में स्थापित हो जाएगा। उनके इस पे्रजेंटेशन के नाम पर भारी-भरकम लोन बैंकों से लिए गए लेकिन समय बीतने के साथ वहां निवेश नहीं हो पाया। निवेश हो भी कैसे जब वहां मानवीय बस्तियां ही आबाद नहीं हैं तो भला बाजार और रोजगार के साधन वहां कहां से आएंगे। इस दौरान महज कुछ कॉलेज और स्कूल ही नवा रायपुर में खुल पाए लेकिन जिन निवेश से को एनआरडीए को रुपए मिलना था वो निवेश आज भी बहुत दूर है। सरकार के पास ऐसी कोई नीति नहीं होने के कारण बड़े इनवेस्टर्स नवा रायपुर नहीं पहुंच पाए और एनआरडीए की जेब खाली रह गई और आज वो बैंक का कर्ज भी अदा नहीं कर पा रहा है।  
एक नजर नवा रायपुर में हुए खर्च पर-  
1. अनुत्पादक डोम
2. झांझ और सेंध जलाशय के सौंदर्यीकरण के नाम पर करोड़ों खर्च
3. सेंट्रल पार्क 70 एकड़ में निर्मित करोड़ो3 का व्यय
4. सायकल ट्रैक,पाथवे और बीआरटीएस पर 250 करोड़ से अधिक व्यय
5. एयरपोर्ट से मंत्रालय तक 12 किलोमीटर लैंड्सकैप किया गया है।
6. राजधानी सरोवर में फाउंटेन और सौंदर्यीकरण किया गया, इसमें निजी होटल को ठेका दिया गया।
7. सीबीडी (सेक्टर 21 )और ऑफिस काम्प्लेक्स सेक्टर 24 के लिए कूल 700 करोड़ का लोन लिया गया था।
8. एकात्म पथ 2.3 किलोमीटर लंबा मुख्य सड़क जो मंत्रालय को आती है के सौदर्यीकरण के लिए करोड़ों का व्यय, 2016 में प्रधानमंत्री मोदी के हाथों लोकार्पित
9. सेक्टर 19 में 10 बिस्तर का हॉस्पिटल खोला गया पर सफल नहीं हुआ, फिर सेक्टर 29 में हॉस्पिटल शुरू किया गया पर डॉक्टर पर्याप्त नहीं।
10. 40 में से 21 सेक्टर आवासीय है फिर भी आज तक 3 सेक्टर पूरी तरह आबाद नहीं हो पाये।

नया रायपुर 1 लेयर लेयर 80 वर्ग किमी में फैला है। 2 लेयर लेयर 130 वर्ग किमी में और 3 लेयर लेयर 11.92 वर्ग किमी में ऐसे कुल 223 वर्ग कम में विस्तृत है। सबसे पहले 2003 में अजीत जोगी की सरकार ने पौता में सोनिया गांधी के हाथों शिलान्यास करवाया था। बाद में स्थान बदलकर राखी में मंत्रालय बनाया गया।
इधर, जैसे ही बैंक ने कब्जे की सूचना अखबारों के माध्यम से सार्वजनिक की, वैसे ही पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इस बारे में ट्विट करते हुए वर्तमान सरकार पर निशाना साधा और कर्ज लेकर घी पीने का आरोप लगा दिया। इसके जवाब में राज्य सरकार के मंत्री मोहम्मद अकबर ने पिछली रमन सरकार को एनआरडीए की बर्बादी के लिए जिम्मेदार ठहराया है। खैर, अक्सर  हम देखते हैं कि राजनीति में एक दूसरे पर आरोप लगाना बेहद आसान होता है लेकिन जनता के पैसे की इस तरह बर्बादी के लिए किसी पर जिम्मेदारी तय नहीं हो पाती है। आम जनता के पैसों की बर्बादी कैसे रोका जाए इस ओर गंभीरता से सोचने की जरूरत है छत्तीसगढ़ में इस तरह के कई काम हैं जिन्हें करने की जरूरत नहीं थी लेकिन सरकारों ने उनको ज्यादा फोकस किया। रायपुर शहर के बीचों- बीच बने स्काईवॉक को लेकर आज तक तय नहीं हो पाया है कि करोड़ों रुपए की लागत से बना ये स्ट्रक्चर आखिर किस काम आएगा। इसकी क्या उपयोगिता होगी इसे तय करने के लिए अलग-अलग एक्सपर्ट रायशुमारी कर रहे हैं लेकिन बात बन नहीं पा रही है। जो रकम बिना सोचे इस तरह के निर्माण कार्य में बहाए गए हैं महज कथित रूप से स्मार्ट सिटी बनाने के चक्कर में, उन्हें आधारभूत या बुनियादी सुविधा के लिए तरस रहे ग्रामीण इलाकों में खर्च किया जा सकता है। छत्तीसगढ़ में जहां एक और बहुत बड़ा इलाका छोटी-छोटी सुविधाओं के लिए तरस रहा है वहां अरबों रुपए उस प्रोजेक्ट में लगा दिए जाते हैं जहां मानवीय बसाहट ही नहीं है। किसानों की जमीन लेकर सड़कों का जाल बिछा दिया जाता है लेकिन इसी राज्य में सैकड़ों ऐसे गांव हैं जहां के लोग आज तक एक अदद पक्की सड़क की राह देख रहे हैं। भले हम कागजों में सरप्लस बिजली वाले राज्य हों लेकिन सुदूर जंगलों में रहने वाली बहुत बड़ी आबादी आज भी बिजली के लिए तरस रही है। वहीं नवा रायपुर लगभग मानव विहिन द्वीप शाम होते ही दुधिया रोशनी में नहा जाता है आखिर ये चकाचौंध किसके लिए, किस दिखावे के दौर में जी रहे हैं हम ये बड़ा सवाल बन गया है।  
एकतरफ एनआरडीए अपना कर्ज नहीं पटा पा रहा है, वहीं दूसरी तरफ नवा रायपुर बसाहट को लेकर अभी नवा रायपुर क्षेत्र के किसानों का आंदोलन चल रहा है। इस क्षेत्र के किसान गत कई वर्षों से मुआवजा के लिए आंदोलनरत है। स्थानीय युवकों को बसाहट उपरांत रोजगार देने की बात कही गईं थी, लेकिन इस क्षेत्र में एक भी उद्योग स्थापित नहीं किए गए हंै, कई एकड़ जमीन कई संस्थाओं को आबंटित भी किया गया है, लेकिन इस क्षेत्र में कहीं एक उद्योग नहीं दिखता। इस क्षेत्र के निवासी मंत्रालय एवं अन्य कार्यालयों में आउटसोर्सिंग कंपनी के अंदर एक मजदूर की तरह काम करने मजबूर हैं। शासन द्वारा बार-बार टेंडर कर अलग-अलग कंपनी को जवाबदारी दी जाती है। नया ठेकदार इन लोगों को नौकरी से भी निकाल देता है। नवा रायपुर दो शहर के बीच स्थापित होना था, ताकि किसी भी समय लोग अपने निवास तक किसी भी समय आ का सके लेकिन ऐसा नहीं होने से मात्र सिटी बस के अलावा आने-जाने के लिए कोई साधन नहीं है। शासकीय कार्यालय बंद होने के बाद शासकीय सेवक 5 बजे के बाद रायपुर आने के लिए साधन विहीन हो जाता है।

छत्तीसगढ़ प्रदेश राजपत्रित अधिकारी संघ के अध्यक्ष कमल वर्मा कहते हैं कई कर्मचारी संगठन नवा रायपुर में निवास भी करना चाहते हैं। इसके लिए विगत 15 वर्षों से जमीन के लिए आवेदन भी दिया गया है लेकिन आवेदन मंत्रालय, आवास पर्यावरण विभाग और एनआरडीए के भंवर में फंस जाता है। इस क्षेत्र के लिए निर्धारित दर इतना ज्यादा है कि शासकीय कर्मचारी जमीन व घर खरीदने के लिए सोच भी नहीं सकता। एनआरडीए से दर कम करने कहा जाता है तो ले-आउट केंद्र से अप्रूव्ड है इसलिए इस संबंध में केंद्र से अनुमति लेना होगा। ऐसा जवाब अधिकारियों द्वारा दिया जाता है। संघ अलग-अलग कार्यालय के चक्कर काटकर इस निष्कर्ष पर पहुंचा है कि किस कार्यालय को निर्णय लेने का अधिकार है? यह समझ से परे है। कई शासकीय सेवक नवा रायपुर रहने लग गए है, लेकिन आज भी ट्रांसपोर्टेशन की कोई सुविधा नहीं है। साथ ही शिक्षा एवं स्वास्थ्य जैसे आवश्यक सुविधा की कमी स्पष्ट देखती है। कई शासकीय सेवक कुछ समय नवा रायपुर में व्यतीत करने के बाद पुन: पुराना रायपुर शिफ्ट होने के लिए मजबूर हुए हैं। नवा रायपुर में मंत्रालय सहित कई कार्यालय कोरोना के कारण एक तिहाई कर्मचारियों से संचालित हो रहे हैं।

किसान इस क्षेत्र में कोरोना गाइड लाइन का पालन नहीं करते हुए आंदोलनरत हैं। आने वाले समय में नवा रायपुर कोरोना हब बनने वाला है। कर्मचारियों को लाने ले जाने वाली बसें वाहन चालकों के हड़ताल के कारण बंद है।

बस चलाने का ठेका छत्तीसगढ़ के बाहर की कंपनी को देने के कारण इस कंपनी का संचालक हैदराबाद में है। किसी का कॉल रिसीव नहीं कर रही है। नगर निगम, एनआरडीए और शासन को ओर से बस सेवा बहाल करने का प्रयास भी नहीं किया जा रहा है। इस तरह हर दृष्टिकोण से कर्मचारी तरह-तरह की कठिनाइयों से गुजर रहा है। नई राजधानी प्रभावित किसान कल्याण समिति के अध्यक्ष रूपन चंद्राकर का कहना है कि नवा रायपुर पुनर्वास योजना के अनुसारअर्जित भूमि के अनुपात में उद्यानिकी, आवासीय और व्यावसायिक भूखंड पात्रतानुसार नि:शुल्क मिलने के प्रावधान का पालन किया जाए। भू-अर्जन कानून के तहत हुए अवार्ड में भूस्वामियों को मुआवजा प्राप्त नहीं हुआ है उन्हें बाजार मूल्य से 4 गुना मुआवजा मिले। नवा रायपुर क्षेत्र में ग्रामीण बसाहट का पट्टा दिया जाए। वार्षिकी राशि का पूर्ण रूपेण आबंटन किया जाए। पुनर्वास पैकेज-2013 के तहत सभी वयस्कों को मिलने वाला 1200 वर्गफीट प्लॉट दिया जाए। साल 2005 से भूमि क्रय-विक्रय पर लगे प्रतिबंध को तत्काल हटाया जाए एवं आबादी से लगी गुमटी, चबूतरा, दुकान, व्यावसायिक परिसर को 75 प्रतिशत प्रभावितों को लागत मूल्य पर देने के प्रावधान का पालन किया जाए। नवा रायपुर को पिछली सरकार ने एक झांकी के तौर पर इस्तेमाल किया है, लेकिन इसे आबाद करने के बारे में समय पर गंभीरता से विचार नहीं किया गया। अगर यही हालत रही तो स्मार्ट सिटी का ये सपना धरातल पर उतरना मुश्किल है।