कोविड-19 पैडेमिक की अन्तिम नियति किस तरह होगी ?

कोविड-19 पैडेमिक की अन्तिम नियति किस तरह होगी ?

डॉ स्कन्द शुक्ला

कोविड-19 पैडेमिक की अन्तिम नियति किस तरह होगी ? इसके तीन रास्ते हैं : पहला असम्भव जान पड़ता हुआ , दूसरा जोखिम-भरा और तीसरा बहुत लम्बा। 

चाहे जितने प्रतिक्रियात्मक प्रयास कर लिये जाएँ , विषाणु मानव-समाज से ख़त्म नहीं होने वाला। यह रहेगा और इसी के साथ हमें रहना सीखना होगा। लड़ना होगा , जूझना होगा। पर कैसे ? व्यापक स्तर पर कौन से प्रयासों के साथ इस रोग के महामारी-स्वरूप से निजात पायी जाए ? यह रहे-तो-रहे , पर इस महामारी-स्वरूप में विश्व को पीड़ित न करे। 

जब तक विषाणु दुनिया के किसी भी देश में फैलता जा रहा है , तब तक उन देशों के लिए भी समस्या होगी जहाँ इसे नियन्त्रित किया जा चुका है। कहीं भी चिनगारी होगी , आग भड़क कर दूर तक जा सकती है। ऐसे में पहला उपाय है कि दुनिया-भर के सभी देश इस महामारी को एक-साथ घुटने टेकने पर मजबूर करें ,जैसे सन् 2003 में सार्स के साथ किया था। यह यह पैंडेमिक सार्स की तुलना में बहुत-बहुत व्यापक है और इसे इस तरह से सभी देशों के द्वारा नियन्त्रित कर पाने की उम्मीद न के बराबर है। इस तरह से यह पहला तरीक़ा लगभग असम्भव ही है। 

दूसरा तरीक़ा हर्ड-इम्यूनिटी का है। विषाणु समाज में ख़ूब फैलते-फैलते इतना प्रसरित हो जाए कि ढेर सारे लोग उसके खिलाफ प्रतिरक्षण विकसित कर लें। इससे बचे हुए असंक्रमित लोग भी सुरक्षा पा जाएँ। पर यह सामूहिक प्रतिरक्षण एक बड़ी क़ीमत से बाद मिलेगा : ढेरों लोग इसके विकास के दौरान गम्भीर संक्रमण झेलेंगे और अनेक की मृत्यु भी होगी। यूनाइटेड किंगडम ने पहले इस पर विचार किया था , पर बड़े जोखिम को देखते हुए फिर हाथ पीछे खींच लिये। अमेरिका में भी विशेषज्ञों के एक समुदाय द्वारा इस उपाय पर विचार जारी है। 

तीसरा तरीक़ा है , लम्बी लड़ाई के लिए कमर कसने का। जहाँ महामरी फैले , दबाइए। स्थानीय विषाणु-प्रसार से लड़िए ,. उसे नियन्त्रित करिए। यह सब कब तक ? तब तक जब तक टीका न आ जाए ? टीका कब तक ? डेढ़-से-दो-साल में। तब तक लड़ते रहिए। सोशल ( या फिज़िकल --- आप अँगरेज़ी में जो शब्द चुनें ) डिस्टेंसिंग के लिए लोगों को कहा जाए , फिर नियन्त्रण के बाद ढील दी जाए। पुनः ज़रूरत पड़ने पर सोशल डिस्टेंसिंग , फिर आवश्यकतानुसार ढील। इस तरह के बार-बार चलने वाले चक्र। 

वैज्ञानिकों ने मात्र तिरसठ दिनों के अन्दर विषाणु के जीनों को सीक्वेंस करने से लेकर पहले व्यक्ति में प्रयोगात्मक वैक्सीन प्रविष्ट करा दी --- यह अपने-आप में एक विश्व-रिकॉर्ड है। पर इतने-भर से वैक्सीन एकाध महीने में बनकर नहीं आने वाली। वैक्सीन सुरक्षित होनी चाहिए , फिर असरदार होनी चाहिए। जानवरों पर उसके प्रयोग होंगे , फिर बड़े पैमाने पर मनुष्यों में। कितनी डोज़ में लगायी जाए ? किस रास्ते दी जाए ? इंजेक्शन या नाक से ? कौन-कौन से रसायन इसमें डाले जाएँ ? फिर कितने दिनों में यह बनकर करोड़ों-करोड़ लोगों के लिए उपलब्ध होगी ? ये सारे सवाल दो-चार महीनों में अपने उत्तर नहीं पाएँगे , लम्बा समय इन्हें सिद्ध करने में बीतेगा। 

लोग गरमी की तरफ आशा लगाए हैं , ज्यों किसान मानसून के बादलों की ओर लगाता है। यह उम्मीद भी एक तरह से दमदार है। कोरोनाविषाणु जाड़ों में फैलने वाले विषाणु हैं और इनके संक्रमण गरमी में घट जाया करते हैं। पर वे कोरोनाविषाणु पुराने हैं , जिनसे हम परिचित हैं। यह विषाणु नया है , इसके पास बिलियनों प्रतिरक्षाहीन मनुष्य मौजूद हैं। क्या ऐसे में गरमी इसके प्रसार को रोक सकेगी ? सवाल लाख टके का है। 

पुराने ज़ुकाम-खाँसी वाले कोरोनाविषाणुओं से प्रतिरक्षा साल भर की मिलती है , सन् 2003 वाले सार्स से थोड़ी और अधिक मिल जाती है। इस नये सार्स-सीओवी 2 से कितनी मिलेगी ? ज़ुकाम वाले पुराने मामूली विषाणुओं जितनी ? या फिर सार्स जितनी ? या फिर इनके बीच में ? पता नहीं। समय बताएगा। इस बीच अगर वैक्सीन बन गयी , तो उसे साल-दर-साल अपडेट करते रहना पडेगा। विषाणु चूहा , वैक्सीन बिल्ली। विषाणु अपना जेनेटिक मेकअप बदलेगा , वैक्सीन बनाने वाले वैक्सीन को बदलते रहेंगे। 

हम चाहते हैं कि कोरोनाविषाणु से होने वाली यह बीमारी कोविड-19 साल-दर-साल होने वाले मौसमी फ़्लू की तरह बर्ताव करे। हमारा-इसका रिश्ता उसी तरह बन जाए। न तेरा , न मेरा , बीच का --- यह मोलभाव हमारी इच्छा है। पर फ़्लू वाले विषाणु इन्फ़्लुएन्ज़ा-परिवार के हैं , कोरोनाविषाणु उस परिवार का है ही नहीं। साँप से लड़ाई के सबक क्या शेर से लड़ते समय काम आ सकते हैं ? आ सकते हैं तो कितने ? सोच कर देखिए। 

आने वाली पीढ़ियाँ इस सार्स-सीओवी 2 के साथ बड़ी होंगी। सम्भवतः जाड़ों में एक अपेक्षाकृत तीव्र नज़ला आएगा और लम्बे समय तक बीमार और परेशान कर जाएगा। वैक्सीन बन चुकी होगी और कदाचित् सभी उसे फिर भी नहीं लगवाएँगे। लोग भूल जाएँगे कि सन् 2020 भी एक साल था , जब लॉकडाउन हुए थे , सोशल डिस्टेंसिंग ( फिज़िकल डिस्टेंसिंग या जो भी ! ) हुई थी , कॉन्स्पिरेसियाँ फ़ैली थीं और सामाजिक मनोमालिन्य भी। 

भविष्य इसे भी मानवता की दर्दभरी एक अँगड़ाई कहेगा , जिसने उपभोक्तावादी खुमारी की चीख निकाल दी थी। 

लेकिन तब तक युद्ध जारी है। सुरक्षा-नियमों के साथ लड़ते रहिए। 

(डॉ स्कन्द शुक्ला पेशे से चिकित्सक और गंभीर अध्येता हैं)